बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या १५ –
अथ पट्टिकाभ्रकयन्त्रम्—अब पट्टिकाभ्रक यन्त्र कहते हैं ।
एवमुक्त्वा सङ्ग्रहेण दिशाम्पतिमतं परम् ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमत्र निरूप्यते ॥१॥
इस प्रकार 'दिशाम्पति' यन्त्र संक्षेप से कहकर अब आगे, 'पट्टिकाभ्रक' यन्त्र के स्वरूप का
निरूपण किया जाता है।
तदुक्तं क्रियासारे—यह यह वृत्त 'क्रियासार' ग्रन्थ में कहा है—
ग्रहसन्धिसमुद्भूतज्वालामुखविनाशने ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रं च यानावरणमध्यमे ॥२॥
स्थापयेद्विधिवद् धीमान् सर्वदुःखविनाशनम् ।
ग्रहों की सन्धि में प्रकट हुए ज्वालामुख-अति ज्वलनशक्ति के विनाश निमित्त पट्टिकाभ्रक
यन्त्र को भी यानावरण के मध्य भाग में बुद्धिमान् स्थापित करे जो कि सर्वदुःखों का विनाशसाधन है ।
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा ही है—
ग्रहसञ्चारमार्गेषु ग्रहाणां तु परस्परम् ॥३॥
एकरेखाप्रवेशेन ग्रहसन्धिर्भवेदतः ।
ज्वालामुखाभिधा ❀ काचिद्विषशक्तिः प्रजायते ॥४॥
यानारूढास्तया सर्वे मरिष्यन्ति न संशयः ।
तस्मात्तच्छक्तिनाशाय सङ्ग्रहेण यथाविधि ॥५॥
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमद्य निरूप्यते ।
तृतीयवर्गाभ्रकेषु तृतीयाभ्रकतः क्रमात् ॥६॥
कारयेत्पट्टिकाभ्रकयन्त्रं शास्त्रविधानतः ।
ग्रहों के सञ्चरण मार्गों में ग्रहों के परस्पर एकरेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि होती है अतः वहां
ज्वालामुखनामक कोई विषशक्ति--घातक विप्रयोगशक्ति† विरुद्ध संयोगशक्ति प्रकट हो जाती है उससे
❀ वा (हस्तलेखे)
† "विष विप्रयोगे" (अपादि०) विरुद्ध संयोग-घर्षण वा धम्त्वाद् ।