बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तेन यानप्रयातॄणामत्यन्तसुखदं भवेत् ॥५६॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सूर्यशक्त्यपकर्षकम् ।
यन्त्र संस्थापयेद् यानोपरि शास्त्रविधानतः ॥६०॥ इत्यादि
दो नालों के अन्दर संयुक्त करता है फिर वह शैत्यशक्ति नालस्थ शैशाल और सूक्ष्मात्मक
द्रावकों में अतिवेग से प्रविष्ट हो जाती है, उस शैत्यशक्ति को क्रम से खींचकर छायामुखमणि में वेग से
संयुक्त करते हैं वह मणि अपने वेगसे उस शक्तिको क्रम से तारों के द्वारा शंकुमूलस्थित ज्योत्स्नाद्रावक
में डाल दे, द्रावक आकाश में उस नालसे शक्ति लय-नाश को प्राप्त होती है । पश्चात् उस शैत्यसम्बन्ध
विप्रयोग-घातकप्रभाव का निश्चय नाश हो जाता है । इससे व्योमयान के यात्रियों के लिये अत्यन्त
सुखद हो जाता है अतः सर्वप्रयत्न से सूर्यशक्त्यपकर्षक यन्त्र को व्योमयान के ऊपर शास्त्रोविधि से
संस्थापित करे ॥५५-६०॥
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र—
इत्युक्तवाशास्त्रविधिना सूर्यशक्त्यपकर्षकम् ।
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्रमतः परम् ॥६१॥
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्र यथामति ॥
यह शास्त्रविधि से सूर्यशक्त्यपकर्षकयन्त्र कहकर अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र यहां से आगे
शास्त्रानुसार यथामति संक्षेप से कहूंगा ।
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
स्वकीयव्योमयानस्य विनाशार्थं यदा क्रमात् ॥६२॥
परेषा व्योमयानावरणं च प्रभवेद् यदि ।
तन्निवारयितुं वेगात् सन्धिनालमुखोत्तरे ॥६३॥
यानस्य स्थापयेद् धीमान् यानतत्त्वविदां वरः ।
अपस्मारधूमप्रसारणयन्त्र दृढ यथा ॥६४॥ इत्यादि
अपने व्योमयान—विमान के विनाशार्थ जब क्रमशः दूसरों के—शत्रुओं के व्योमयानों का
घेरा यदि प्रबल हो जावे