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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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२१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यान--व्योमयान या विमानयान पर सवार हुए सब निःसंशय मर जायेंगे । अतः उस विषशक्ति-विरुद्ध
योगवाली शक्ति के नाशार्थ संक्षेप से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र का स्वरूप आज-अब विधिवत् निरूपित किया जाता
है । तृतीयवर्ग के अभ्रकों में क्रमानुसार तृतीय अभ्रक से शास्त्रविधान से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र करावे-बनवाए
या करे बनवावे ॥३-६॥
तदुक्तं शौनकीये--यह शौनकीय वचन में कहा है-
अथ तृतीयवर्गस्थाभ्रकनामान्यनुक्रमिष्यामो ‡ शारदपङ्किलसोममार्जा-
लिकारक्तमुखविनाशका इति । सोमेनैवैतदिति + केचित् ॥
अब तृतीय वर्गवाले अभ्रक नामों को कहेंगे शारद, पङ्किल, सोममार्जालिक, रक्तमुख, विनाशक
या रक्तमुखविनाशक । सोम से ही करे ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं । (सोम की तृतीय संख्या है ) ।
सोमाभ्रकलक्षणमुक्तं लोहतन्त्रे-सोम नाम के अभ्रक का लक्षण लोहतन्त्र में कहा है-
मेघवर्णेऽति