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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

२२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
खेटयान-विमान के यात्रियों के अग्निहोत्रार्थ आदर से तथा विशेषतः पाकार्थं अग्नि
आवश्यक है उससे अग्नि देने के लिये विमान के सामने अन्दर वैश्वानरनालयन्त्र बुद्धिमान् स्थापित
करे ॥ ११२-११३ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
खेटयानप्रयातॄणामग्निसिद्ध्यर्थमेव हि ।
वैश्वानरनालयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥ ११४ ॥
वितस्तिद्वयमायामं द्वादशाङ्गुलविस्तृतम् ।
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा नागलोहेन शास्त्रतः ॥ ११५ ॥
पीठं कृत्वा ततस्तस्मिन् कुर्यात् केन्द्रत्रयं क्रमात् ।
ताम्रखर्परसम्मिश्रलोहात् पात्राणि कारयेत् ॥ ११६ ॥
गन्धकद्रावकं शुद्धमेकपात्रे प्रपूरयेत् ।
रूक्षाद्रावकमेकस्मिन् पात्रे तद्विनियोजयेत् ॥ ११७ ॥
माञ्जिष्ठिकाद्रावकं च न्यसेत् पात्रान्तरे तथा ।
एतानि द्रवपात्राणि पीठकेन्द्रेषु स्थापायेत् ॥ ११८ ॥
मणिं प्रज्वलकं नाम गन्धकद्रावके न्यसेत् ।
तथैव धूमास्यमणिं रूक्षाद्रावके ततः ॥ ११९ ॥
माञ्जिष्ठिकाद्रावके तु महोष्णिकमणिं न्यसेत् ।
विमाने पाकशालाश्च यत्र यत्राग्निहोत्रिणः ॥ १२० ॥
विमान के यात्रियों के अग्निहोत्रार्थ वैश्वानर नालयन्त्र—अग्नि प्रज्वालन यन्त्र अब कहते हैं ।
दो बालिश्त लम्बा बारह अंगुल चौड़ा अर्थात् मोटा चतुष्कोण या चारों ओर से गोल शास्त्रानुसार नाग
लोहे से पीठ करके उसमें कम से तीन केन्द्र (मीटर ?) करे ताम्बे खपरिये-जस्ते ? से मिले लोहे
से पात्र बनाए, शुद्ध गन्धकद्रावक—गन्धक रस (तेजाब) एक पात्र में भर दे, एक पात्र में रूक्षाद्रावक
दन्तीतैल या रस ? नियुक्त करदे डाल दे, तीसरे पात्र में माञ्जिष्ठिकाद्रावक—मजीठ का तैल ? रस
डाल दे, इन द्रवभरे पात्रों को पीठ के केन्द्रों में रखे । प्रज्वलक मणि गन्धकद्रावक में डाल दे ऐसे ही
धूमास्य मणि रूक्षाद्रावक में और माञ्जिष्ठिकाद्रावक में तो महोष्णिक मणि डाल दे । विमान में जहां
जहां पाकशालाएं और अग्निहोत्री हों—॥११४-१२०॥
स्थापयेत्कीलकस्तम्भान् तत्र तत्र दृढं यथा ।
द्रवपात्रान्तरे तन्त्रीन् भद्रमुष्ट्याख्यकीलके ॥ १२१ ॥
त्रिसंख्याकान् प्रबध्नीयाद् यथाशास्त्रमतः परम् ।
मूलस्तम्भ समारभ्य द्रवपात्रान्तमेव हि ॥ १२२ ॥
तन्त्रीत्रयं समाहृत्य मण्यग्रे योजयेत्क्रमात् ।
स्तम्भाग्रे चुम्बुकीकीलमध्ये ज्वालामुखीयमणिम् ॥ १२३ ॥