बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र ] [ २२१
यन्त्र कहते हैं, क्षौण्डीर लोहे से यह यन्त्र बनाना चाहिए अन्यथा नहीं, अन्य लोहे से करके स्वयान
नाश को प्राप्त हो जाता है ॥ ६५-६६ ॥
क्षौण्डीरलोहमुक्तं लोहतन्त्रे- क्षौण्डीरलोहा लोहतन्त्र में कहा है—
द्विवङ्गाष्टक पारदपञ्चकं च वीरत्रयं क्रौञ्चिकसप्तक तथा ।
कान्तत्रय हंसचतुष्टयं च माध्वीकमेक रुरुपञ्चक क्रमात् ॥ ६७ ॥
एतान् विशुद्धान् वरमूषिकाया सम्पूर्य छत्रीमुखकुण्डमध्ये ।
संस्थाप्य पश्चात्सुरसाख्यभस्त्रात् संगालयैत् कक्षयशतोष्णवेगात् ॥ ६८ ॥
पश्चात्समाहृत्य शनैश्शनै क्रमात् सम्पूरयेद् यन्त्रमुखे च तद्रसम् ।
एव कृतेऽत्यन्तमनोहरं दृढ क्षौण्डीरलोह प्रभवेद् विशुद्धम् ॥६६॥ इत्यादि ।
द्विवङ्गा-लोहविशेष ८ भाग, पारा ५ भाग, लोहा ३ भाग, क्रौञ्चिक कृत्रिमलोहा ७ भाग,
चुम्बक ३ भाग, हंस-रूपाधातु ४ भाग, माध्वीक-लोहभेद १ भाग, रुरु-धातुविशेष इन शुद्ध हुओं को
वरमूषिकानामक कृत्रिम बोतल में भरकर छत्रीमुखकुण्ड के बीच में भरकर पश्चात् सुरसानामक भस्त्रा से
सौ दर्ज की उष्णता से गलावे, पश्चात् लेकर धीरे धीरे क्रम से उस पिघले द्रव को यन्त्रमुख में डालदे,
ऐसा करने पर अत्यन्त मनोहर दृढ क्षौण्डीर लोहा अच्छा बन जाता है ॥ ६७-६६ ॥
पट्टिकायन्त्रमध्येऽथ क्षौण्डीरं स्थाप्य वेगत ।
कीलीसञ्चालनात्सम्यक् सन्ताड्य त्रिशतोष्णत ॥ ७० ॥
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा शुद्धा पट्टिका कारयेद् दृढाम् ।
एतत्पट्टिकया कुर्यात्पञ्चबाहून्नत तथा ॥ ७१ ॥
बाहुत्रितयविस्तार भस्त्राकार यथाविधि ।
मुखनालेन सयोज्य षड्वितस्तिप्रमाणत ॥ ७२ ॥
पेषिणीयन्त्रवत् कार्यं तन्मुख सुदृढ तथा ।
तन्मुखाच्छादनार्थाय मुखावरणाकीलकम् ॥ ७३ ॥
सन्धारयेत्ततस्तस्य मूले कोशत्रयं क्रमात् ।
कल्पयित्वा मध्यभागे सकीलं वर्तुलं मृदुम् ॥ ७४ ॥
क्षौण्डीर लोहे को पट्टिकायन्त्र के मध्य स्थापित करके वेग से कीली सञ्चालनद्वारा ताडन करके
तीन सौ दर्जे की उष्णता से शुद्ध दृढ पतली से पतली पट्टिका बनावे इस पट्टिका से पांच बाहू उठा हुआ
तीन बाहु लम्बा भस्त्रा के आकार का करे, उसे मुखनाल से जोडकर छः बालिश्त माप से पेषिणीयन्त्र-
चक्की के समान वह दृढ मुख करना चाहिए, उस मुख के आच्छन्नार्थ मुखावरणाकील लगावे, उसके मूल
में तीन कोश-कोठे रखकर मध्यभाग में कीलसहित कोमल- ॥ ७०-७४ ॥
शशचर्मसमायुक्तं कुर्यादावरणं ततः ।
धूमपूरककीली तन्मूले सन्धारयेद् दृढम् ॥ ७५ ॥