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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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सूर्यशक्त्यपकर्षणयन्त्र ] [ २१६
कीलसहित तन्त्री तारों को जो मन्जुलों—अंजीरों से आवृत्त हों अंजीर यहां गोली हो सकती है उन
तन्त्रियों—तारों को ज्योत्स्नाद्रावक में रखदे और बान्धदे, उन तारों को शास्त्रानुसार पार्श्ववाले नाल में
से निकालकर पट्टिकापार्श्वों के कमलाकार वाले स्थानों के दोनों केन्द्रों में लपेटकर पुन' उन केन्द्रों से
यत्नपूर्वक निकालकर पुनः क्रमशः पट्टिकामध्यकमल पर लपेट कर—
तत्पश्चाद्भागस्तन्त्रीन् समाहृत्य यथाविधि ।
शङ्कुमूलस्थितज्योत्स्नाद्रावके सन्निवेशयेद् ॥४६.।
पश्चान्नालान्तरात्तत्पात्रमाच्छाद्य समग्रत ।
तन्नालमूलाधोभागे व्योम्नि प्रकल्पयेत् ॥५०॥
यदा हेमन्तशिशिरशैत्यव्याप्तिर्विमानके ।
दृश्येत तत्क्षणादेव शङ्कुमूलस्थित क्रमात् ॥५१॥
बृहच्चक्रमुख कील भ्रामयेदतिवेगत ।
पूर्वोक्तपट्टिकाकेन्द्रस्थिततन्त्रीप्रचालनम् ॥५२॥
भवेत्तेनातिवेगेन पार्श्वस्थकमलान्तरात् ।
सम्भूयात्यन्तचलनाद् वायुशैत्यं प्रकर्षति ॥५३॥
तच्छैत्य पुनराहृत्य तद्वायुरतिवेगत. ।
पट्टिकामध्यकमलच(छ?)षके तन्त्रिभिस्स्वयम् ॥५४॥
उसके पिछले भाग से तारों को यथाविधि समेटकर या लेकर शंकुमूल में पड़े ज्योत्स्नाद्रावक-
मालकंगुनीवैल में डालदे। पुन दूसरे नाल से पात्र को सब ओर से पूरा ढककर उस नालमूल को यान
के नीचले भागवाले आकाश में युक्त करदे । जब हेमन्त शिशिर ऋतुओं की शीतता की व्याप्ति विमान
में दिखलाई पड़े तो तत्क्षण ही कम से शकुमूलस्थित बड़े चक्र मुखवाली कील-पेंच को अतिवेग से
घुमादो तो पूर्वोक्तपट्टिकाकेन्द्रस्थित तार चल पड़े उससे अति वेग से पार्श्वों में स्थित
दूसरे कमल से मिलकर अत्यन्त चलन से वायु शीतता को खींच लेता है फिर उस शीतता को खींचकर
वह वायु अतिवेग से पट्टिकामध्यकमलवाले चषक पात्र में स्वयं तारों से—॥४६--५४॥
संयोजयति वेगेन पश्चान्नालद्वयान्तरे ।
प्रविशेत्तच्छैत्यशक्ति पश्चान्नालसस्थिनौ ॥५५॥
शैवालशृङ्गिणामानौ द्रावकावतिवेगत ।
तच्छैत्यशक्तिमाहृत्य छायामुखमणौ क्रमात् ॥५६॥
वेगेन संयोजयत पश्चादत्यन्तवेगतः ।
तन्मरिणस्स्रवियैवेगेन तच्छक्तिं तन्त्रिभि. क्रमात् ॥५७॥
शङ्कुमूलस्थितज्योत्स्नाद्रावके सन्निवेशयेत् ।
द्रावकाद् व्योम्नि तन्नालात्तच्छक्तिर्लयमेशते ॥५८॥
पश्चात्तच्छैत्यसम्बन्धविषनाशो भवेद् ध्रुवम् ।