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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 368 में से

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पृष्ठ 253

२३० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अणिमाद्यास्सिद्धयोऽष्टौ स्वतस्सिद्धा बभूवतुः ।
तस्मात् कृतयुगे व्योमयानानि त्रिविधान्यपि ॥८॥
नास्तीत्येव प्रवक्ष्यामि यानतत्त्वार्थपारगाः ।
त्रेतायामेकोनपादधर्मोभूत्कालभेदतः ॥६॥
त्रिपादधर्मप्रकारत्वात्सर्वैषा प्राणिनां क्रमात् ।
बुद्धिमान्द्यमभूत् तेन वेदतत्त्वार्थनिर्णय ॥१०॥
—क्योंकि कृतयुग में धर्म चतुष्पाद होता है सारे मनुष्य योग मन्त्रादि अनुष्ठान के
बिना धर्मप्रभाव से सिद्धपुरुष सात्त्विक विशेषज्ञानवेत्ता हुए उनका आकाशगमन वायु के समान वेग
भी, अणिमा आदि आठ सिद्धियां भी स्वत सिद्ध थीं अतः कृतयुग में व्योमयान विमान के भी तीन
प्रकार थे । ऐसा नहीं है बिमानयान तत्त्वार्थ के पारङ्गत विद्वान् कहेंगे त्रेतायुग में धर्म कालभेद से
एकापद से कम हो गया । त्रेता में धर्म के त्रिपाद प्रचारित होने से सब मनुष्यों की बुद्धिमन्दता हो गई
इससे वेदतत्त्वार्थ का निर्णय—॥६-१०॥
अणिमाद्यास्सिद्धयोष्टावपि मालिन्यता गता ।
तस्मादाकाशगमनवायुवेगादिषु क्रमात् ॥११॥
शक्तिर्नाभूत्स्वभावेन धर्मविप्लवहेतुतः ।
एतद् विज्ञाय भगवान् महादेवो महेश्वर ॥१२॥
सर्ववेदार्थविज्ञानप्रदानार्थं द्विजन्मनाम् ।
अवतारत्स्वयं साक्षाद् दक्षिणामूर्तिरूपतः ॥१३॥
सनकादिमुनीन् पश्चान्निमित्तीकृत्य हर्षतः ।
मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्ध्यर्थं वेदमन्त्रान् ययाविधि ॥१४॥
विभज्यानुष्ठानकल्पप्रभेदानकरोद्विभुः ।
पश्चान्मुनीन् समालोक्य गुरुश्चाक्षुषदीक्षया ॥१५॥
मन्त्रानुष्ठानकल्पादीनुपदेश चकार हि ।
पश्चात्तन्मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्ध्यर्थं जगदीश्वरः ॥१६॥
अत्यन्तकृपया सर्वानालिङ्ग्य मुनिपुङ्गवान् ।
प्रविश्य हृदयं तेषा ज्ञप्तिरूपमनीनयन् ॥१७॥
—और अणिमा आदि आठ सिद्धियां भी मलिनता को प्राप्त होगई अतः आकाश में उडने वायुबल
प्राप्त करने में धर्म के विचलित हो जाने से शक्ति न रही, यह बात भगवान् महादेव महेश्वर मानो
दक्षिणामूर्ति के रूप में ब्राह्मणों—ऋषियों को सर्ववेदार्थ विज्ञान के प्रदानार्थ साक्षात् अवतरित हुए
पश्चात् सनक आदि मुनियों को हर्ष से निमित्त बनाकर उनके लिये मन्त्रद्रष्टृत्वसिद्धि के
अर्थ वेदमन्त्रों को यथाविधि विभक्त कर अनुष्ठान और विधान के भेदों को किया पश्चात् मुनियों को
देखकर गुरुदेव ने नेत्रपातरूप दीक्षा से मन्त्र, कर्मकाण्ड, और विधि का उपदेश किया पुनः मन्त्रद्रष्टृत्व-