बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तम्भनयन्त्र ] [ ३२१
कर देता है उस से सब विमानस्थान से भूमितल पर गिर आवेंगे परविमानयानविनाश और स्वविमान-
यान का परिपालन = बचाव हो जाता है उस से अपने विमान में चलनेवाले सुख से जाते हैं—यात्रा
करते हैं अतः इस श्रेष्ठ यन्त्र को बुद्धिमान् स्थापित करे ॥ ७९—८५ ॥
स्तम्भनयन्त्र—
इत्युक्तवापस्मारधूमयन्त्र शास्त्रविधानतः ।
इदानीं स्तम्भनयन्त्रं यथाविधि निरूप्यते ॥ ८६ ॥
इस प्रकार अपस्मारधूमयन्त्र शास्त्रविधान से कहकर अब स्तम्भनयन्त्र विधि के अनुसार
निरूपित किया जाता है ॥ ८६ ॥
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ या प्रकरण में—
यदा तु वारिपरिधिरेखामण्डलसन्धिषु ।
शक्त्युद्रेको यदि भवेन्महाविषसमाकुल ॥ ८७ ॥
प्रचण्डमारुतोद्रेको भवेद्यत्यन्तदारुण ।
तत्तत्सन्धिषु वातानां पश्चाद् युद्धं भविष्यति ॥ ८८ ॥
तेनाकाशे भवेद् वातप्रवाहस्सर्वतोमुख ।
तत्सम्पर्काद् याननाशस्तत्क्षणात्स्तम्भविष्यति ॥ ८९ ॥
तस्मात्तत्परिहाराय यानाधोभागकेन्द्रके ।
संस्थापयेत्स्तम्भनाख्ययन्त्रं शास्त्रविधानतः ॥ ९० ॥ इत्यादि ।
जब कभी वारिपरिधि रेखामण्डल सन्धियों में आकाशीयमण्डल शक्ति का उद्रेक-उत्थान महाविष
से पूर्ण हो तब प्रचण्ड मारुतोद्रेक-वायव्य उत्थान अत्यन्त दारुण होता है पुन उन सन्धियों में वायुओं
का युद्ध हो जावेगा, उस से आकाश में सब ओर वायु का प्रवाह चलने लगे, उस के सम्पर्क से तुरन्त
विमानयान का नाश हो जावेगा, अतः उसके परिहार के लिये विमान के नीचे के भागवाले केन्द्र में
शास्त्रानुसार स्तम्भननामकयन्त्र स्थापित करे ॥ ८७—९० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
वातप्रवाहसंसर्गपरिहाराय केवलम् ।
विमानस्तम्भनयन्त्रं यथामति निरूप्यते ॥ ९१ ॥
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा वक्रतुण्डाख्यलोहतः ।
विमानपीठभ्रामणो चतुर्थांशप्रमाणतः ॥ ९२ ॥
घने वितस्तित्रितय पीठमन्यत्प्रकल्पयेत् ।
ईशानादिक्रमात्तस्मिन्नष्टदिक्षु यथाक्रमम् ॥ ९३ ॥
केन्द्राणि विधिवत् कुर्यात्सच्छिद्रावरणं यथा ।
आवर्तदन्तसंयुक्ताश्चक्राणि विधिवत्क्रमात् ॥ ९४ ॥
अनुलोमविलोमैश्च कुर्यात्तेनैव लोहतः ।