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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

हस्तलेख कापी संख्या १६—
अथ जात्यधिकरणम्
जातित्रैविध्यं युगभेदाद् विमानानाम् (अ० २ सू० १)१
बो० वृ०
एवमुक्त्वा विमानाङ्गयन्त्राणि विधिवत्क्रमात् ।
अथेदानों व्योमयानस्वरूप जातितोच्यते† ॥१॥
विमानजातिभेदप्रबोधकानि यथाक्रमम् ।
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् वर्णितानि स्फुट यथा ॥२॥
तत्रादिमपदाद् यानजातिभेदो निरूपित. ।
तेषा सङ्ख्याविभागस्तु द्वितीयपदतस्मृत ॥३॥
जातिसङ्ख्याविभागेन पुष्षकाद्या यथाक्रमम् ।
तृतीयपदतस्सम्यग्विमाना परिकीर्तिता ॥४॥
एव सामान्यतस्सूत्रपदार्थस्सम्प्रकीर्तित ।
इदानीं तद्विशेषार्थस्सम्यगत्र विविच्यते ॥५॥
इस प्रकार विमानाङ्ग यन्त्रों को क्रम से विधिवत् कहकर अनन्तर अव व्योमयान विमान का
स्वरूप जातिरूप कहा जाता है । विमान के जातिभेदबोधक यथाक्रम तीन पद इस सूत्र में स्पष्ट
वर्णित हैं । उनमें आदि पद से विमानयान का जातिभेद निरूपित किया गया है उनका संख्या-
विभाग तो द्वितीयपद से स्मरण किया—कहा, जातिसंख्या के विभाग से पुष्पक आदि यथाक्रम
तृतीयपद से सम्यक् विमान कहे गये हैं । इस प्रकार सामान्यतः सूत्रपदों का अर्थ कहा अब उसका
विशेष अर्थ का भली प्रकार विवेचन किया जाता है ॥१—५॥
यतश्चतुष्पाद् धर्मोऽभूत्कृते सर्वजनास्तत ।
योगमन्त्रायनुष्ठान विना धर्मप्रभावतः ॥६॥
अभूवन् सिद्धपुरुषास्सात्त्विका ज्ञानवित्त्तमाः ।
आकाशगमन तेषां वायुवेगादयस्तथा ॥७॥
† जातित उच्यते, विसर्गलोपानन्तरमेकादेशसन्धिराष॑ः ।