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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 368 में से

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सूर्यशक्त्यपकर्षणीययन्त्र । [ २१७
शरद् और हेमन्त ऋतुओं की शीतता की निवृत्ति के अर्थ यथाविधि सूर्यशक्त्यपकर्षणीययन्त्र
अब निरूपित किया जाता है । सत्ताईसवें ? आदर्श से सूर्यशक्त्यपकर्ष कयन्त्र शास्त्रानुसार करे अन्यथा
निष्फल हो जावे ।
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे-वह दर्पणप्रकरण में कहा है-
स्फातिकमञ्जुलफेनसुवर्चान् सैकतपारदगरदकिशोरान् ।
गन्धकबुं रप्राणक्षारान् रविशशिपद्ममुखामरपक्षान् ॥३०॥
रविवसुदिङ्नक्षत्रविभागान् वेदानलसागरवसुभागान् ।
सायकपादप्रभूतविभागान् वसुमुनि निधिनेत्रविभागाशान् ॥३१॥
एतान् शुद्धान् चतुर्दशवस्तून तत्तद्भागानुक्रमेण ।
सम्पूर्यान्तर्मु खमूषाया तच्छुकमुख्यसटिकामध्ये ॥३२॥
सञ्ज्वाल्योष्णरसं पश्चात्सगृह्यान्तर्मु खयन्त्रबिले ।
शीघ्र सम्पूर्योक्तविधानात्कीलचक्रं भ्रमयेद् वेगात् ॥३३॥
स्फटिकमणि या फिटकडी, मजीठ, समुद्रफेन, सज्जीक्षार, हिंगुल-सिंगरक, पारा, गरद-बछनाग,
तलपर्णी, गुरुजा गन्धक, हरिताल, प्राणक्षार-नवसादर† ? ये सब क्रमशः १२, १, ५, १, १३,...., १२,
८, १०, २७, ४, ३, ७, ८, ५, १, ५, ८, ३, ६, २, भागर्शों के अनुक्रम से इन १४ शुद्ध वस्तुओं को
लेकर अन्तर्मु खमूषा* में भरकर शुकमुखमूषा के मध्य में गलाकर फिर गरम तरल को लेकर भीतर मुख
वाले छिद्र में शीघ्र भरकर कीलचक्र को वेग से घुमादे ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्म मृदुल शुद्ध पिञ्जलवर्णं भारविहीनम् ।
भद्र स्पर्शाच्छीतविमान मूत्रव्याधिविनाशकर च ॥३४॥
प्रभवेद् रविशक्त्यपकर्षदर्पणमेव क्रियते यदि सिद्धम् ॥ इत्यादि ॥
अतिसूक्ष्म मृदुल शुद्ध पिङ्गलवर्ण भारहीन भद्र स्पर्श से शीत विमान मूत्रव्याधिका नाशक हो
जावे रविशक्त्यपकर्षदर्पण इस प्रकार किया जाता है जब कि सिद्ध होता है ।
अशीत्यङ्गुलमायाम विशत्यङ्गुलविस्तृतम् ।
एकाङ्गुलघनादेतद्दर्पणात् पट्टिका दृढाम् ॥३५॥
कृत्वा पश्चाद् यथाशास्त्र तस्मिन् केन्द्रत्रये क्रमात् ।
प्रकल्प्य विधिबन्नालद्वय बाहुसमं ततः ॥३६॥
दशाङ्गुलस्य तद्दर्पणतः कुर्याद् दृढ यथा ।
अर्धचन्द्राकृति पीठ नालरूपमतः परम् ॥३७॥
अस्सी अंगुल लम्बे बीस अंगुल चौड़े एक अंगुल मोटे दर्पण से दृढ़ पट्टिका
बनाकर फिर यथाशास्त्र क्रम से उसमें केन्द्रत्रय में दो नालों को बाहु के समान विधिबत् फिर उस दर्पण
से दशांगुल मुख वाले बनावे, अर्द्धचन्द्राकृतिवाला नालरूप पीठ रचे ॥३५-३७॥
† नूसार नरसार भी कहते हैं प्राणों का या प्राणियों का क्षार प्राणक्षार नौसादर है । ( रसतरङ्गिणी )

  • रेतीली पीली मिट्टी तुषराक्ष घारा मिलाकर बनी बोतल ( रसतरङ्गिणी )