बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वावर्तकीलसंयुक्तांश्चक्रदण्डान् यथाविधि ॥ ६५ ॥
त्रिवृत्करणतो लोहरज्जुच्छिद्रानुसारतः ।
कुर्यात्तेनैव लोहेन शङ्कुकीलादयः क्रमात् ॥ ६६ ॥
अन्तश्चक्रयुतान्नालस्तम्भान्तन्त्रीसमाकुलान् ।
ईशान्यादिक्रमात्केन्द्रस्थानेषु स्थापयेत् क्रमात् ॥ ६७ ॥
वायुप्रवाहों के संसर्ग — संघर्षण के हटाने या प्रतीकार के लिये ही विमानस्तम्भन यन्त्र यथा-
मति निरूपित किया जाता है। वक्रतुण्ड नामक लोह से चतुष्कोण-चौकोर या गोल विमान पीठ के
भ्रमण में चतुर्थांश प्रमाण से, घन में मोटाई में तीन बालिश्त अन्य पीठ बनावे ईशान आदि के क्रम से
उसमें आठ दिशाओं में यथाक्रम केन्द्र बनावे तथा छिद्रसहित आवरण भी घूमनेवाले दांतों से युक्त चक्र
विधिवत् क्रमशः अनुलोम और विलोमों से करे उसी लोह से, घूमने वाली कीलों से संयुक्त चक्रदण्डों
को यथाविधि तीन लपेट वाली लोहे की रस्सियों को छिद्र के अनुसार बनावे । उसी लोहे से शंकु कोल
आदि भी क्रम से बनावे। भीतरी चक्रयुक्त तारों से घिरे हुए नालस्तम्भों को क्रम से ईशानी आदि
केन्द्रस्थानों में स्थापित करे ॥ ६१-६७ ॥
विमानाङ्गोपसंहारस्थाननालमुखान्तरात् ।
सकीलतन्त्रीनाहृत्य नालस्तम्भान्तरात्पुनः ॥ ६८ ॥
अन्तर्नालैस्समाकृष्य मध्यकेन्द्रावधि क्रमात् ।
पीठमध्यावर्तकीलस्तम्भमूलान्तरे क्रमात् ॥ ६९ ॥
तच्छिद्रमुखे कीलशङ्कुभिर्बन्धयेद् दृढम् ।
द्वावर्तकीलस्तम्भस्तु पीठमध्ये निवेशयेत् ॥ १०० ॥
पूर्वोक्तवातप्रवाहो यदा सन्दृश्यते क्रमात् ।
तदा यानाङ्गोपसंहारकीलकं प्रचालयेत् ॥ १०१ ॥
तेन यानस्सङ्कुचितो भवेत्पश्चात्तथैव हि ।
पश्चादष्टाङ्गकीलचक्राणि भ्रामयेद् दृढम् ॥ १०२ ॥
तेन वेगोपसंहारो विमानस्य भवेत् क्रमात् ।
पश्चात् पीठस्थाष्टनालस्तम्भकीलान् प्रचालयेत् ॥ १०३ ॥
विमानाङ्गों के उपसंहारस्थान में वर्तमान नालमुखों के अन्दर से कीलसहित तारों को निकाल
कर फिर नालस्तम्भ के अन्दर से भी भीतरी नालों से खींच कर मध्य केन्द्र की अवधि के क्रम से और
पीठ में लगी घूमने वाले कीलस्तम्भों में उस उस छिद्र मुख में कीलशंकुओं द्वारा दृढ बांध दे और घूमने
वाले कीलस्तम्भों को पीठ में लगा दे । पूर्वोक्त वातप्रवाह जब दिखलाई पडे तब विमानयानाङ्गों का
उपसंहार करने वाली कील को चलावे, उससे फिर विमानयान संकुचित हो जावे पश्चात् अष्टाङ्ग—आठ
अङ्गों से सम्बन्ध रखने वाले कील चक्रों को दृढरूप से घुमा दे उस विमान का वेगोपसंहार क्रमशः हो
जावे पश्चात् पीठ में स्थित अष्टनाल स्तम्भ की कीलों को चलावे ॥ ६८-१०३ ॥