सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

२१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र

तदूर्ध्वे चूर्णपात्रं स्थापयेद् विधिवद् दृढम् ।
कीलीमुखं तत्पात्रकुक्षिमूले नियोजयेत् ॥ ७६ ॥
एव क्रमेण चत्वारि भस्त्रान् कुर्याद् यथाविधि ।
परयानावरणकाले यानावरणभस्त्रकात् ॥ ७७ ॥
कृत्वा विमानावरणं पश्चात्तदुपरि क्रमात् ।
दिक्पीठोपरि पूर्वोक्तभस्त्रिकान् स्थाप्य सत्वरम् ॥
विद्युत्संयोजनं कुर्याच्चूर्णपात्रान्तरे क्रमात् ।
तत्क्षणाद् धूमता याति तच्चूर्णमतिवेगत ॥ ७८ ॥

शशचर्म युक्त आवरण करे, उसके मूल में धूम भरनेवाली कीली दृढ लगावे उस के ऊपर चूर्णपात्र
विधिवत् दृढ रखे, उस पात्र के कुक्षिमूल में कीली का मुख युक्त करे इस प्रकार से चार भस्त्रों-धोकनियों
को यथाविधि लगावे, दूसरे के-शत्रु के यानों के आवरणकाल में यानावरण भस्त्रक-धोकने से
विमानावरण करके पश्चात् क्रम से ऊपर दिक्पीठ के ऊपर पूर्वोक्त भस्त्रिकों को शीघ्र स्थापित करके चूर्ण-
पात्र में विद्युत का संयोजन करे वह चूर्ण अतिवेग से धूमता को प्राप्त हो जावेगा धूंवा बन जावेगा-

भस्त्रिकामुखमुद्घाट्य पश्चात् कीलीं प्रचालयेत् ।
तेन प्रसारितो धूमो सूक्ष्मभस्त्रत्रये क्रमात् ॥ ७९ ॥
प्रविश्य तन्मुखेभ्योऽथ मध्यकुण्डान्तरे क्रमात् ।
प्रविश्यपूरणात् सर्व व्याप्य पश्चाद् यथाक्रमम् ॥८०॥
भस्त्रिकामुखपर्यन्तमतिवेगेन धावति ।
पश्चात्कीलकसन्धानात्परयानोपरि क्रमात् ॥ ८१ ॥
एककाले चतुर्दिक्षु सर्वतोमुखत स्वयम् ।
व्याप्याथापस्मारधूम. परयानान् समग्रत. ॥ ८२ ॥
परेषा तत्क्षणात् स्वीयशक्तिप्रधानत. ।
करोत्यपस्मारवशान् सर्वान् शत्रून्न संशय. ॥ ८३ ॥
तेन सर्वे विमानाग्रात् पतिष्यन्त्यवनीतले ।
परयानविनाश च स्वयानपरिपालनम् ॥ ८४ ॥
भवेत् तेन ततस्सर्वे सुख यान्ति विमानगाः ।
तस्मादेतद्यन्त्र वर विमाने स्थापयेत्सुधी. ॥ ८५ ॥ इत्यादि ॥

भस्त्रिका के मुख को खोलकर फिर कीली चलावे उस से फैलाया हुआ धूंआं सूक्ष्म तीन भस्त्रों
में-धोकनों में क्रम से प्रविष्ट होकर उनके मुखों से मध्यकुण्ड के अन्दर प्रविष्ट होकर भर जाने से सर्वत्र
व्याप्त हो पश्चात् क्रमानुसार भस्त्रिकामुखपर्यन्त अत्यन्त वेग से दोडता है, फिर कील बन्द करने से-पर
विमानयानों के ऊपर एक समय में चारों दिशाओं में सर्वतोमुख हो स्वयं अपस्मार धूंआं सभी परविमान-
यानों को व्याप्त हो अपनी विषशक्ति की प्रधानता से सब शत्रुओं को निःसंशय अपस्मार के वश-अचेत