बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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२१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रुई ?, चञ्चोल—चञ्चुलु—लाल एरन्ड ? बालज—सुगन्धबालास्थ्य, पांचों प्राणक्षार—मनुष्य घोडा
गधा बैल बकरी के मूत्रों का क्षार नवसादर, शशोङुप—लोध काष्ठ । क्रमश ३, ७, ५, २२, ४, १५, २,
५, २०, ७, ३०, १५, ४०, २३, २७, १३, १६, १८ भागों के अनुसार इन १२ वस्तुओं को तीन बार
शोधकर मत्स्यमूषा मुख बोतल में विधिवत् भर कर नलिकाकुण्ड के मध्य में रख कर ६६ दर्जे की उष्णता
से यथाविधि गोमुखी भस्त्रा से गलावे पश्चात् यन्त्रमुख में डाल दे ऐसा करने पर पिङ्गलाख्य दर्पण हो
जावेगा यही १६वीं संख्या वाला दर्पण शास्त्र में वर्णित किया है ॥ १०३–१०८ ॥