बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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रूप में जोड़ दे, आदि में अद्भुत भद्रमुष्टिकीक को घुमावे तो द्रवपात्रस्थित द्रावक अत्यन्त उष्णता को
प्राप्त हो जावे रुक्षाद्रावक से उत्पन्न उष्णत्व मञ्जिष्ठिकामणि में भली भांति व्याप्त होकर धूवां उत्पन्न करदे
और महोष्णिकामणि में उस द्रावक के उष्णवेग से महोष्णता प्रकट हो जावे पश्चात् गन्धकद्रावकस्थ
प्रज्वलितिकानामक मणि में ज्वाला की उत्पत्ति हो जावे उस द्रावक की उष्णीता की व्याप्ति से धूमोष्णज्वालक
तारमुखरूप सिङ्गीररुटिका ज्वालामुखीमणियों में वेग से व्याप्त हो जाती हैं। फिर चुम्बकीकील को
यथाविधि- ॥ १२६-१३४ ॥
भ्रामयेदतिवेगेन पश्चाद् धूमोष्णज्वालकाः ।
तन्त्रीमुखात्स्वभावेन धूमस्तम्भाग्रकील कम् ॥ १३५ ॥
व्याप्नुवन्त्यतिवेगेन तत्कील भ्रामयेत् तत ।
स्तम्भमूलग्रन्थिकीलौ तद्द्वेगात्सविशन्ति हि ॥ १३६ ॥
तत्कीलभ्रमणादेव चुल्लिका पट्टिकान्तरे ।
धूमोष्णज्वाला विशिखाः प्रविशन्ति यथाक्रमम् ॥१३७॥
तथानिहोत्रकुण्डस्यपट्टिकास्वपि वेगत ।
पश्चाद् वैश्वानरोत्पत्तिस्तत्र तत्र भवेद् ध्रुवम् ॥१३८॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन विमानाभिमुखे क्रमात् ।
वैश्वानरनालयन्त्रमपि संस्थापयेत्सुधीः ॥ १३६ ॥
एवमुक्त्वाङ्गयन्त्राणि इदानी शास्त्रतः क्रमात् ।
व्योमयान प्रवक्ष्यामि सग्रहेण यथामति ॥ १४० ॥ इत्यादि ।
—अति वेग से घुमावे पश्चात् धूमोष्णज्वालाए' स्वभावतः तारों के मुख से धूमस्तम्भाग्रकील को
अतिवेग से व्याप्त हो जाती हैं, पुन उस कील को घुमादें फिर स्तम्भमूलग्रन्थीकीली को वे ज्वालाए
प्रविष्ट हो जाती हैं, उस कीली के भ्रमण से ही अङ्गीठी (हीटर) की पट्टिका के अन्दर धूमोष्णज्वालाओं
की विविध लहरें यथाक्रम प्रविष्ट हो जाती हैं इसी प्रकार अग्निहोत्रकुण्ड की पट्टिकाओं में भी वेग से
प्रविष्ट हो जाती हैं पुन' वहां वैश्वानर-अग्नि की उत्पत्ति उस उस स्थान में निश्चित हो जावे । अतः
सर्वप्रयत्न से विमान के सामने क्रम से वैश्वानरनालयन्त्र भी बुद्धिमान् संस्थापित करे। इस प्रकार
अङ्गयन्त्रों को कहकर शास्त्रानुसार क्रम से व्योमयान को संक्षेप से यथामति कहूंगा ॥ १३५-१४० ॥
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