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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 368 में से

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पृष्ठ 254

वास्त्वधिकरणं ] [ २३१
सिद्धि के लिए (योगविधि से साक्षात् हुए) जगदीश्वर ने ? अत्यन्त कृपा से सब श्रेष्ठ मुनियों का
आलिङ्गन करके उनके हृदय में प्रविष्ट होकर ज्ञापन पहुंचाया—सूझ दी ॥११-१७॥
ततस्ते मुनयस्सर्वे पुलकाङ्कितविग्रहाः ।
तदनुग्रहे सलब्धज्ञप्तिमाश्रित्य केवलम् ॥१८॥
गद्गदस्वरतो भक्त्या त्रिलोकी गुरुमव्ययम् ।
शतरुद्रीयमन्त्राद्यैस्तुष्टुवुर्हर्षमाश्रित ॥१९॥
ततः प्रसन्नो भगवान् दक्षिणामूर्तिरव्ययः ।
मन्त्रस्वरूपद्रष्टृत्वे तद्रहस्यप्रबोधने ॥२०॥
अनुभूतिं ददौ तेषां ज्ञप्तिपूर्वकमद्भुतम् ।
पुनः समालोक्य मुनीन् प्रहसन् परमेश्वरः ॥२१॥
उवाच परमानन्दरसपूरितवाक्यतः ।
एतावन्तमभूत् काल युष्माकं मुनिनामत ॥२२॥
इदानी मन्प्रभावेन मन्त्रद्रष्टृत्वकारणात् ।
स्वतो मद्भावमाश्रित्य ऋषयो भवत स्वयम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा तान् पुनः प्राहसद् गुरुः करुणानिधिः ।
भो भो महर्षयस्सर्वे वेदमन्त्रान् यथाविधि ॥२४॥
मदनुग्रहसलब्धकल्पानुष्ठानमार्गत ।
अनुष्ठाय यथाशास्त्रं ब्रह्मचर्यं समाश्रिताः ॥२५॥
ईशाज्ञारूपिणीं चित्प्रबोधरूपा माहेश्वरीम् ।
समाराध्यैकाक्षरेण शाङ्करीं वेदमातरम् ॥२६॥
पश्चात् वे सब मुनियों ने पुलकितशरीर हुए उसकी कृपा से प्राप्त सूझ को आश्रित कर
पाकर गद्गद स्वर से भक्ति से त्रिलोकी के अमर गुरु को शतरुद्रीयमन्त्र आदि “नमस्ते रुद्र मन्यव ····”
(यजु० अ० १६। १) से हर्षित हो स्तुति की तब भगवान् दक्षिणामूर्ति प्रसन्न हो मन्त्रस्वरूप के द्रष्टा
होने में उसके रहस्यप्रबोधन में उन्हें सूझ के साथ अनुभवशक्ति—ज्ञानशक्ति दी । फिर परमेश्वर ?
मुनियों को देखकर हंसता हुआ (आलङ्कारिक कथन) परमानन्दरसपूरितवाक्य बोला कि तुम मुनियों
का इतना काल हो गया अब मेरे प्रभाव से मन्त्रद्रष्टृत्वकारण से स्वतः मेरे प्रति समर्पण करके ऋषि
हो जाओ यह कहकर करुणानिधि गुरु फिर हंसे हे हे महर्षियो ! यथाविधि वेदमन्त्रों को मेरी कृपा से
प्राप्त विधान और अनुष्ठान के मार्ग से सेवन कर शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्य को आश्रित हुए ईश्वराज्ञारूपी
चेतन आत्मा को प्रबुद्ध करनेवाली महेश्वर सेप्राप्त हुई कल्याणकर ईश्वरवाणी वेदमाता की एकबार
ओ३म् से आराधन करके—॥१८-२६॥
तदनुग्रहमासाद्य ज्ञात्वा मन्त्ररहस्यकान् ।
तदधिष्ठानरूपस्य महोदेवस्य केवलम् ॥२७॥