बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
२१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रुई ?, चञ्चोल—चञ्चुलु—लाल एरन्ड ? बालज—सुगन्धबालास्थ्य, पांचों प्राणक्षार—मनुष्य घोडा
गधा बैल बकरी के मूत्रों का क्षार नवसादर, शशोङुप—लोध काष्ठ । क्रमश ३, ७, ५, २२, ४, १५, २,
५, २०, ७, ३०, १५, ४०, २३, २७, १३, १६, १८ भागों के अनुसार इन १२ वस्तुओं को तीन बार
शोधकर मत्स्यमूषा मुख बोतल में विधिवत् भर कर नलिकाकुण्ड के मध्य में रख कर ६६ दर्जे की उष्णता
से यथाविधि गोमुखी भस्त्रा से गलावे पश्चात् यन्त्रमुख में डाल दे ऐसा करने पर पिङ्गलाख्य दर्पण हो
जावेगा यही १६वीं संख्या वाला दर्पण शास्त्र में वर्णित किया है ॥ १०३–१०८ ॥
हस्तलेख कापी संख्या १५ –
अथ पट्टिकाभ्रकयन्त्रम्—अब पट्टिकाभ्रक यन्त्र कहते हैं ।
एवमुक्त्वा सङ्ग्रहेण दिशाम्पतिमतं परम् ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमत्र निरूप्यते ॥१॥
इस प्रकार 'दिशाम्पति' यन्त्र संक्षेप से कहकर अब आगे, 'पट्टिकाभ्रक' यन्त्र के स्वरूप का
निरूपण किया जाता है।
तदुक्तं क्रियासारे—यह यह वृत्त 'क्रियासार' ग्रन्थ में कहा है—
ग्रहसन्धिसमुद्भूतज्वालामुखविनाशने ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रं च यानावरणमध्यमे ॥२॥
स्थापयेद्विधिवद् धीमान् सर्वदुःखविनाशनम् ।
ग्रहों की सन्धि में प्रकट हुए ज्वालामुख-अति ज्वलनशक्ति के विनाश निमित्त पट्टिकाभ्रक
यन्त्र को भी यानावरण के मध्य भाग में बुद्धिमान् स्थापित करे जो कि सर्वदुःखों का विनाशसाधन है ।
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा ही है—
ग्रहसञ्चारमार्गेषु ग्रहाणां तु परस्परम् ॥३॥
एकरेखाप्रवेशेन ग्रहसन्धिर्भवेदतः ।
ज्वालामुखाभिधा ❀ काचिद्विषशक्तिः प्रजायते ॥४॥
यानारूढास्तया सर्वे मरिष्यन्ति न संशयः ।
तस्मात्तच्छक्तिनाशाय सङ्ग्रहेण यथाविधि ॥५॥
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमद्य निरूप्यते ।
तृतीयवर्गाभ्रकेषु तृतीयाभ्रकतः क्रमात् ॥६॥
कारयेत्पट्टिकाभ्रकयन्त्रं शास्त्रविधानतः ।
ग्रहों के सञ्चरण मार्गों में ग्रहों के परस्पर एकरेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि होती है अतः वहां
ज्वालामुखनामक कोई विषशक्ति--घातक विप्रयोगशक्ति† विरुद्ध संयोगशक्ति प्रकट हो जाती है उससे
❀ वा (हस्तलेखे)
† "विष विप्रयोगे" (अपादि०) विरुद्ध संयोग-घर्षण वा धम्त्वाद् ।
२१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यान--व्योमयान या विमानयान पर सवार हुए सब निःसंशय मर जायेंगे । अतः उस विषशक्ति-विरुद्ध
योगवाली शक्ति के नाशार्थ संक्षेप से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र का स्वरूप आज-अब विधिवत् निरूपित किया जाता
है । तृतीयवर्ग के अभ्रकों में क्रमानुसार तृतीय अभ्रक से शास्त्रविधान से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र करावे-बनवाए
या करे बनवावे ॥३-६॥
तदुक्तं शौनकीये--यह शौनकीय वचन में कहा है-
अथ तृतीयवर्गस्थाभ्रकनामान्यनुक्रमिष्यामो ‡ शारदपङ्किलसोममार्जा-
लिकारक्तमुखविनाशका इति । सोमेनैवैतदिति + केचित् ॥
अब तृतीय वर्गवाले अभ्रक नामों को कहेंगे शारद, पङ्किल, सोममार्जालिक, रक्तमुख, विनाशक
या रक्तमुखविनाशक । सोम से ही करे ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं । (सोम की तृतीय संख्या है ) ।
सोमाभ्रकलक्षणमुक्तं लोहतन्त्रे-सोम नाम के अभ्रक का लक्षण लोहतन्त्र में कहा है-
मेघवर्णेऽति
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पट्टिकाभ्रकयन्त्रः ] [ २१५
अभ्रक को रसमाताबीज तैल रस—हिङ्गुल और माताबीज—आलुकणी या इन्द्रवारुणी के
बीज के तैल से विधि से या दो बार, शोधे फिर अभ्रक को गलाकर दो वितस्ति—बालिश्तमात्र लम्बी
चौड़ी बाहु—हाथ भर ऊंची पट्टिका बनावे । प्रथम कूर्मपीठ (नीचे का स्थान) वारिवृक्ष—हीवेर—सुगन्ध
वाला वरना ? वृक्ष की लकड़ी से सोलह अङ्गुल लम्बा बाहुमात्र ऊंचा शंकुपट्टिकाकार से शास्त्रानुसार
बनावे, पुनः सीधी घूमनेवाले कीलचक्र विधिवत् शौण्डीर मणि‡ से युक्त कील चक्र लगावे उस शंकु में
लगावे, पश्चात् मूलकेन्द्र से तन्त्रियों-तारों को लगावे ॥ ९-१३ ॥
आपट्टिकान्तं विधिवत्कीलचक्रानुसारत ।
पश्चाद्भागे दन्तपात्रं स्थापयित्वा ततः परम् ॥ १४ ॥
शैवालद्रावकं तस्मिन् सम्पूर्य रविचुम्बकम् ।
पारदं च न्यसेत् पश्चात् तन्त्रीनाहृत्य शास्त्रत ॥१५॥
तस्मिन् सन्धारयित्वाथ शृङ्गिण्याच्छाद्य नालतः ।
तन्नालमूलमाकाशे दृढं सन्धारयेत् क्रमात् ॥ १६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलपञ्चचक्रैर्विराजितम् ।
पूर्वोक्ताभ्रकशङ्कु तत्पीठमध्ये दृढं यथा ॥ १७ ॥
पुनः पट्टिकापर्यन्त चक्रों के अनुसार दन्तपात्र—जिस में दान्ते हों—दान्ते लगे हों चक्रों को
घुमाने के लिये उसे स्थापित करके पुनः उस दन्तपात्र में शैवालद्रावक को भर के पश्चात् रविचुम्बक—
सूर्यतेज को खींचने वाले सूर्यकान्त और पारा डाले तन्त्रियों—तारों को लेकर शास्त्रानुसार उस में बन्द
कर शृङ्गी ? में नाल से ढक कर, उस नाल के मूल को आकाश में दृढ लगादे घूमनेवाले पांच कीलचक्रों
से वह नालमूल युक्त हो, जिस से पूर्व कहा अभ्रक शङ्कु पीठ के मध्य दृढ रहे ॥ १४-१७॥
स्थापयित्वा तस्य मूर्ध्नि पट्टिकां द्रवशोधिताम् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
यदा सन्ध्यन्तराज्ज्वालामुखशक्तिस्स्वभावतः ।
सम्भूय व्योमयानस्य मार्गान्ति प्रसार्यते ॥ १९ ॥
कीली सन्धारयेच्छङ्कुमुलकेन्द्रे तदा बुधः।
तेन तन्त्रीमुखाच्छ्रैत्यवेगस्पन्दनसंयुतः ॥ २० ॥
द्रवपात्रात्समुत्थाय पञ्चचक्रमुखान्तरात् ।
पूर्वोक्तपट्टिकामूलकेन्द्रं प्रविशति स्वयम् ॥ २१ ॥
पश्चात्तन्मुखमासाद्य शक्तिं ज्वालामुखामिधाम् ।
समाकृष्यातिवेगेन पट्टिकामूलकेन्द्रतः ॥ २२ ॥
‡ शौण्डीर मणि आगे कही हुई कृत्रिमणि है ।
† शृङ्गिण्या ? (हस्तलेखे पाठः)
२१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शङ्कु की मूर्धा में द्रवशोधित अभ्रकपट्टिका को स्थापित करे व्योमयान के आवरण के मध्य
भाग में शास्त्रानुसार जोड दे । जब ग्रहमागों के सन्धिरैखास्थान से ज्वालामुख शक्तिस्वभाव से ग्रहमार्गों से
परस्पर मिलकर व्योमयान के मार्ग तक प्रसारित की जाती है । तब बुद्धिमान् विद्वान् शंकुमूल के केन्द्र में
कीली को लगावे—बन्द करे उस से तन्त्रीमुखतार के सिरे से शीतता का वेग स्पन्दन करता हुआ पांच
चक्रों के मुख जिस में लगे हैं उस द्रावकपात्र से उठकर पूर्वोक्त पट्टिकामूलकेन्द्र में स्वयं प्रवेश करता है ।
पश्चात् उस मुख को प्राप्त कर ज्वालामुखनामक शक्ति को पट्टिकामूलकेन्द्र से अतिवेग से खींचकर-।१८-२२।
प्रदक्षिणावर्तकीलमध्यस्थितमणौ क्रमात् ।
सञ्चोदयति वेगेन तच्छक्ति तदनन्तरम् ॥२३॥
तन्मणिस्स्वकीयवेगेन समाकृष्यातिवेगत ।
सम्पूरयेन्नालमुखे तन्मूलात् खे लय व्रजेत् ॥२४॥
तेन यानस्थनॄणाञ्चामृत्यु
सूर्यशक्त्यपकर्षणीययन्त्र । [ २१७
शरद् और हेमन्त ऋतुओं की शीतता की निवृत्ति के अर्थ यथाविधि सूर्यशक्त्यपकर्षणीययन्त्र
अब निरूपित किया जाता है । सत्ताईसवें ? आदर्श से सूर्यशक्त्यपकर्ष कयन्त्र शास्त्रानुसार करे अन्यथा
निष्फल हो जावे ।
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे-वह दर्पणप्रकरण में कहा है-
स्फातिकमञ्जुलफेनसुवर्चान् सैकतपारदगरदकिशोरान् ।
गन्धकबुं रप्राणक्षारान् रविशशिपद्ममुखामरपक्षान् ॥३०॥
रविवसुदिङ्नक्षत्रविभागान् वेदानलसागरवसुभागान् ।
सायकपादप्रभूतविभागान् वसुमुनि निधिनेत्रविभागाशान् ॥३१॥
एतान् शुद्धान् चतुर्दशवस्तून तत्तद्भागानुक्रमेण ।
सम्पूर्यान्तर्मु खमूषाया तच्छुकमुख्यसटिकामध्ये ॥३२॥
सञ्ज्वाल्योष्णरसं पश्चात्सगृह्यान्तर्मु खयन्त्रबिले ।
शीघ्र सम्पूर्योक्तविधानात्कीलचक्रं भ्रमयेद् वेगात् ॥३३॥
स्फटिकमणि या फिटकडी, मजीठ, समुद्रफेन, सज्जीक्षार, हिंगुल-सिंगरक, पारा, गरद-बछनाग,
तलपर्णी, गुरुजा गन्धक, हरिताल, प्राणक्षार-नवसादर† ? ये सब क्रमशः १२, १, ५, १, १३,...., १२,
८, १०, २७, ४, ३, ७, ८, ५, १, ५, ८, ३, ६, २, भागर्शों के अनुक्रम से इन १४ शुद्ध वस्तुओं को
लेकर अन्तर्मु खमूषा* में भरकर शुकमुखमूषा के मध्य में गलाकर फिर गरम तरल को लेकर भीतर मुख
वाले छिद्र में शीघ्र भरकर कीलचक्र को वेग से घुमादे ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्म मृदुल शुद्ध पिञ्जलवर्णं भारविहीनम् ।
भद्र स्पर्शाच्छीतविमान मूत्रव्याधिविनाशकर च ॥३४॥
प्रभवेद् रविशक्त्यपकर्षदर्पणमेव क्रियते यदि सिद्धम् ॥ इत्यादि ॥
अतिसूक्ष्म मृदुल शुद्ध पिङ्गलवर्ण भारहीन भद्र स्पर्श से शीत विमान मूत्रव्याधिका नाशक हो
जावे रविशक्त्यपकर्षदर्पण इस प्रकार किया जाता है जब कि सिद्ध होता है ।
अशीत्यङ्गुलमायाम विशत्यङ्गुलविस्तृतम् ।
एकाङ्गुलघनादेतद्दर्पणात् पट्टिका दृढाम् ॥३५॥
कृत्वा पश्चाद् यथाशास्त्र तस्मिन् केन्द्रत्रये क्रमात् ।
प्रकल्प्य विधिबन्नालद्वय बाहुसमं ततः ॥३६॥
दशाङ्गुलस्य तद्दर्पणतः कुर्याद् दृढ यथा ।
अर्धचन्द्राकृति पीठ नालरूपमतः परम् ॥३७॥
अस्सी अंगुल लम्बे बीस अंगुल चौड़े एक अंगुल मोटे दर्पण से दृढ़ पट्टिका
बनाकर फिर यथाशास्त्र क्रम से उसमें केन्द्रत्रय में दो नालों को बाहु के समान विधिबत् फिर उस दर्पण
से दशांगुल मुख वाले बनावे, अर्द्धचन्द्राकृतिवाला नालरूप पीठ रचे ॥३५-३७॥
† नूसार नरसार भी कहते हैं प्राणों का या प्राणियों का क्षार प्राणक्षार नौसादर है । ( रसतरङ्गिणी )
- रेतीली पीली मिट्टी तुषराक्ष घारा मिलाकर बनी बोतल ( रसतरङ्गिणी )
२१८ ] [ बृहद्विमानशास्त्रे
रचयेद्वर्तुलं पश्चाच्चतुरस्रमथापि वा ।
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नतं तथा ॥३८॥
पीठान्तरं च तेनैव कृत्वा तस्मिन्नत. परम् ।
अर्धचन्द्राकृति नालपीठं सन्धारयेद् दृढम् ॥३६॥
पार्श्वयोरुभयोस्तस्य नालद्वयमथ क्रमात् ।
सन्धार्य मध्येऽष्टाशीत्यङ्गुलायामं तथैव च ॥४०॥
षडङ्गुलत्रयविस्तारं शङ्कुमेकं दृढं न्यसेत् ।
पूर्वोक्तपट्टिकां तस्य शिरोभागे दृढं यथा ॥४१॥
स्थापयेद्विधिवत् पश्चात् तस्य केन्द्रत्रये क्रमात् ।
उस पीठ को गोल बनावे या चतुष्कोण बनावे, दो बालिश्त लम्बा चौड़ा छ बालिश्त मोटा
दूसरा पीठ भी उसी से करके उसमें फिर अर्धचन्द्राकृति नाल पीठ दृढ रूप से जोड़ दे उसके दोनों पार्श्वों
में—दोनों आसपास भागों में दो नाल क्रम से जोड़कर मध्य में अठासी अंगुल लम्बा तीन अंगुल चौड़ा
मोटा एक शंकु दृढरूप में लगा दे फिर वह पूर्व कही पट्टिका उसके शिरोभाग अर्थात् सिरे पर विधिवत्
दृढ स्थापित करदे फिर क्रम से केन्द्रत्रय—तीनों केन्द्रों पर—॥३८-४१॥
तद्दर्पणकृतान् पद्मदलवद् दलसम्मितान् ॥४२॥
मध्ये च (छ ?) षकसंयुक्तान् सच्छिद्रान् द्विमुखाकृतीन् ।
पद्माकारान् सुसन्धायावर्तकीलशङ्कुभिः ॥४३॥
बध्नीयात् सुदृढं पश्चाच्छैवालद्रावकं तथा ।
शृङ्गिद्रवं च संशुद्धं सप्रमाणं यथाविधि ॥४४॥
नालद्वयेथ संपूर्य तस्मिन् छायामुखं मणिम् ।
न्यसेत्तच्छङ्कुमूलेऽथ ज्योत्स्नाद्रावं न्यसेत् क्रमात् ॥४५॥
शैत्यापहारकान् तन्त्रीन् सकीलान् मञ्जुलावृतान् ।
ज्योत्स्नाद्रावकंमध्ये संस्थापयेदथ बन्धयेत् ॥४६॥
तन्त्रीन् पार्श्वस्थनालमध्यादाहृत्य शास्त्रतः ।
पट्टिकापार्श्वकमलकेन्द्रयोरुभयोः क्रमात् ॥४७॥
संवेष्ट्य च पुनस्तत्केन्द्राभ्यामाहृत्य यत्नतः ।
पट्टिकामध्यकमलमावेष्ट्याथ पुनः क्रमात् ॥४८॥
पद्मपत्र की भांति पत्ते के आकार में उस दर्पण के बने हुए—बीच में
पात्रयुक्त सच्छिद्र दो मुखों की आकृतिवाले पद्मरूप—कमलरूप जैसों को रखकर या
जड़कर घुमानेवाली कीलोंवाले शंकुओं से सुदृढ़ बान्ध दे पश्चात् शैवालद्रावक—जलकाई का द्रावक
और शृङ्गि-शृंग या सूणि का द्रव ?–नीलाथोथा शुद्ध यथाविधि मापसहित दो नालों में भरकर उस
छायामुखमणि ? को डालदे क्रम से शंकुमूल में ज्योत्स्नाद्राव-मालकंगनी का तैल फिर शीतता हटानेवाले
सूर्यशक्त्यपकर्षणयन्त्र ] [ २१६
कीलसहित तन्त्री तारों को जो मन्जुलों—अंजीरों से आवृत्त हों अंजीर यहां गोली हो सकती है उन
तन्त्रियों—तारों को ज्योत्स्नाद्रावक में रखदे और बान्धदे, उन तारों को शास्त्रानुसार पार्श्ववाले नाल में
से निकालकर पट्टिकापार्श्वों के कमलाकार वाले स्थानों के दोनों केन्द्रों में लपेटकर पुन' उन केन्द्रों से
यत्नपूर्वक निकालकर पुनः क्रमशः पट्टिकामध्यकमल पर लपेट कर—
तत्पश्चाद्भागस्तन्त्रीन् समाहृत्य यथाविधि ।
शङ्कुमूलस्थितज्योत्स्नाद्रावके सन्निवेशयेद् ॥४६.।
पश्चान्नालान्तरात्तत्पात्रमाच्छाद्य समग्रत ।
तन्नालमूलाधोभागे व्योम्नि प्रकल्पयेत् ॥५०॥
यदा हेमन्तशिशिरशैत्यव्याप्तिर्विमानके ।
दृश्येत तत्क्षणादेव शङ्कुमूलस्थित क्रमात् ॥५१॥
बृहच्चक्रमुख कील भ्रामयेदतिवेगत ।
पूर्वोक्तपट्टिकाकेन्द्रस्थिततन्त्रीप्रचालनम् ॥५२॥
भवेत्तेनातिवेगेन पार्श्वस्थकमलान्तरात् ।
सम्भूयात्यन्तचलनाद् वायुशैत्यं प्रकर्षति ॥५३॥
तच्छैत्य पुनराहृत्य तद्वायुरतिवेगत. ।
पट्टिकामध्यकमलच(छ?)षके तन्त्रिभिस्स्वयम् ॥५४॥
उसके पिछले भाग से तारों को यथाविधि समेटकर या लेकर शंकुमूल में पड़े ज्योत्स्नाद्रावक-
मालकंगुनीवैल में डालदे। पुन दूसरे नाल से पात्र को सब ओर से पूरा ढककर उस नालमूल को यान
के नीचले भागवाले आकाश में युक्त करदे । जब हेमन्त शिशिर ऋतुओं की शीतता की व्याप्ति विमान
में दिखलाई पड़े तो तत्क्षण ही कम से शकुमूलस्थित बड़े चक्र मुखवाली कील-पेंच को अतिवेग से
घुमादो तो पूर्वोक्तपट्टिकाकेन्द्रस्थित तार चल पड़े उससे अति वेग से पार्श्वों में स्थित
दूसरे कमल से मिलकर अत्यन्त चलन से वायु शीतता को खींच लेता है फिर उस शीतता को खींचकर
वह वायु अतिवेग से पट्टिकामध्यकमलवाले चषक पात्र में स्वयं तारों से—॥४६--५४॥
संयोजयति वेगेन पश्चान्नालद्वयान्तरे ।
प्रविशेत्तच्छैत्यशक्ति पश्चान्नालसस्थिनौ ॥५५॥
शैवालशृङ्गिणामानौ द्रावकावतिवेगत ।
तच्छैत्यशक्तिमाहृत्य छायामुखमणौ क्रमात् ॥५६॥
वेगेन संयोजयत पश्चादत्यन्तवेगतः ।
तन्मरिणस्स्रवियैवेगेन तच्छक्तिं तन्त्रिभि. क्रमात् ॥५७॥
शङ्कुमूलस्थितज्योत्स्नाद्रावके सन्निवेशयेत् ।
द्रावकाद् व्योम्नि तन्नालात्तच्छक्तिर्लयमेशते ॥५८॥
पश्चात्तच्छैत्यसम्बन्धविषनाशो भवेद् ध्रुवम् ।
२२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तेन यानप्रयातॄणामत्यन्तसुखदं भवेत् ॥५६॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सूर्यशक्त्यपकर्षकम् ।
यन्त्र संस्थापयेद् यानोपरि शास्त्रविधानतः ॥६०॥ इत्यादि
दो नालों के अन्दर संयुक्त करता है फिर वह शैत्यशक्ति नालस्थ शैशाल और सूक्ष्मात्मक
द्रावकों में अतिवेग से प्रविष्ट हो जाती है, उस शैत्यशक्ति को क्रम से खींचकर छायामुखमणि में वेग से
संयुक्त करते हैं वह मणि अपने वेगसे उस शक्तिको क्रम से तारों के द्वारा शंकुमूलस्थित ज्योत्स्नाद्रावक
में डाल दे, द्रावक आकाश में उस नालसे शक्ति लय-नाश को प्राप्त होती है । पश्चात् उस शैत्यसम्बन्ध
विप्रयोग-घातकप्रभाव का निश्चय नाश हो जाता है । इससे व्योमयान के यात्रियों के लिये अत्यन्त
सुखद हो जाता है अतः सर्वप्रयत्न से सूर्यशक्त्यपकर्षक यन्त्र को व्योमयान के ऊपर शास्त्रोविधि से
संस्थापित करे ॥५५-६०॥
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र—
इत्युक्तवाशास्त्रविधिना सूर्यशक्त्यपकर्षकम् ।
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्रमतः परम् ॥६१॥
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्र यथामति ॥
यह शास्त्रविधि से सूर्यशक्त्यपकर्षकयन्त्र कहकर अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र यहां से आगे
शास्त्रानुसार यथामति संक्षेप से कहूंगा ।
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
स्वकीयव्योमयानस्य विनाशार्थं यदा क्रमात् ॥६२॥
परेषा व्योमयानावरणं च प्रभवेद् यदि ।
तन्निवारयितुं वेगात् सन्धिनालमुखोत्तरे ॥६३॥
यानस्य स्थापयेद् धीमान् यानतत्त्वविदां वरः ।
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र दृढ यथा ॥६४॥ इत्यादि
अपने व्योमयान—विमान के विनाशार्थ जब क्रमशः दूसरों के—शत्रुओं के व्योमयानों का
घेरा यदि प्रबल हो जावे
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र ] [ २२१
यन्त्र कहते हैं, क्षौण्डीर लोहे से यह यन्त्र बनाना चाहिए अन्यथा नहीं, अन्य लोहे से करके स्वयान
नाश को प्राप्त हो जाता है ॥ ६५-६६ ॥
क्षौण्डीरलोहमुक्तं लोहतन्त्रे- क्षौण्डीरलोहा लोहतन्त्र में कहा है—
द्विवङ्गाष्टक पारदपञ्चकं च वीरत्रयं क्रौञ्चिकसप्तक तथा ।
कान्तत्रय हंसचतुष्टयं च माध्वीकमेक रुरुपञ्चक क्रमात् ॥ ६७ ॥
एतान् विशुद्धान् वरमूषिकाया सम्पूर्य छत्रीमुखकुण्डमध्ये ।
संस्थाप्य पश्चात्सुरसाख्यभस्त्रात् संगालयैत् कक्षयशतोष्णवेगात् ॥ ६८ ॥
पश्चात्समाहृत्य शनैश्शनै क्रमात् सम्पूरयेद् यन्त्रमुखे च तद्रसम् ।
एव कृतेऽत्यन्तमनोहरं दृढ क्षौण्डीरलोह प्रभवेद् विशुद्धम् ॥६६॥ इत्यादि ।
द्विवङ्गा-लोहविशेष ८ भाग, पारा ५ भाग, लोहा ३ भाग, क्रौञ्चिक कृत्रिमलोहा ७ भाग,
चुम्बक ३ भाग, हंस-रूपाधातु ४ भाग, माध्वीक-लोहभेद १ भाग, रुरु-धातुविशेष इन शुद्ध हुओं को
वरमूषिकानामक कृत्रिम बोतल में भरकर छत्रीमुखकुण्ड के बीच में भरकर पश्चात् सुरसानामक भस्त्रा से
सौ दर्ज की उष्णता से गलावे, पश्चात् लेकर धीरे धीरे क्रम से उस पिघले द्रव को यन्त्रमुख में डालदे,
ऐसा करने पर अत्यन्त मनोहर दृढ क्षौण्डीर लोहा अच्छा बन जाता है ॥ ६७-६६ ॥
पट्टिकायन्त्रमध्येऽथ क्षौण्डीरं स्थाप्य वेगत ।
कीलीसञ्चालनात्सम्यक् सन्ताड्य त्रिशतोष्णत ॥ ७० ॥
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा शुद्धा पट्टिका कारयेद् दृढाम् ।
एतत्पट्टिकया कुर्यात्पञ्चबाहून्नत तथा ॥ ७१ ॥
बाहुत्रितयविस्तार भस्त्राकार यथाविधि ।
मुखनालेन सयोज्य षड्वितस्तिप्रमाणत ॥ ७२ ॥
पेषिणीयन्त्रवत् कार्यं तन्मुख सुदृढ तथा ।
तन्मुखाच्छादनार्थाय मुखावरणाकीलकम् ॥ ७३ ॥
सन्धारयेत्ततस्तस्य मूले कोशत्रयं क्रमात् ।
कल्पयित्वा मध्यभागे सकीलं वर्तुलं मृदुम् ॥ ७४ ॥
क्षौण्डीर लोहे को पट्टिकायन्त्र के मध्य स्थापित करके वेग से कीली सञ्चालनद्वारा ताडन करके
तीन सौ दर्जे की उष्णता से शुद्ध दृढ पतली से पतली पट्टिका बनावे इस पट्टिका से पांच बाहू उठा हुआ
तीन बाहु लम्बा भस्त्रा के आकार का करे, उसे मुखनाल से जोडकर छः बालिश्त माप से पेषिणीयन्त्र-
चक्की के समान वह दृढ मुख करना चाहिए, उस मुख के आच्छन्नार्थ मुखावरणाकील लगावे, उसके मूल
में तीन कोश-कोठे रखकर मध्यभाग में कीलसहित कोमल- ॥ ७०-७४ ॥
शशचर्मसमायुक्तं कुर्यादावरणं ततः ।
धूमपूरककीली तन्मूले सन्धारयेद् दृढम् ॥ ७५ ॥
२१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तदूर्ध्वे चूर्णपात्रं स्थापयेद् विधिवद् दृढम् ।
कीलीमुखं तत्पात्रकुक्षिमूले नियोजयेत् ॥ ७६ ॥
एव क्रमेण चत्वारि भस्त्रान् कुर्याद् यथाविधि ।
परयानावरणकाले यानावरणभस्त्रकात् ॥ ७७ ॥
कृत्वा विमानावरणं पश्चात्तदुपरि क्रमात् ।
दिक्पीठोपरि पूर्वोक्तभस्त्रिकान् स्थाप्य सत्वरम् ॥
विद्युत्संयोजनं कुर्याच्चूर्णपात्रान्तरे क्रमात् ।
तत्क्षणाद् धूमता याति तच्चूर्णमतिवेगत ॥ ७८ ॥
शशचर्म युक्त आवरण करे, उसके मूल में धूम भरनेवाली कीली दृढ लगावे उस के ऊपर चूर्णपात्र
विधिवत् दृढ रखे, उस पात्र के कुक्षिमूल में कीली का मुख युक्त करे इस प्रकार से चार भस्त्रों-धोकनियों
को यथाविधि लगावे, दूसरे के-शत्रु के यानों के आवरणकाल में यानावरण भस्त्रक-धोकने से
विमानावरण करके पश्चात् क्रम से ऊपर दिक्पीठ के ऊपर पूर्वोक्त भस्त्रिकों को शीघ्र स्थापित करके चूर्ण-
पात्र में विद्युत का संयोजन करे वह चूर्ण अतिवेग से धूमता को प्राप्त हो जावेगा धूंवा बन जावेगा-
भस्त्रिकामुखमुद्घाट्य पश्चात् कीलीं प्रचालयेत् ।
तेन प्रसारितो धूमो सूक्ष्मभस्त्रत्रये क्रमात् ॥ ७९ ॥
प्रविश्य तन्मुखेभ्योऽथ मध्यकुण्डान्तरे क्रमात् ।
प्रविश्यपूरणात् सर्व व्याप्य पश्चाद् यथाक्रमम् ॥८०॥
भस्त्रिकामुखपर्यन्तमतिवेगेन धावति ।
पश्चात्कीलकसन्धानात्परयानोपरि क्रमात् ॥ ८१ ॥
एककाले चतुर्दिक्षु सर्वतोमुखत स्वयम् ।
व्याप्याथापस्मारधूम. परयानान् समग्रत. ॥ ८२ ॥
परेषा तत्क्षणात् स्वीयशक्तिप्रधानत. ।
करोत्यपस्मारवशान् सर्वान् शत्रून्न संशय. ॥ ८३ ॥
तेन सर्वे विमानाग्रात् पतिष्यन्त्यवनीतले ।
परयानविनाश च स्वयानपरिपालनम् ॥ ८४ ॥
भवेत् तेन ततस्सर्वे सुख यान्ति विमानगाः ।
तस्मादेतद्यन्त्र वर विमाने स्थापयेत्सुधी. ॥ ८५ ॥ इत्यादि ॥
भस्त्रिका के मुख को खोलकर फिर कीली चलावे उस से फैलाया हुआ धूंआं सूक्ष्म तीन भस्त्रों
में-धोकनों में क्रम से प्रविष्ट होकर उनके मुखों से मध्यकुण्ड के अन्दर प्रविष्ट होकर भर जाने से सर्वत्र
व्याप्त हो पश्चात् क्रमानुसार भस्त्रिकामुखपर्यन्त अत्यन्त वेग से दोडता है, फिर कील बन्द करने से-पर
विमानयानों के ऊपर एक समय में चारों दिशाओं में सर्वतोमुख हो स्वयं अपस्मार धूंआं सभी परविमान-
यानों को व्याप्त हो अपनी विषशक्ति की प्रधानता से सब शत्रुओं को निःसंशय अपस्मार के वश-अचेत
स्तम्भनयन्त्र ] [ ३२१
कर देता है उस से सब विमानस्थान से भूमितल पर गिर आवेंगे परविमानयानविनाश और स्वविमान-
यान का परिपालन = बचाव हो जाता है उस से अपने विमान में चलनेवाले सुख से जाते हैं—यात्रा
करते हैं अतः इस श्रेष्ठ यन्त्र को बुद्धिमान् स्थापित करे ॥ ७९—८५ ॥
स्तम्भनयन्त्र—
इत्युक्तवापस्मारधूमयन्त्र शास्त्रविधानतः ।
इदानीं स्तम्भनयन्त्रं यथाविधि निरूप्यते ॥ ८६ ॥
इस प्रकार अपस्मारधूमयन्त्र शास्त्रविधान से कहकर अब स्तम्भनयन्त्र विधि के अनुसार
निरूपित किया जाता है ॥ ८६ ॥
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ या प्रकरण में—
यदा तु वारिपरिधिरेखामण्डलसन्धिषु ।
शक्त्युद्रेको यदि भवेन्महाविषसमाकुल ॥ ८७ ॥
प्रचण्डमारुतोद्रेको भवेद्यत्यन्तदारुण ।
तत्तत्सन्धिषु वातानां पश्चाद् युद्धं भविष्यति ॥ ८८ ॥
तेनाकाशे भवेद् वातप्रवाहस्सर्वतोमुख ।
तत्सम्पर्काद् याननाशस्तत्क्षणात्स्तम्भविष्यति ॥ ८९ ॥
तस्मात्तत्परिहाराय यानाधोभागकेन्द्रके ।
संस्थापयेत्स्तम्भनाख्ययन्त्रं शास्त्रविधानतः ॥ ९० ॥ इत्यादि ।
जब कभी वारिपरिधि रेखामण्डल सन्धियों में आकाशीयमण्डल शक्ति का उद्रेक-उत्थान महाविष
से पूर्ण हो तब प्रचण्ड मारुतोद्रेक-वायव्य उत्थान अत्यन्त दारुण होता है पुन उन सन्धियों में वायुओं
का युद्ध हो जावेगा, उस से आकाश में सब ओर वायु का प्रवाह चलने लगे, उस के सम्पर्क से तुरन्त
विमानयान का नाश हो जावेगा, अतः उसके परिहार के लिये विमान के नीचे के भागवाले केन्द्र में
शास्त्रानुसार स्तम्भननामकयन्त्र स्थापित करे ॥ ८७—९० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
वातप्रवाहसंसर्गपरिहाराय केवलम् ।
विमानस्तम्भनयन्त्रं यथामति निरूप्यते ॥ ९१ ॥
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा वक्रतुण्डाख्यलोहतः ।
विमानपीठभ्रामणो चतुर्थांशप्रमाणतः ॥ ९२ ॥
घने वितस्तित्रितय पीठमन्यत्प्रकल्पयेत् ।
ईशानादिक्रमात्तस्मिन्नष्टदिक्षु यथाक्रमम् ॥ ९३ ॥
केन्द्राणि विधिवत् कुर्यात्सच्छिद्रावरणं यथा ।
आवर्तदन्तसंयुक्ताश्चक्राणि विधिवत्क्रमात् ॥ ९४ ॥
अनुलोमविलोमैश्च कुर्यात्तेनैव लोहतः ।
२२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वावर्तकीलसंयुक्तांश्चक्रदण्डान् यथाविधि ॥ ६५ ॥
त्रिवृत्करणतो लोहरज्जुच्छिद्रानुसारतः ।
कुर्यात्तेनैव लोहेन शङ्कुकीलादयः क्रमात् ॥ ६६ ॥
अन्तश्चक्रयुतान्नालस्तम्भान्तन्त्रीसमाकुलान् ।
ईशान्यादिक्रमात्केन्द्रस्थानेषु स्थापयेत् क्रमात् ॥ ६७ ॥
वायुप्रवाहों के संसर्ग — संघर्षण के हटाने या प्रतीकार के लिये ही विमानस्तम्भन यन्त्र यथा-
मति निरूपित किया जाता है। वक्रतुण्ड नामक लोह से चतुष्कोण-चौकोर या गोल विमान पीठ के
भ्रमण में चतुर्थांश प्रमाण से, घन में मोटाई में तीन बालिश्त अन्य पीठ बनावे ईशान आदि के क्रम से
उसमें आठ दिशाओं में यथाक्रम केन्द्र बनावे तथा छिद्रसहित आवरण भी घूमनेवाले दांतों से युक्त चक्र
विधिवत् क्रमशः अनुलोम और विलोमों से करे उसी लोह से, घूमने वाली कीलों से संयुक्त चक्रदण्डों
को यथाविधि तीन लपेट वाली लोहे की रस्सियों को छिद्र के अनुसार बनावे । उसी लोहे से शंकु कोल
आदि भी क्रम से बनावे। भीतरी चक्रयुक्त तारों से घिरे हुए नालस्तम्भों को क्रम से ईशानी आदि
केन्द्रस्थानों में स्थापित करे ॥ ६१-६७ ॥
विमानाङ्गोपसंहारस्थाननालमुखान्तरात् ।
सकीलतन्त्रीनाहृत्य नालस्तम्भान्तरात्पुनः ॥ ६८ ॥
अन्तर्नालैस्समाकृष्य मध्यकेन्द्रावधि क्रमात् ।
पीठमध्यावर्तकीलस्तम्भमूलान्तरे क्रमात् ॥ ६९ ॥
तच्छिद्रमुखे कीलशङ्कुभिर्बन्धयेद् दृढम् ।
द्वावर्तकीलस्तम्भस्तु पीठमध्ये निवेशयेत् ॥ १०० ॥
पूर्वोक्तवातप्रवाहो यदा सन्दृश्यते क्रमात् ।
तदा यानाङ्गोपसंहारकीलकं प्रचालयेत् ॥ १०१ ॥
तेन यानस्सङ्कुचितो भवेत्पश्चात्तथैव हि ।
पश्चादष्टाङ्गकीलचक्राणि भ्रामयेद् दृढम् ॥ १०२ ॥
तेन वेगोपसंहारो विमानस्य भवेत् क्रमात् ।
पश्चात् पीठस्थाष्टनालस्तम्भकीलान् प्रचालयेत् ॥ १०३ ॥
विमानाङ्गों के उपसंहारस्थान में वर्तमान नालमुखों के अन्दर से कीलसहित तारों को निकाल
कर फिर नालस्तम्भ के अन्दर से भी भीतरी नालों से खींच कर मध्य केन्द्र की अवधि के क्रम से और
पीठ में लगी घूमने वाले कीलस्तम्भों में उस उस छिद्र मुख में कीलशंकुओं द्वारा दृढ बांध दे और घूमने
वाले कीलस्तम्भों को पीठ में लगा दे । पूर्वोक्त वातप्रवाह जब दिखलाई पडे तब विमानयानाङ्गों का
उपसंहार करने वाली कील को चलावे, उससे फिर विमानयान संकुचित हो जावे पश्चात् अष्टाङ्ग—आठ
अङ्गों से सम्बन्ध रखने वाले कील चक्रों को दृढरूप से घुमा दे उस विमान का वेगोपसंहार क्रमशः हो
जावे पश्चात् पीठ में स्थित अष्टनाल स्तम्भ की कीलों को चलावे ॥ ६८-१०३ ॥
वैश्वानरनालयन्त्र ] [ २२५
विमानवेगसर्वस्वं तेन संशान्तिमेधते ।
पीठमध्यस्थितदण्डकीलं तदनन्तरम् ॥ १०४ ॥
भ्रामयेदतिवेगेन तेन स्तम्भो दृढो भवेत् ।
स्तम्भप्रतिष्ठा यानान्तं पीठे यदि भवेद् दृढम् ॥ १०५ ॥
तत्क्षणादेव यानस्य स्तम्भनं प्रभवेद् दृढम् ।
पक्षाघातककीलकं च भ्रामयेत्तदनन्तरम् ॥ १०६ ॥
वायूत्पत्तिर्भवेत् तेन तद्वातः सर्वतोमुखात् ।
विमानमूलमावृत्य मण्डलाकारतस्स्वयम् ॥ १०७ ॥
विमानं धारयेत्पश्चाद् विद्युत्स्थानाद् यथाविधि ।
पृथिव्यन्तं शक्तिनालशलाकं कीलचालनात् ॥ १०८ ॥
स्थापयेत् सुदृढं तेन यानस्त्वचलतां व्रजेत् ।
तस्माद् वातप्रवाहेण(न?) यानसंरक्षणं भवेत् ॥ १०६ ॥
अतस्सर्वप्रयत्नेन यानाधोभागकेन्द्रके ।
यानस्तम्भनयन्त्रं च स्थापयेत्सुदृढं यथा ॥ ११० ॥ इत्यादि ॥
उससे विमान वेग का सर्व बल या कल पुरजा शान्ति को प्राप्त हो जाता है पुनः पीठ के मध्य
में स्थित दण्ड की कील को अतिवेग से घुमावे उससे स्तम्भ दृढ हो जावे—स्थिर हो जावे, यदि स्तम्भ
प्रतिष्ठा—स्तम्भ की स्थिरता यान के भीतर पीठ में हो जावे तो उसी समय या तुरन्त यानस्तम्भन हो
जावे । पश्चात् पक्षाघातक—एक ओर को ठोकर देने वाली कील को घुमावे तो उससे वायु की उत्पत्ति
हो जावे वह वायु सब ओर से विमान के मूल को चक्राकार से स्वयं घेर कर विमान को धारण कर ले
सम्भाल ले थाम ले फिर विद्युत् के स्थान से यथाविधि पृथिवीपर्यन्त शक्तिनाल शलाका को कीलचालन
से सुदृढ स्थापित करे उससे विमान यान अचलता को प्राप्त हो जावे उससे वातप्रवाह से यान का संरक्षण
हो जावे अतः सर्व प्रयत्न से विमान के नीचले भाग वाले केन्द्र में यानस्तम्भ यन्त्र सुदृढ स्थापित
करे ॥ १०४-११० ॥
वैश्वानरनाल यन्त्र—
एवमुक्त्वा स्तम्भनाख्ययन्त्रं शास्त्रानुसारतः ।
वैश्वानरनालयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥ १११ ॥
इस प्रकार स्तम्भन नामक यन्त्र शास्त्रानुसार कहकर वैश्वानर नाल यन्त्र अब कहते हैं ॥१११॥
उक्तं हि क्रियासारे--कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
खेटयानप्रयातु णामग्निहोत्रार्थमादरात् ।
पाकार्थं च विशेषेण अग्निरनावश्यक्यो भवेत् ॥ ११२ ॥
तस्मात् पावकदानार्थं यानाभिमुखान्तरे ।
वैश्वानरनालयन्त्रमपि संस्थापयेद् बुधः ॥ ११३ ॥
२२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
खेटयान-विमान के यात्रियों के अग्निहोत्रार्थ आदर से तथा विशेषतः पाकार्थं अग्नि
आवश्यक है उससे अग्नि देने के लिये विमान के सामने अन्दर वैश्वानरनालयन्त्र बुद्धिमान् स्थापित
करे ॥ ११२-११३ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
खेटयानप्रयातॄणामग्निसिद्ध्यर्थमेव हि ।
वैश्वानरनालयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥ ११४ ॥
वितस्तिद्वयमायामं द्वादशाङ्गुलविस्तृतम् ।
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा नागलोहेन शास्त्रतः ॥ ११५ ॥
पीठं कृत्वा ततस्तस्मिन् कुर्यात् केन्द्रत्रयं क्रमात् ।
ताम्रखर्परसम्मिश्रलोहात् पात्राणि कारयेत् ॥ ११६ ॥
गन्धकद्रावकं शुद्धमेकपात्रे प्रपूरयेत् ।
रूक्षाद्रावकमेकस्मिन् पात्रे तद्विनियोजयेत् ॥ ११७ ॥
माञ्जिष्ठिकाद्रावकं च न्यसेत् पात्रान्तरे तथा ।
एतानि द्रवपात्राणि पीठकेन्द्रेषु स्थापायेत् ॥ ११८ ॥
मणिं प्रज्वलकं नाम गन्धकद्रावके न्यसेत् ।
तथैव धूमास्यमणिं रूक्षाद्रावके ततः ॥ ११९ ॥
माञ्जिष्ठिकाद्रावके तु महोष्णिकमणिं न्यसेत् ।
विमाने पाकशालाश्च यत्र यत्राग्निहोत्रिणः ॥ १२० ॥
विमान के यात्रियों के अग्निहोत्रार्थ वैश्वानर नालयन्त्र—अग्नि प्रज्वालन यन्त्र अब कहते हैं ।
दो बालिश्त लम्बा बारह अंगुल चौड़ा अर्थात् मोटा चतुष्कोण या चारों ओर से गोल शास्त्रानुसार नाग
लोहे से पीठ करके उसमें कम से तीन केन्द्र (मीटर ?) करे ताम्बे खपरिये-जस्ते ? से मिले लोहे
से पात्र बनाए, शुद्ध गन्धकद्रावक—गन्धक रस (तेजाब) एक पात्र में भर दे, एक पात्र में रूक्षाद्रावक
दन्तीतैल या रस ? नियुक्त करदे डाल दे, तीसरे पात्र में माञ्जिष्ठिकाद्रावक—मजीठ का तैल ? रस
डाल दे, इन द्रवभरे पात्रों को पीठ के केन्द्रों में रखे । प्रज्वलक मणि गन्धकद्रावक में डाल दे ऐसे ही
धूमास्य मणि रूक्षाद्रावक में और माञ्जिष्ठिकाद्रावक में तो महोष्णिक मणि डाल दे । विमान में जहां
जहां पाकशालाएं और अग्निहोत्री हों—॥११४-१२०॥
स्थापयेत्कीलकस्तम्भान् तत्र तत्र दृढं यथा ।
द्रवपात्रान्तरे तन्त्रीन् भद्रमुष्ट्याख्यकीलके ॥ १२१ ॥
त्रिसंख्याकान् प्रबध्नीयाद् यथाशास्त्रमतः परम् ।
मूलस्तम्भ समारभ्य द्रवपात्रान्तमेव हि ॥ १२२ ॥
तन्त्रीत्रयं समाहृत्य मण्यग्रे योजयेत्क्रमात् ।
स्तम्भाग्रे चुम्बुकीकीलमध्ये ज्वालामुखीयमणिम् ॥ १२३ ॥
वैश्वानरनाल्यन्त्र ] [ २२७
काचावरणातस्स्थाप्य पश्चात्तत्पार्श्वयोः क्रमात् ।
सिञ्जीरकर्मणिं तद्वद्रुटि(ह्रडि?)काख्यमणिं क्रमात् ॥ १२४ ॥
संधायं पश्चादेकैकंमणिमूलाद् यथाविधि ।
एकैकतन्त्रीमाहृत्य मध्यस्तम्भाप्रकीलकात् ॥ १२५ ॥
स्तम्भमूले ग्रन्थिकीलमुखान्तं सन्नियोजयेत् ।
तदारभ्य यथाशास्त्र चुल्लिकान्तं तथैव हि ॥ १२६ ॥
अग्निहोत्रस्य कुण्डाग्रावधि याने ऋ(रु?) जुर्यथा ।
वर्तुलं कुल्यवत्कृत्वा लोहनालान्ततः परम् ॥ १२७ ॥
तस्मिन् संधाय विधिवत् पश्चात्तन्त्रीन् यथाक्रमम् ।
तत्तन्नालेषु सयोज्य चुल्लिकासु तथैव हि ॥ १२८ ॥
वहां वहां कीलस्तम्भों को दृढ स्थापित करे, द्रवपात्रों के अन्दर तीन तारों को भद्रमुष्टिनामक
कील में शास्त्रानुसार बान्ध दे पुनः मूलस्तम्भ से लेकर द्रवपात्रपर्यन्त तीन तारों को निकालकर मणियों
के आगे क्रमशः युक्त कर दे - फिट करदे । स्तम्भाग्र में चुम्बककील में ज्वालामुखी मणि को कांच के
ढकने में स्थापित करके दोनों पार्श्वों में सिञ्जोरकर्मणि उसी भांति ऋडिकाख्यमणि को‡ क्रम से लगाकर
एक एक मणिमूल से एक एक तार लेकर मध्यस्तम्भ की अप्रकील से स्तम्भमूल में ग्रन्थिकील के मुख तक
नियुक्त करे । उसे यथाशास्त्र अङ्गीठी ( हीटर ) तक लावे अग्निहोत्र के कुण्डाग्र तक यान में
आवे । गोल कुल्य की भांति बनाकर लोहनाल के अन्त से परे उस में विधिवत् तारों को यथाक्रम जोडकर
उस उसके नाल में संयुक्त कर —जोड़कर तथा अङ्गीठी (हीटर) में जोड़कर -
अग्निहोत्रस्य कुण्डेषु समाहृत्य यथाविधि ।
तत्रत्यखर्परकृतपट्टिका संन्यसेद् दृढम् ॥ १२६ ॥
आदौ भ्रामयेद् भद्रमुष्टिकीलकमद्भुतम् ।
द्रवपात्रस्थितद्रावकोऽत्यन्तोष्णत्वतामियात् ॥ १३० ॥
रूक्षद्रावकसञ्जातोष्णो माक्षिकिकामणौ ।
संधाप्य धूम जनयेन्महोष्णकमणौ तथा ॥ १३१ ॥
तद्द्वावकोष्णवेगेन महोष्णात्सम्प्रजायते ।
पश्चाद् गन्धकद्रावकस्थमणी प्रज्वलिकाभिधे ॥ १३२ ॥
ज्वालोत्पत्तिर्भवेत्तद्द्वावकोष्णव्याप्तितस्तथा ।
धूमोष्णाज्वालकाः पश्चात्तत्तत्तन्त्रीमुखास्स्रवतः ॥ १३३ ॥
सिञ्जीर त्रुटि(ऋडि?)काज्वालामुखीमणिषु वेगतः ।
व्याप्नुवन्ति ततश्चुम्बककीलं च यथाविधि ॥ १३४ ॥
अग्निहोत्र के कुण्डों में यथाविधि सञ्चित कर वहां की खपरिया-जस्ते की पट्टिकाओं में दृढ
‡ ये मणियां कृत्रिम हैं बनाई जाती हैं । (देखो पीछे मणिप्रकरण )
२२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रूप में जोड़ दे, आदि में अद्भुत भद्रमुष्टिकीक को घुमावे तो द्रवपात्रस्थित द्रावक अत्यन्त उष्णता को
प्राप्त हो जावे रुक्षाद्रावक से उत्पन्न उष्णत्व मञ्जिष्ठिकामणि में भली भांति व्याप्त होकर धूवां उत्पन्न करदे
और महोष्णिकामणि में उस द्रावक के उष्णवेग से महोष्णता प्रकट हो जावे पश्चात् गन्धकद्रावकस्थ
प्रज्वलितिकानामक मणि में ज्वाला की उत्पत्ति हो जावे उस द्रावक की उष्णीता की व्याप्ति से धूमोष्णज्वालक
तारमुखरूप सिङ्गीररुटिका ज्वालामुखीमणियों में वेग से व्याप्त हो जाती हैं। फिर चुम्बकीकील को
यथाविधि- ॥ १२६-१३४ ॥
भ्रामयेदतिवेगेन पश्चाद् धूमोष्णज्वालकाः ।
तन्त्रीमुखात्स्वभावेन धूमस्तम्भाग्रकील कम् ॥ १३५ ॥
व्याप्नुवन्त्यतिवेगेन तत्कील भ्रामयेत् तत ।
स्तम्भमूलग्रन्थिकीलौ तद्द्वेगात्सविशन्ति हि ॥ १३६ ॥
तत्कीलभ्रमणादेव चुल्लिका पट्टिकान्तरे ।
धूमोष्णज्वाला विशिखाः प्रविशन्ति यथाक्रमम् ॥१३७॥
तथानिहोत्रकुण्डस्यपट्टिकास्वपि वेगत ।
पश्चाद् वैश्वानरोत्पत्तिस्तत्र तत्र भवेद् ध्रुवम् ॥१३८॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन विमानाभिमुखे क्रमात् ।
वैश्वानरनालयन्त्रमपि संस्थापयेत्सुधीः ॥ १३६ ॥
एवमुक्त्वाङ्गयन्त्राणि इदानी शास्त्रतः क्रमात् ।
व्योमयान प्रवक्ष्यामि सग्रहेण यथामति ॥ १४० ॥ इत्यादि ।
—अति वेग से घुमावे पश्चात् धूमोष्णज्वालाए' स्वभावतः तारों के मुख से धूमस्तम्भाग्रकील को
अतिवेग से व्याप्त हो जाती हैं, पुन उस कील को घुमादें फिर स्तम्भमूलग्रन्थीकीली को वे ज्वालाए
प्रविष्ट हो जाती हैं, उस कीली के भ्रमण से ही अङ्गीठी (हीटर) की पट्टिका के अन्दर धूमोष्णज्वालाओं
की विविध लहरें यथाक्रम प्रविष्ट हो जाती हैं इसी प्रकार अग्निहोत्रकुण्ड की पट्टिकाओं में भी वेग से
प्रविष्ट हो जाती हैं पुन' वहां वैश्वानर-अग्नि की उत्पत्ति उस उस स्थान में निश्चित हो जावे । अतः
सर्वप्रयत्न से विमान के सामने क्रम से वैश्वानरनालयन्त्र भी बुद्धिमान् संस्थापित करे। इस प्रकार
अङ्गयन्त्रों को कहकर शास्त्रानुसार क्रम से व्योमयान को संक्षेप से यथामति कहूंगा ॥ १३५-१४० ॥
𑁍
हस्तलेख कापी संख्या १६—
अथ जात्यधिकरणम्
जातित्रैविध्यं युगभेदाद् विमानानाम् (अ० २ सू० १)१
बो० वृ०
एवमुक्त्वा विमानाङ्गयन्त्राणि विधिवत्क्रमात् ।
अथेदानों व्योमयानस्वरूप जातितोच्यते† ॥१॥
विमानजातिभेदप्रबोधकानि यथाक्रमम् ।
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् वर्णितानि स्फुट यथा ॥२॥
तत्रादिमपदाद् यानजातिभेदो निरूपित. ।
तेषा सङ्ख्याविभागस्तु द्वितीयपदतस्मृत ॥३॥
जातिसङ्ख्याविभागेन पुष्षकाद्या यथाक्रमम् ।
तृतीयपदतस्सम्यग्विमाना परिकीर्तिता ॥४॥
एव सामान्यतस्सूत्रपदार्थस्सम्प्रकीर्तित ।
इदानीं तद्विशेषार्थस्सम्यगत्र विविच्यते ॥५॥
इस प्रकार विमानाङ्ग यन्त्रों को क्रम से विधिवत् कहकर अनन्तर अव व्योमयान विमान का
स्वरूप जातिरूप कहा जाता है । विमान के जातिभेदबोधक यथाक्रम तीन पद इस सूत्र में स्पष्ट
वर्णित हैं । उनमें आदि पद से विमानयान का जातिभेद निरूपित किया गया है उनका संख्या-
विभाग तो द्वितीयपद से स्मरण किया—कहा, जातिसंख्या के विभाग से पुष्पक आदि यथाक्रम
तृतीयपद से सम्यक् विमान कहे गये हैं । इस प्रकार सामान्यतः सूत्रपदों का अर्थ कहा अब उसका
विशेष अर्थ का भली प्रकार विवेचन किया जाता है ॥१—५॥
यतश्चतुष्पाद् धर्मोऽभूत्कृते सर्वजनास्तत ।
योगमन्त्रायनुष्ठान विना धर्मप्रभावतः ॥६॥
अभूवन् सिद्धपुरुषास्सात्त्विका ज्ञानवित्त्तमाः ।
आकाशगमन तेषां वायुवेगादयस्तथा ॥७॥
† जातित उच्यते, विसर्गलोपानन्तरमेकादेशसन्धिराष॑ः ।
२३० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अणिमाद्यास्सिद्धयोऽष्टौ स्वतस्सिद्धा बभूवतुः ।
तस्मात् कृतयुगे व्योमयानानि त्रिविधान्यपि ॥८॥
नास्तीत्येव प्रवक्ष्यामि यानतत्त्वार्थपारगाः ।
त्रेतायामेकोनपादधर्मोभूत्कालभेदतः ॥६॥
त्रिपादधर्मप्रकारत्वात्सर्वैषा प्राणिनां क्रमात् ।
बुद्धिमान्द्यमभूत् तेन वेदतत्त्वार्थनिर्णय ॥१०॥
—क्योंकि कृतयुग में धर्म चतुष्पाद होता है सारे मनुष्य योग मन्त्रादि अनुष्ठान के
बिना धर्मप्रभाव से सिद्धपुरुष सात्त्विक विशेषज्ञानवेत्ता हुए उनका आकाशगमन वायु के समान वेग
भी, अणिमा आदि आठ सिद्धियां भी स्वत सिद्ध थीं अतः कृतयुग में व्योमयान विमान के भी तीन
प्रकार थे । ऐसा नहीं है बिमानयान तत्त्वार्थ के पारङ्गत विद्वान् कहेंगे त्रेतायुग में धर्म कालभेद से
एकापद से कम हो गया । त्रेता में धर्म के त्रिपाद प्रचारित होने से सब मनुष्यों की बुद्धिमन्दता हो गई
इससे वेदतत्त्वार्थ का निर्णय—॥६-१०॥
अणिमाद्यास्सिद्धयोष्टावपि मालिन्यता गता ।
तस्मादाकाशगमनवायुवेगादिषु क्रमात् ॥११॥
शक्तिर्नाभूत्स्वभावेन धर्मविप्लवहेतुतः ।
एतद् विज्ञाय भगवान् महादेवो महेश्वर ॥१२॥
सर्ववेदार्थविज्ञानप्रदानार्थं द्विजन्मनाम् ।
अवतारत्स्वयं साक्षाद् दक्षिणामूर्तिरूपतः ॥१३॥
सनकादिमुनीन् पश्चान्निमित्तीकृत्य हर्षतः ।
मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्ध्यर्थं वेदमन्त्रान् ययाविधि ॥१४॥
विभज्यानुष्ठानकल्पप्रभेदानकरोद्विभुः ।
पश्चान्मुनीन् समालोक्य गुरुश्चाक्षुषदीक्षया ॥१५॥
मन्त्रानुष्ठानकल्पादीनुपदेश चकार हि ।
पश्चात्तन्मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्ध्यर्थं जगदीश्वरः ॥१६॥
अत्यन्तकृपया सर्वानालिङ्ग्य मुनिपुङ्गवान् ।
प्रविश्य हृदयं तेषा ज्ञप्तिरूपमनीनयन् ॥१७॥
—और अणिमा आदि आठ सिद्धियां भी मलिनता को प्राप्त होगई अतः आकाश में उडने वायुबल
प्राप्त करने में धर्म के विचलित हो जाने से शक्ति न रही, यह बात भगवान् महादेव महेश्वर मानो
दक्षिणामूर्ति के रूप में ब्राह्मणों—ऋषियों को सर्ववेदार्थ विज्ञान के प्रदानार्थ साक्षात् अवतरित हुए
पश्चात् सनक आदि मुनियों को हर्ष से निमित्त बनाकर उनके लिये मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्धि के
अर्थ वेदमन्त्रों को यथाविधि विभक्त कर अनुष्ठान और विधान के भेदों को किया पश्चात् मुनियों को
देखकर गुरुदेव ने नेत्रपातरूप दीक्षा से मन्त्र, कर्मकाण्ड, और विधि का उपदेश किया पुनः मन्त्रद्रष्टृत्व-
वास्त्वधिकरणं ] [ २३१
सिद्धि के लिए (योगविधि से साक्षात् हुए) जगदीश्वर ने ? अत्यन्त कृपा से सब श्रेष्ठ मुनियों का
आलिङ्गन करके उनके हृदय में प्रविष्ट होकर ज्ञापन पहुंचाया—सूझ दी ॥११-१७॥
ततस्ते मुनयस्सर्वे पुलकाङ्कितविग्रहाः ।
तदनुग्रहे सलब्धज्ञप्तिमाश्रित्य केवलम् ॥१८॥
गद्गदस्वरतो भक्त्या त्रिलोकी गुरुमव्ययम् ।
शतरुद्रीयमन्त्राद्यैस्तुष्टुवुर्हर्षमाश्रित ॥१९॥
ततः प्रसन्नो भगवान् दक्षिणामूर्तिरव्ययः ।
मन्त्रस्वरूपद्रष्टृत्वे तद्रहस्यप्रबोधने ॥२०॥
अनुभूतिं ददौ तेषां ज्ञप्तिपूर्वकमद्भुतम् ।
पुनः समालोक्य मुनीन् प्रहसन् परमेश्वरः ॥२१॥
उवाच परमानन्दरसपूरितवाक्यतः ।
एतावन्तमभूत् काल युष्माकं मुनिनामत ॥२२॥
इदानी मन्प्रभावेन मन्त्रद्रष्टृत्वकारणात् ।
स्वतो मद्भावमाश्रित्य ऋषयो भवत स्वयम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा तान् पुनः प्राहसद् गुरुः करुणानिधिः ।
भो भो महर्षयस्सर्वे वेदमन्त्रान् यथाविधि ॥२४॥
मदनुग्रहसलब्धकल्पानुष्ठानमार्गत ।
अनुष्ठाय यथाशास्त्रं ब्रह्मचर्यं समाश्रिताः ॥२५॥
ईशाज्ञारूपिणीं चित्प्रबोधरूपा माहेश्वरीम् ।
समाराध्यैकाक्षरेण शाङ्करीं वेदमातरम् ॥२६॥
पश्चात् वे सब मुनियों ने पुलकितशरीर हुए उसकी कृपा से प्राप्त सूझ को आश्रित कर
पाकर गद्गद स्वर से भक्ति से त्रिलोकी के अमर गुरु को शतरुद्रीयमन्त्र आदि “नमस्ते रुद्र मन्यव ····”
(यजु० अ० १६। १) से हर्षित हो स्तुति की तब भगवान् दक्षिणामूर्ति प्रसन्न हो मन्त्रस्वरूप के द्रष्टा
होने में उसके रहस्यप्रबोधन में उन्हें सूझ के साथ अनुभवशक्ति—ज्ञानशक्ति दी । फिर परमेश्वर ?
मुनियों को देखकर हंसता हुआ (आलङ्कारिक कथन) परमानन्दरसपूरितवाक्य बोला कि तुम मुनियों
का इतना काल हो गया अब मेरे प्रभाव से मन्त्रद्रष्टृत्वकारण से स्वतः मेरे प्रति समर्पण करके ऋषि
हो जाओ यह कहकर करुणानिधि गुरु फिर हंसे हे हे महर्षियो ! यथाविधि वेदमन्त्रों को मेरी कृपा से
प्राप्त विधान और अनुष्ठान के मार्ग से सेवन कर शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्य को आश्रित हुए ईश्वराज्ञारूपी
चेतन आत्मा को प्रबुद्ध करनेवाली महेश्वर सेप्राप्त हुई कल्याणकर ईश्वरवाणी वेदमाता की एकबार
ओ३म् से आराधन करके—॥१८-२६॥
तदनुग्रहमासाद्य ज्ञात्वा मन्त्ररहस्यकान् ।
तदधिष्ठानरूपस्य महोदेवस्य केवलम् ॥२७॥