सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

२१८ ] [ बृहद्विमानशास्त्रे
रचयेद्वर्तुलं पश्चाच्चतुरस्रमथापि वा ।
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नतं तथा ॥३८॥
पीठान्तरं च तेनैव कृत्वा तस्मिन्नत. परम् ।
अर्धचन्द्राकृति नालपीठं सन्धारयेद् दृढम् ॥३६॥
पार्श्वयोरुभयोस्तस्य नालद्वयमथ क्रमात् ।
सन्धार्य मध्येऽष्टाशीत्यङ्गुलायामं तथैव च ॥४०॥
षडङ्गुलत्रयविस्तारं शङ्कुमेकं दृढं न्यसेत् ।
पूर्वोक्तपट्टिकां तस्य शिरोभागे दृढं यथा ॥४१॥
स्थापयेद्विधिवत् पश्चात् तस्य केन्द्रत्रये क्रमात् ।
उस पीठ को गोल बनावे या चतुष्कोण बनावे, दो बालिश्त लम्बा चौड़ा छ बालिश्त मोटा
दूसरा पीठ भी उसी से करके उसमें फिर अर्धचन्द्राकृति नाल पीठ दृढ रूप से जोड़ दे उसके दोनों पार्श्वों
में—दोनों आसपास भागों में दो नाल क्रम से जोड़कर मध्य में अठासी अंगुल लम्बा तीन अंगुल चौड़ा
मोटा एक शंकु दृढरूप में लगा दे फिर वह पूर्व कही पट्टिका उसके शिरोभाग अर्थात् सिरे पर विधिवत्
दृढ स्थापित करदे फिर क्रम से केन्द्रत्रय—तीनों केन्द्रों पर—॥३८-४१॥
तद्दर्पणकृतान् पद्मदलवद् दलसम्मितान् ॥४२॥
मध्ये च (छ ?) षकसंयुक्तान् सच्छिद्रान् द्विमुखाकृतीन् ।
पद्माकारान् सुसन्धायावर्तकीलशङ्कुभिः ॥४३॥
बध्नीयात् सुदृढं पश्चाच्छैवालद्रावकं तथा ।
शृङ्गिद्रवं च संशुद्धं सप्रमाणं यथाविधि ॥४४॥
नालद्वयेथ संपूर्य तस्मिन् छायामुखं मणिम् ।
न्यसेत्तच्छङ्कुमूलेऽथ ज्योत्स्नाद्रावं न्यसेत् क्रमात् ॥४५॥
शैत्यापहारकान् तन्त्रीन् सकीलान् मञ्जुलावृतान् ।
ज्योत्स्नाद्रावकंमध्ये संस्थापयेदथ बन्धयेत् ॥४६॥
तन्त्रीन् पार्श्वस्थनालमध्यादाहृत्य शास्त्रतः ।
पट्टिकापार्श्वकमलकेन्द्रयोरुभयोः क्रमात् ॥४७॥
संवेष्ट्य च पुनस्तत्केन्द्राभ्यामाहृत्य यत्नतः ।
पट्टिकामध्यकमलमावेष्ट्याथ पुनः क्रमात् ॥४८॥
पद्मपत्र की भांति पत्ते के आकार में उस दर्पण के बने हुए—बीच में
पात्रयुक्त सच्छिद्र दो मुखों की आकृतिवाले पद्मरूप—कमलरूप जैसों को रखकर या
जड़कर घुमानेवाली कीलोंवाले शंकुओं से सुदृढ़ बान्ध दे पश्चात् शैवालद्रावक—जलकाई का द्रावक
और शृङ्गि-शृंग या सूणि का द्रव ?–नीलाथोथा शुद्ध यथाविधि मापसहित दो नालों में भरकर उस
छायामुखमणि ? को डालदे क्रम से शंकुमूल में ज्योत्स्नाद्राव-मालकंगनी का तैल फिर शीतता हटानेवाले