सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

वैश्वानरनालयन्त्र ] [ २२५
विमानवेगसर्वस्वं तेन संशान्तिमेधते ।
पीठमध्यस्थितदण्डकीलं तदनन्तरम् ॥ १०४ ॥
भ्रामयेदतिवेगेन तेन स्तम्भो दृढो भवेत् ।
स्तम्भप्रतिष्ठा यानान्तं पीठे यदि भवेद् दृढम् ॥ १०५ ॥
तत्क्षणादेव यानस्य स्तम्भनं प्रभवेद् दृढम् ।
पक्षाघातककीलकं च भ्रामयेत्तदनन्तरम् ॥ १०६ ॥
वायूत्पत्तिर्भवेत् तेन तद्वातः सर्वतोमुखात् ।
विमानमूलमावृत्य मण्डलाकारतस्स्वयम् ॥ १०७ ॥
विमानं धारयेत्पश्चाद् विद्युत्स्थानाद् यथाविधि ।
पृथिव्यन्तं शक्तिनालशलाकं कीलचालनात् ॥ १०८ ॥
स्थापयेत् सुदृढं तेन यानस्त्वचलतां व्रजेत् ।
तस्माद् वातप्रवाहेण(न?) यानसंरक्षणं भवेत् ॥ १०६ ॥
अतस्सर्वप्रयत्नेन यानाधोभागकेन्द्रके ।
यानस्तम्भनयन्त्रं च स्थापयेत्सुदृढं यथा ॥ ११० ॥ इत्यादि ॥
उससे विमान वेग का सर्व बल या कल पुरजा शान्ति को प्राप्त हो जाता है पुनः पीठ के मध्य
में स्थित दण्ड की कील को अतिवेग से घुमावे उससे स्तम्भ दृढ हो जावे—स्थिर हो जावे, यदि स्तम्भ
प्रतिष्ठा—स्तम्भ की स्थिरता यान के भीतर पीठ में हो जावे तो उसी समय या तुरन्त यानस्तम्भन हो
जावे । पश्चात् पक्षाघातक—एक ओर को ठोकर देने वाली कील को घुमावे तो उससे वायु की उत्पत्ति
हो जावे वह वायु सब ओर से विमान के मूल को चक्राकार से स्वयं घेर कर विमान को धारण कर ले
सम्भाल ले थाम ले फिर विद्युत् के स्थान से यथाविधि पृथिवीपर्यन्त शक्तिनाल शलाका को कीलचालन
से सुदृढ स्थापित करे उससे विमान यान अचलता को प्राप्त हो जावे उससे वातप्रवाह से यान का संरक्षण
हो जावे अतः सर्व प्रयत्न से विमान के नीचले भाग वाले केन्द्र में यानस्तम्भ यन्त्र सुदृढ स्थापित
करे ॥ १०४-११० ॥
वैश्वानरनाल यन्त्र—
एवमुक्त्वा स्तम्भनाख्ययन्त्रं शास्त्रानुसारतः ।
वैश्वानरनालयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥ १११ ॥
इस प्रकार स्तम्भन नामक यन्त्र शास्त्रानुसार कहकर वैश्वानर नाल यन्त्र अब कहते हैं ॥१११॥
उक्तं हि क्रियासारे--कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
खेटयानप्रयातु णामग्निहोत्रार्थमादरात् ।
पाकार्थं च विशेषेण अग्निरनावश्यक्यो भवेत् ॥ ११२ ॥
तस्मात् पावकदानार्थं यानाभिमुखान्तरे ।
वैश्वानरनालयन्त्रमपि संस्थापयेद् बुधः ॥ ११३ ॥