बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शङ्कु की मूर्धा में द्रवशोधित अभ्रकपट्टिका को स्थापित करे व्योमयान के आवरण के मध्य
भाग में शास्त्रानुसार जोड दे । जब ग्रहमागों के सन्धिरैखास्थान से ज्वालामुख शक्तिस्वभाव से ग्रहमार्गों से
परस्पर मिलकर व्योमयान के मार्ग तक प्रसारित की जाती है । तब बुद्धिमान् विद्वान् शंकुमूल के केन्द्र में
कीली को लगावे—बन्द करे उस से तन्त्रीमुखतार के सिरे से शीतता का वेग स्पन्दन करता हुआ पांच
चक्रों के मुख जिस में लगे हैं उस द्रावकपात्र से उठकर पूर्वोक्त पट्टिकामूलकेन्द्र में स्वयं प्रवेश करता है ।
पश्चात् उस मुख को प्राप्त कर ज्वालामुखनामक शक्ति को पट्टिकामूलकेन्द्र से अतिवेग से खींचकर-।१८-२२।
प्रदक्षिणावर्तकीलमध्यस्थितमणौ क्रमात् ।
सञ्चोदयति वेगेन तच्छक्ति तदनन्तरम् ॥२३॥
तन्मणिस्स्वकीयवेगेन समाकृष्यातिवेगत ।
सम्पूरयेन्नालमुखे तन्मूलात् खे लय व्रजेत् ॥२४॥
तेन यानस्थनॄणाञ्चामृत्यु