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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

वैश्वानरनाल्यन्त्र ] [ २२७
काचावरणातस्स्थाप्य पश्चात्तत्पार्श्वयोः क्रमात् ।
सिञ्जीरकर्मणिं तद्वद्रुटि(ह्रडि?)काख्यमणिं क्रमात् ॥ १२४ ॥
संधायं पश्चादेकैकंमणिमूलाद् यथाविधि ।
एकैकतन्त्रीमाहृत्य मध्यस्तम्भाप्रकीलकात् ॥ १२५ ॥
स्तम्भमूले ग्रन्थिकीलमुखान्तं सन्नियोजयेत् ।
तदारभ्य यथाशास्त्र चुल्लिकान्तं तथैव हि ॥ १२६ ॥
अग्निहोत्रस्य कुण्डाग्रावधि याने ऋ(रु?) जुर्यथा ।
वर्तुलं कुल्यवत्कृत्वा लोहनालान्ततः परम् ॥ १२७ ॥
तस्मिन् संधाय विधिवत् पश्चात्तन्त्रीन् यथाक्रमम् ।
तत्तन्नालेषु सयोज्य चुल्लिकासु तथैव हि ॥ १२८ ॥
वहां वहां कीलस्तम्भों को दृढ स्थापित करे, द्रवपात्रों के अन्दर तीन तारों को भद्रमुष्टिनामक
कील में शास्त्रानुसार बान्ध दे पुनः मूलस्तम्भ से लेकर द्रवपात्रपर्यन्त तीन तारों को निकालकर मणियों
के आगे क्रमशः युक्त कर दे - फिट करदे । स्तम्भाग्र में चुम्बककील में ज्वालामुखी मणि को कांच के
ढकने में स्थापित करके दोनों पार्श्वों में सिञ्जोरकर्मणि उसी भांति ऋडिकाख्यमणि को‡ क्रम से लगाकर
एक एक मणिमूल से एक एक तार लेकर मध्यस्तम्भ की अप्रकील से स्तम्भमूल में ग्रन्थिकील के मुख तक
नियुक्त करे । उसे यथाशास्त्र अङ्गीठी ( हीटर ) तक लावे अग्निहोत्र के कुण्डाग्र तक यान में
आवे । गोल कुल्य की भांति बनाकर लोहनाल के अन्त से परे उस में विधिवत् तारों को यथाक्रम जोडकर
उस उसके नाल में संयुक्त कर —जोड़कर तथा अङ्गीठी (हीटर) में जोड़कर -
अग्निहोत्रस्य कुण्डेषु समाहृत्य यथाविधि ।
तत्रत्यखर्परकृतपट्टिका संन्यसेद् दृढम् ॥ १२६ ॥
आदौ भ्रामयेद् भद्रमुष्टिकीलकमद्भुतम् ।
द्रवपात्रस्थितद्रावकोऽत्यन्तोष्णत्वतामियात् ॥ १३० ॥
रूक्षद्रावकसञ्जातोष्णो माक्षिकिकामणौ ।
संधाप्य धूम जनयेन्महोष्णकमणौ तथा ॥ १३१ ॥
तद्द्वावकोष्णवेगेन महोष्णात्सम्प्रजायते ।
पश्चाद् गन्धकद्रावकस्थमणी प्रज्वलिकाभिधे ॥ १३२ ॥
ज्वालोत्पत्तिर्भवेत्तद्द्वावकोष्णव्याप्तितस्तथा ।
धूमोष्णाज्वालकाः पश्चात्तत्तत्तन्त्रीमुखास्स्रवतः ॥ १३३ ॥
सिञ्जीर त्रुटि(ऋडि?)काज्वालामुखीमणिषु वेगतः ।
व्याप्नुवन्ति ततश्चुम्बककीलं च यथाविधि ॥ १३४ ॥
अग्निहोत्र के कुण्डों में यथाविधि सञ्चित कर वहां की खपरिया-जस्ते की पट्टिकाओं में दृढ
‡ ये मणियां कृत्रिम हैं बनाई जाती हैं । (देखो पीछे मणिप्रकरण )

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