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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

शकुनविमान ] [ २४७
दूसरे सौध-महल घेरे में यथाविधि कहकर स्तम्भपंक्ति के अनुसार घरों को पृथक् पृथक् अंगयन्त्रों के
प्रमाणानुसार बनावे, एक एक घर में. सिद्ध अंगयन्त्रों को यथाविधि एक एक को कीलों से स्थापित करे,
६० बालिशत ऊंचाई कही है—॥८१-८६॥
वितस्तिषोडशायाममूर्ध्वोन्नत्यमत परम् ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव च ॥८७॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त (खलु?) महर्षिभि ।
चत्वारिंशद्वितस्तिप्रमाणमुन्नतमद्भुतम् ॥८८॥
वितस्त्यष्टमायाम तदूर्ध्वोन्नत्यक तथा ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव हि ॥८९॥
तृतीयसौधप्रमाणमेव शास्त्रेण वर्णितम् ।
अङ्गयन्त्रस्थापनार्थं तत्रत्यस्तम्भपंक्तिभि ॥६०॥
जनोपवेशनार्थं च गृहान् सम्यक् प्रकल्पयेत् ।
पीठात् श्यावरणान्त च तदारभ्य पुन क्रमात् ॥६१॥
नालस्तम्भान्तपर्यन्तं चतुर्दिक्षु पृथक् पृथक् ।
रज्वाकाराद् रन्ध्रनालादेकैकस्य परस्परम् ॥६२॥
विना बन्ध योजित स्यात् सुदृढ क्रमात् ।
पीठावरणतस्तद्वत्साधं सप्तवितस्तनचध ॥६३॥
यावतीठप्रमाण स्यात् तावदेव यथाविधि ।
एकमावरण कुर्यात्सुदृढं सुमनोहरम् ॥६४॥
१६ बालिशत लम्बा ऊपर उन्नत हुआ १४ बालिशत ३ अंगुल अधिक दूसरे सौध—महल का
प्रमाण महर्षियों ने कहा है । ४० बालिशत प्रमाण का उन्नत ८ बालिशत लम्बा उससे ऊपर, १४ बालिशत
३ अंगुल तीसरा सौध—महल का प्रमाण शास्त्र में कहा है । अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ वहां की स्तम्भ-
पंक्तियों से तथा मनुष्यों के बैठने के लिये घर सम्यक् बनावे । पीठ से आवरणपर्यन्त और पुन आवरण
से आरम्भ करके चारों दिशाओं में नालस्तम्भपर्यन्त रस्सी के आकार छिद्रवाली नाल से एक एक का
परस्पर विनाबन्धन के स्थान सुदृढयुक्त किया हो । पीठावरण से साढेसात बालिशत नीचे पीठ के माप का
एक आवरण मनोहर करे ।
यानोपयुक्तयन्त्राण्ये तस्मिन् संरचितानि हि ।
तन्मध्यकेन्द्रनालस्तम्भमूलोस्ति दृढ यथा ॥६५॥
एतन्नालस्तम्भमूले चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वाताकर्षणयन्त्राणि चत्वारि स्थापितानि हि ॥६६॥
तत्प्रेरणकारिणि चत्वारि रौष्ण्ययन्त्राण्यपि क्रमात् ।
पश्चाद्भागे विमानस्य पूर्वभागेऽपि च स्थिते ॥६७॥