बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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पट्टिकाभ्रकयन्त्रः ] [ २१५
अभ्रक को रसमाताबीज तैल रस—हिङ्गुल और माताबीज—आलुकणी या इन्द्रवारुणी के
बीज के तैल से विधि से या दो बार, शोधे फिर अभ्रक को गलाकर दो वितस्ति—बालिश्तमात्र लम्बी
चौड़ी बाहु—हाथ भर ऊंची पट्टिका बनावे । प्रथम कूर्मपीठ (नीचे का स्थान) वारिवृक्ष—हीवेर—सुगन्ध
वाला वरना ? वृक्ष की लकड़ी से सोलह अङ्गुल लम्बा बाहुमात्र ऊंचा शंकुपट्टिकाकार से शास्त्रानुसार
बनावे, पुनः सीधी घूमनेवाले कीलचक्र विधिवत् शौण्डीर मणि‡ से युक्त कील चक्र लगावे उस शंकु में
लगावे, पश्चात् मूलकेन्द्र से तन्त्रियों-तारों को लगावे ॥ ९-१३ ॥
आपट्टिकान्तं विधिवत्कीलचक्रानुसारत ।
पश्चाद्भागे दन्तपात्रं स्थापयित्वा ततः परम् ॥ १४ ॥
शैवालद्रावकं तस्मिन् सम्पूर्य रविचुम्बकम् ।
पारदं च न्यसेत् पश्चात् तन्त्रीनाहृत्य शास्त्रत ॥१५॥
तस्मिन् सन्धारयित्वाथ शृङ्गिण्याच्छाद्य नालतः ।
तन्नालमूलमाकाशे दृढं सन्धारयेत् क्रमात् ॥ १६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलपञ्चचक्रैर्विराजितम् ।
पूर्वोक्ताभ्रकशङ्कु तत्पीठमध्ये दृढं यथा ॥ १७ ॥
पुनः पट्टिकापर्यन्त चक्रों के अनुसार दन्तपात्र—जिस में दान्ते हों—दान्ते लगे हों चक्रों को
घुमाने के लिये उसे स्थापित करके पुनः उस दन्तपात्र में शैवालद्रावक को भर के पश्चात् रविचुम्बक—
सूर्यतेज को खींचने वाले सूर्यकान्त और पारा डाले तन्त्रियों—तारों को लेकर शास्त्रानुसार उस में बन्द
कर शृङ्गी ? में नाल से ढक कर, उस नाल के मूल को आकाश में दृढ लगादे घूमनेवाले पांच कीलचक्रों
से वह नालमूल युक्त हो, जिस से पूर्व कहा अभ्रक शङ्कु पीठ के मध्य दृढ रहे ॥ १४-१७॥
स्थापयित्वा तस्य मूर्ध्नि पट्टिकां द्रवशोधिताम् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
यदा सन्ध्यन्तराज्ज्वालामुखशक्तिस्स्वभावतः ।
सम्भूय व्योमयानस्य मार्गान्ति प्रसार्यते ॥ १९ ॥
कीली सन्धारयेच्छङ्कुमुलकेन्द्रे तदा बुधः।
तेन तन्त्रीमुखाच्छ्रैत्यवेगस्पन्दनसंयुतः ॥ २० ॥
द्रवपात्रात्समुत्थाय पञ्चचक्रमुखान्तरात् ।
पूर्वोक्तपट्टिकामूलकेन्द्रं प्रविशति स्वयम् ॥ २१ ॥
पश्चात्तन्मुखमासाद्य शक्तिं ज्वालामुखामिधाम् ।
समाकृष्यातिवेगेन पट्टिकामूलकेन्द्रतः ॥ २२ ॥
‡ शौण्डीर मणि आगे कही हुई कृत्रिमणि है ।
† शृङ्गिण्या ? (हस्तलेखे पाठः)