बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
मिदानीं or निदानीं?
Look at the word: "इदानीम्" means "now". "भागाशाम् + इदानीम्" = "भागाशामिदानीं".
Wait, did the typesetter set 'म' or 'नि'?
Look at the character: it has the vertical stem on the right, top bar, i-matra on the left, and the letter itself has a loop at the bottom left: wait, isn't that 'म'?
Look at 'म' in "सम्प्रचक्षते": म has a loop at bottom-left, horizontal line to the right, vertical line down.
Now look at 'मि' in line 10:
It has a loop at bottom-left, horizontal line to the right, vertical line down, and 'ि' (i-matra)!
Wait, why did I think it was 'नि'? Because the loop is small. But that is standard 'म'!
Wait, look at the number at the end of line 10:
Is it ३६ or ३९?
Let's look at the digit:
३ (three) then...
Look at the second digit:
In line 4: ॥ ३६ ॥ -> the ६ has a loop at the bottom curving left/inward.
In line 10: the second digit has a top curve that goes down and loops... wait, it's ३६! Look at line 14:
"॥ ३६—३६ ॥" or "॥
परिवेषक्रियानालाधिकरणम् ] [ १०५
विमानमध्यकेन्द्रस्थावृत्तकीलाद् यथाविधि ।
यानबाह्य प्रदेशे तु अनुलोमविलोमत ॥ ४६ ॥
वेष्टयेद् विधिवत् सम्यक् कीलकैस्सुदृढ यथा ।
परिवेषक्रियानालमित्युक्त्वा शास्त्रत स्फुटम् ॥ ४७ ॥
किरणाकर्षणादर्शनालमद्य निरूप्यते ॥ ४८ ॥
पट से निर्मित यह परिवेषक्रियानाल कीली चलाने से धूवा विमान को ढकेलता है विमान
मध्यकेन्द्रस्थ घूमनेवाली कील से यथाविधि विमान के बाहरी प्रदेश में ही अनुलोम विलोम से कीलों
से सम्यक् विधिवत् लपेटे, शास्त्र से स्फुट रूप में परिवेषक्रियानाल कहकर किरणाकर्षण आदर्शनाल अब
निरूपित करते हैं ॥ ४६-४८ ॥
तदुक्तं नालिकानिर्णये - वह कहा है नालिकानिर्णय में -
पञ्चोत्तरत्रिशतदर्पणषोडशाश काञ्चोलिकाभरणसत्त्व । पञ्चभागम् ।
सर्पास्यपाटवसुराञ्जिकासत्त्वषट्क हैरण्यकान्तजटसा।रचतुष्टय च ॥ ४९ ॥
शुद्धीकृत टङ्कणमष्टभाग सिञ्जाणसत्त्व वरकुञ्जलद्रवम् ।
आ (मा ?) वृणचूर्णं मणिकुड्मलास्यादर्श च क्षारत्रय बालुका च ॥५०॥
सुराञ्जिकासत्त्वविरञ्चिपिष्ट पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक च ।
शेलूपसत्त्व वरकुड्मलद्रवम्, एते क्रमात् द्वादश वस्तु वर्णितम् ॥५१॥
नक्षत्रबाणार्कमुनित्रयाष्टशैलाग्निरुद्रा वसुराशिपञ्च ।
एव क्रमाद् द्वादशवस्तुभागानाहृत्य शुद्धान् विधिवद् यथाक्रमम् ॥५२॥
भेकास्यमूषामुखरन्ध्रनाले सम्पूर्णभेकोदरकुण्डमध्ये ।
संस्थापयेद् वेगेन द्विपक्षभस्त्रया संगालयेत् कथ्यशतत्रयोष्णात् ॥५३॥
पश्चात् समाहृत्य च तद्रस वर सम्पूरयेद् दर्पणयन्त्रनाले ।
एव कृते किरणाकर्षणाश्यादर्शो भवेत् सूक्ष्मरूप च शुद्धम् ॥५४॥ इत्यादि
तीन सौ पाश्वें दर्पण के १६ भाग काञ्चोलिकाभरणसत्त्व ? पांच भाग, सर्पास्यपाटव सुराञ्ज-
कासत्त्व?-सर्पास्य-नागकेसर, सुराञ्जिका-सुराञ्जिका-मूर्वाळता ६ भाग, हैरण्यकान्तजटसार ?-हिरण्य-कौडी,
कान्त-सूर्यकान्त, जटा-जटामासी का सार ४ भाग, शुद्ध किया सुहागा ८ भाग, सिञ्जाण ? सिञ्जाण-लोह-
किट्ट ? का सत्त्व, अच्छा कुञ्जललशुन का द्राव, आवृण-कावृण-गन्धतृण का चूर्ण, कुड्मलास्यमणि-
पद्मरागमणि ? का आदर्श, तीनों क्षार-सज्जीक्षार यवक्षार नौसादर और बालु-रेत, सुराञ्जिकासत्त्व,
विरञ्चि की पिष्टी या चूर्ण, पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक-पोषणनामक कृष्णाभ्रक का सत्त्व, शेलूपसत्त्व-
बिल्व का सत्त्व, वरकुड्मलद्रव, क्रम से ये १२ वस्तुएं कही हैं। जो कि २८, ५, ६, ३ या ७, ३, ८, ७,
३, ११, ८, १२, ५ इस क्रम से १२ वस्तुओं के भागों को लेकर विधिवत् भेकास्य-मेण्डकमुख नामक
मूषामुखछिद्रवाले नाल में भरकर भेकोदरकुण्ड के मध्य में संस्थापित करे वेग से दो पक्षभस्त्रा से तीन
सौ दर्जे की उष्णता से गला दे। पश्चात् उस अच्छे गले रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। ऐसा
करने पर सूक्ष्मरूप किरणाकर्षणनामक हो जावे ॥ ४६-५४ ॥
१०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यदेतद्दर्पणकृतनाल तच्छास्त्रत स्फुटम् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमित्युच्यते बुधै ॥ ५५ ॥
यन्त्रस्योर्ध्वमुखे पश्चान्नालमेतन्नियोजयेत् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमुक्त्वा यथाविधि ॥ ५६ ॥
प्रतिबिम्बार्ककिरणाकर्षणादर्शनालकम् ।
विविच्यतेऽत्र विधिवत् सग्रहेण यथामति ॥ ५७ ॥
जो यह दर्पण से बना नाल शास्त्र से स्फुट है किरणाकर्षणादर्शनाल बुद्धिमानों के द्वारा कहा
जाता है । पश्चात् यन्त्र के उपरिमुख में इस नाल को युक्त करे किरणाकर्षणादर्शनाल यथाविधि कहकर
प्रतिबिम्बकिरणाकर्षणादर्शनाल का विधिवत् संग्रह से विवेचन करते हैं ॥ ५५ - ५७ ॥
तदुक्तं नालिकानिर्णये-यह बात नालिकानिर्णय में कही है-
कूष्माण्डसत्त्व कुडुहञ्चिद्रव द्विचक्रकन्दद्वयक्षारसत्त्वकम् ।
पञ्चास्यमूलत्रयक्षारमोर्व्य चन्द्रद्रव चोलिक
किरणाकर्षकदर्शनाल ] [ १०७
विमानमध्यभागेऽथदशमे केन्द्रकीलके ।
स्थापयेत् सुदृढं कीले पञ्चावर्तमुखैः क्रमात् ॥६५॥ इत्यादि ॥
एवं बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि ।
निरूप्य पश्चाद् यानस्य शिरोमणिरुदीर्यते ॥६६॥
किरगान्तरेषा (खलु) तत्तच्छक्यपकर्षणे ।
विमानाना अष्टोत्तरशतशिरोमणय ईरिता ॥६७॥
—भरकर, वर्णिकुण्ड में संस्थापित करके पश्चात् सुरघा नामक भस्त्रा से ३१५ दर्जे के वेग से
गलावे, पश्चात् पिंगले शुद्ध रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। शास्त्रविधान से ऐसा करने पर
बिम्बार्कघृष्णिकिरण का आकर्षण करनेवाला दर्पण होआवे जो अत्यन्त सूक्ष्म सुदृढ़ दर्पण से बनी बिम्बार्क-
किरणादर्शनाल यह कहा जाता है। विमान के अग्रभाग में और दशवें केन्द्रकील में पाच घूमनेवाले
मुखवाली कीलों से सुदृढ़ स्थापित करें । इस प्रकार बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि स्थापित करके
पश्चात् विमानयान की शिरोमणि कही जाती है। अन्य किरणों के उस उस शक्ति के खीचने में विमानों
की शिरोमणियां कही हैं ॥ ६१—६७ ॥
तदुक्तं मणिकल्पप्रदीपिकायाम्—वह कहा है मणिकल्पप्रदीपिका ग्रन्थ में—
द्वात्रिंशन्मणिवर्गेषु वर्गे द्वादशके क्रमात् ।
ये प्रोक्तास्त्युत्तरशतमणयस्ते महर्षिभि ॥६८॥
शिरोमणय इत्युक्तविमानाना विशेषतः ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि शास्त्रोक्तानि यथाक्रमम् ॥६६॥
शङ्करो ? शक्तक खर्वो भास्करो मण्डलस्तथा ।
कलान्तको दीप्तिकश्च नन्दको चक्रकण्ठक ॥७०॥
पञ्चनेत्रो राजमुखो राकास्य कालभैरव ।
चिन्तामणि कोशिकश्च चित्रकोशिको भास्करक ॥७१॥
उडुराजो विराजश्च कल्पक कामिकोद्भूत ।
पञ्चशीर्षण पावणिक पञ्चाक्ष पारिभद्रक ॥७२॥
इषीक. काशभृत्काक कङ्कास्य कौटिकस्तथा ।
कलाकर कौर्मिकश्च विघ्न पञ्चपावक ॥७३॥
सैंहिकेयो रौद्रमुखो मञ्जीरो डिम्भकोर्जक ।
पिङ्गक कर्णिक. क्रोधो क्रव्याद कालकोलिक ॥७४॥
विनायको विश्वमुख पावकास्य कपालक ।
विजयो विप्लव. प्राण्ड्डिको कार्मुक (ख ?) पृथु ॥७५॥
शिञ्जीरशिशिकश्चण्डो जम्बाल कुटिलोमिक ।
जृम्भकशक्तामित्रश्च विशाल्य कङ्कुगोरभ ॥७६॥
सुरघस्सूर्यमित्रश्च शशकश्शाकलस्तथा ।
शक्त्याकरश्शाम्भविकश्शिखाणश्शिविकाणुकः ॥७७॥
भेकण्डो मुण्डक कार्ण्यो पुरुहूत पुरञ्जयः ।
भम्वालिको शार्ङ्गिकश्च गम्बीरो घनवर्मकः ॥७८॥
चञ्च्वाकश्चापको नङ्ग पिशङ्गो वार्षिकास्तथा ।
राजराजो नागमुखस्सुधाकरविभाकर ॥७६॥
त्रिणेत्रो भूर्जक कूर्म कुमुद कार्मुखास्तथा ।
कपिलो ग्रन्थिक पाशधरो डमुरगो रविः ॥८०॥
मुञ्जको भद्रकश्चेति शतञ्च श्रीण्यताक्रमम् ।
विमानशिरोमणीना नामान्युक्तानि शास्त्रतः ॥८१॥
३२ मणिवर्गों में बारहवें वर्ग में क्रम से जो १०३ मणियां महर्षियों ने कही हैं वे उक्त
विमान की शिरोमणिया—विशेषत शीर्षस्थान पर योजनीय हैं । उनके नाम यथाक्रम कहूंगा जो शास्त्रोक्त
है—शङ्कुर, शान्तक, खर्व, भास्कर, मण्डल कलान्तक, दीप्तिक, नन्दक, चक्रकण्ठ, पञ्चनेत्र, राजमुख,
राकास्य, कालभैरव, चिन्तामणि, कौशिक, चित्रकौशिकभास्कर, उडु (हु ?) राज, विराज, कल्पक, कामि-
कोद्भव, पञ्चशीर्ष, पार्वणिक, पञ्चाक्ष, पारिभद्रक, इषीक, काशभृत्काफ, कङ्कारय, कौटिक, कलाकर,
कौर्मिक, विषघ्न, पञ्चपावक, सैंहिकेय, रौद्रमुख, मञ्जीर, डिम्भक, जर्क, पिङ्गक, कणिक, क्रोध, क्रव्याद,
कालकौलिक, विनायक, विश्वमुख, पात्राकाश्य, कपालक, विजय, विप्लव, प्राणजह्लिक, कार्मु क(ख?), पृथु, शिण्डीर
शिबिक, मित्र, शशक, शाकल, शक्त्याकर, शाम्भविक, शिखाण, शिविक, शुक, भेकाण्ड, मुण्डक, कार्ण्य,
पुरुहूत, पुरञ्जय, जम्बालिक, शार्ङ्गिक, गम्भीर, घनवर्मक, चञ्च्वाक, चापक, गङ्ग, पिशङ्ग, वार्षिक,
राजराज, नागमुख, सुधाकर, विभाकर, त्रिनेत्र, भूर्जक, कूर्म, कुमुद, कार्मुख, कपिल, ग्रन्थिक पाशधर,
डमुरग, रवि, मुञ्जक, भद्रक । ये १०३ विमान की शिरोमणियों के नाम शास्त्र में कहे हुए हैं ॥६८-८१॥
व्योमयानोर्ध्वभागस्य शिर केन्द्रे यथाविधि ।
स्थापयेदुक्तमणिष्वेकैकं सुदृढं यथा ॥८२॥
विद्युद्यन्त्रमुलात्सर्वतन्त्रीनाहृत्य शास्त्रतः ।
तन्मूले योजयेत्सम्यगेभ्यश्शक्त्यपकर्षणम् ॥८३॥
तस्योर्ध्वमुखपार्श्वेथ किरणाकर्षणान् दृढान् ।
पूर्ववत् योजयेत् पश्चान्मेलनार्थं द्वयोः क्रमात् ॥८४॥ इत्यादि ॥
एवमुक्त्वा यानशिरोमणिकार्यमतः परम् ।
वक्ष्ये किरणसन्धानकीलके शास्त्रतः स्फुटम् ॥८५॥
पञ्चविंशदितिख्याताश्शक्तिसन्धानकीलकाः ।
तेष्वकं किरणयानसन्धाने कीलकः क्रमात् ॥८६॥
कीर्त्यते सप्रह्लादत्र समालोच्य यथामति ।
अङ्गोपसंहारयन्त्र ] [ १०६
विमान यान के उपरिभाग में स्थित शिर केन्द्र में यथाविधि उक्त मणियों में से एक एक मणि
सुदृढ़ स्थापित करे । विद्युद्यन्त्र के मुख से सब तारों को शाखानुसार लेकर उनके मुख में जोड़दे और इन
तारों से शक्त्यपकर्षण—शक्ति को खींचने वाले यन्त्र को उसके उपरि मुख के पास किरणों के आक-
र्षण करने वालों को पूर्व की भांति पश्चात् क्रम से दोनों के मेलनार्थ जोड़ दे । इस प्रकार विमान के
शिर की मणियों को कह कर इससे आगे किरणसन्धानकीलों—किरणों के धारण करने वाले पेंचों को
शास्त्र से स्फुट कहूँगा, शक्तिसन्धान कीलें २५ ख्यात हैं प्रसिद्ध हैं कही गई हैं, उनमें से सूर्यकिरणों के
यानसन्धान में कीलक्रम से संक्षेप से यथामति आलोचना करके कही जाती हैं ॥ ८२-८६ ॥
तदुक्तं बृहत्काण्डिके—यह बात बृहत्काण्डिक ग्रन्थ में कही है—
सन्धानकीलका पञ्चविंशति परिकीर्तिता ॥ ८७ ॥
सूर्याशुयानसन्धाने नवमस्तेषु वर्णित ।
तत्कीलविवक्षार्थं तेषा नामान्यनुक्रमात् ॥ ८८ ॥
बृहत्काण्डिकरीत्या तु सुविचार्य निरूप्यते ।
पिञ्जुलीक कि (की ?) रणको डिम्भकोपवितीयक ॥८६॥
कच्छपो गारुडो दृण्डो शक्तिपो गोविदारक. ।
पवनास्य पञ्चवक्त्रो वञ्चक कङ्कणस्तथा ॥ ६० ॥
अहिर्मु ध्न्य (ध्य ?)कुण्डलिको नाकुलश्वोर्णनाभिक ।
त्रिमुखस्सप्तशीर्षण्यो पञ्चावर्त परावत ॥ ६१ ॥
आवर्तनाभिकोर्ध्वास्यशिलावर्त इति क्रमात् ।
विमानशक्तिसन्धानकीलका पञ्चविंशति ॥ ६२ ॥
एतेषु गोविदारकस्तु कीलकस्सुप्रकाशक ।
सूर्याशुयानसन्धानकार्यनिर्वाहको भवेत् ॥ ६३ ॥ इति ॥
सूर्यकिरणों के यान में जोड़ने में सन्धानकीलें २५ कही हैं, उनमें से नवम कील कही है, उस
कील की विवक्षा के लिए उनके नाम अनुक्रम से बृहत्काण्डिक की रीति से यहां सुविचार कर निरूपित
किया जाता है जो कि पिञ्जुलीक, किरणक, डिम्भ, कोप, वितीयक, कच्छप, गारुड, उद्दण्ड, शक्तिप,
गोविदारक, पवनास्य, पञ्चवक्त्र, वञ्चक, कङ्कण, अहिर्मुधन्य, कुण्डलिक, नाकुल, ऊर्णनाभि, त्रिमुख, सप्त-
शीर्षण्य, पञ्चावर्त, परावत, आवर्त, नाभिक, उर्ध्वास्य, शिलावर्त ये क्रम से विमान शक्तिसन्धानकीलें २५
हैं । इनमें गोविन्दारक कीलक अच्छी प्रकाशक है सूर्यकिरण या यानसन्धान कार्य का निर्वाहक
है ॥ ८७-६३ ॥
अङ्गोपसंहारयन्त्रविचार.—अङ्गोपसंहार यन्त्र का विचार—
एवमुक्त्वा परिवेषक्रियायन्त्रमत परम् ।
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्संग्रहेण प्रचक्षते ॥ ६४ ॥
सूर्यादिसर्वग्रहाणा शशिस्यानतस्तथा ।
चारातिचारवक्रातिवकसञ्चारकारणात् ॥ ६५ ॥
११० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भवेन्मेषादिराशिस्थशक्तिसम्मथनं क्रमात् ।
तेनाकाशतरङ्गस्थशक्त्युद्रेको भवेत्स्वतः ॥ ९६ ॥
तयोस्सङ्घर्षणं पश्चाज्जायतेत्यन्तवेगतः ।
तस्माच्छक्तिप्रवाहाश्चाग्निज्वालाप्रवाहवत् ॥ ९७ ॥
अनुलोमविलोमाभ्यां वक्रगत्यतिवेगतः ।
प्रवहन्ति विशेषेण राशिभोगानुसारतः ॥ ९८ ॥
सञ्चारकाले स्वपथि विमानाङ्गोपरि क्रमात् ।
तत्प्रवाहोष्णसंयोगो यदङ्गो स्याद् विशेषतः ॥ ९९ ॥
दग्ध्वा भस्मीकृत (तो ?' भूयात् तदङ्गमतिशीघ्रतः ।
उष्णप्रमापकाद् यन्त्रात् तद्विज्ञायाथ वेगतः ॥ १०० ॥
तदपायनिवृत्त्यर्थं तदङ्गमुपसंहरेत् ।
तस्मादङ्गोपसंहारयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १०१ ॥
इस प्रकार परिवेशक्रिया यन्त्र कह कर इससे आगे अङ्गोपसंहार यन्त्र संक्षेप से कहते हैं ।
सूर्य आदि सब ग्रहों के राशिसंस्थान से चार अतिचार वक्र अतिवक्र सञ्चार के कारण मेष आदि राशिस्थ
शक्ति का मन्थनक्रम से हो जावे—हो जाता है उससे आकाशतरङ्गों में स्थित शक्ति का उद्रेक—
आधिक्य—प्राबल्य स्वत हो जाता है फिर उन दोनों का संघर्षण—टकराव अत्यन्त वेग से हो जाता है
अत शक्तिप्रवाह अग्निज्वालाप्रवाह की भांति सीधे उलटे ढंग से वक्रगति के अतिवेग से राशिभोगा-
नुसार विशेषरूप से प्रवाहित हो जाते हैं । सञ्चारकाल में अपने मार्ग में विमानाङ्गों के ऊपर क्रम से
उस प्रवाह का उष्ण संयोग जिस अङ्ग में विशेष हो जावे तो वह अङ्ग अतिशीघ्र जल कर भस्म हो
जावे, उष्णतामापक यन्त्र से उसको जान कर शीघ्र उस अनिष्ट की निवृत्ति के अर्थ उस अङ्ग का
उपसंहार करे अत. अङ्गोपसंहार यन्त्र यहां कहते हैं ॥ ९४–१०१ ॥
हस्तलेख कापी संख्या ८—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह अङ्गोपसंहार यन्त्र 'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थ में कहा है—
सुमुलीक शोधयित्वा लोह माक्षीरमिश्रितम् ।
वितस्तिद्वादशायाम घनमष्टादशाङ्गुलम् ॥ १ ॥
चतुरस्रं वर्तुंल वा पीठ कुर्याद् यथाविधि ।
कान्तडिम्बिकसम्मिश्रलोहाद् द्रावकशोधितात् ॥ २ ॥
त्रिंशद्वितस्त्युन्नत च वितस्तित्रयगात्रकम् ।
मूले मध्ये तथा चान्ते छत्रीवत्कीलकान्वितम् ॥ ३ ॥
दण्डमेक कल्पयित्वा पीठमध्ये दृढ न्यसेत् ।
कीलकत्रयमारभ्य दण्डस्याधो यथाविधि ॥ ४ ॥
विमानमूलमध्यान्तस्स्थाङ्गयन्त्रावधि क्रमात् ।
पञ्चकीलसमायुक्तान् सुदृढान् मृदुलानृजून् ॥ ५ ॥
माक्षीर ? मिले सुमुलीक लोहे को शोधकर १२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ अङ्गुल मोटा चौकोन
या गोल पीठ यथाविधि करे—बनवावे, कान्त—अयस्कान्त, डिम्बिक ? मिश्रलोह द्रावक शोधित से
३० बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त मोटा मूल में मध्य में और अन्त में छत्री की भांति कीलों से युक्त एक
दण्ड बनाकर पीठ के मध्य में लगा दे तीन कीलों से आरम्भ करके दण्ड के नीचे यथाविधि विमान के
मूल मध्य अन्त में स्थित अङ्गयन्त्रों तक क्रम से पांच कीलों से युक्त सुदृढ़ मृदुल सरल—॥ १–५ ॥
उपसंहारोद्धारकावर्तकीलैर्विराजितम् ।
मिश्रलोहकृतान् शुद्धान् शलाकान् विरल यथा ॥ ६ ॥
छत्रीशलाकावत्तत्तत्कीलकेभ्य पृथक् पृथक् ।
तत्तद्देशानुसारेण योजयेत्तदनन्तरम् ॥ ७ ॥
त्रिचक्रकीलकसयुक्त मुखत्रयविराजितम् ।
नालद्वयसमायुक्तं भ्रामणीकीलकद्वयम् ॥ ८ ॥
संस्थापयेद् दण्डमूलकीलकद्वयमध्यमे ।
तदुत्तरे रुक्मतैल नलिकापात्रपूरितम् ॥ ६ ॥
११२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
लेपनार्थं कीलकानां स्थापयेद् विधिवत्तत. ।
यदङ्गस्योपसंहारः कर्तव्यमिति रोचते ॥१०॥
उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकास के साधनभूत कीलों-पेंचों से विराजित मिश्रलोहे
से किए शुद्ध शलाकाओं को छेद से छत्री की शलाकाओं की भांति उन उन कीलों से अलग अलग
जोड़ दे पुन उन उनकी रेखासुसार जोड़ दे, तीन चक्र की कीलों से युक्त तीन मुखों से विराजित दो आम्र-
णीकील संस्थापित करे, दण्डे के मूल की दो कीलों के मध्य में उनके उत्तर में रुक्मतैल-नागकेशर का
तैल नलिकापात्र में भरा हो कीलों को लपेटने के लिये विधिवत् स्थापित करे । जिस अङ्ग का उपसंहार
करना रुचिकर हो-॥ ५-१० ॥
तत्क्षणाद् दण्डमूलस्थभ्रामणी चालयेद् यदि ।
तेनाङ्गयन्त्रशलाककीलसञ्चालन भवेत् ॥११॥
छत्रीशलाकवत्तेन तच्छलाकमपि क्रमात् ।
प्रत्यङ्ङ्मुख भवेत् तस्मादङ्गयन्त्रोपसङ्घृति ॥१२॥
प्रभवेदतिवेगेन न्यग्भावस्तच्छलाकत ।
पश्चात् प्राप्तापायनाशो भवत्येव न संशय ॥१३॥
एव क्रमेणाङ्गयन्त्रोपसंहारशलाकत ।
तत्तत्कीलप्रचालनात् कर्तव्य स्यात् पृथक् पृथक् ॥१४॥
यदङ्गस्योपरि भवेद् यानस्यापायसम्भव ।
तदङ्गस्योपसंहारात् तदपायनिवारणम् ॥१५॥
अनुलोमविलोमाभ्यां तत्तत्कीलकलाचालनम् ।
तत्तद्यन्त्रोपसंहारोद्धाराश्चापि भवेत् क्रमात् ॥१६॥
यदि तुरन्त दण्डमूलस्थ भ्रामणी को चलावे तो उससे अङ्गयन्त्र शलाका की कील का सञ्चा-
लन होजावे, छत्रीशलाका की भांति उससे वह शलाका भी क्रम से अङ्गमुख की ओर होजावे उससे
अङ्गयन्त्र का उपसंहार अतिवेग से होजावे उस शलाका से नीचे सङ्कोच होजावे पश्चात् प्राप्त अनिष्ट का
नाश हो जाता ही है संशय नहीं । इस प्रकार क्रम से अङ्गयन्त्र का उपसंहार शलाका से उस उस कील
के चलाने से पृथक् पृथक् करना चाहिए, विमान के जिस अङ्ग के ऊपर अनिष्ट का सम्भव हो उस अङ्ग
के उपसंहार से उस अनिष्ट का निवारण होजाता है। सीधे उलटे ढंग से उस कील का चलाना उस उस
यन्त्र का उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकासप्रसार भी क्रम से होता है ॥ ११-१६ ॥
एवमुक्त्वा यन्त्रोपसंहारयन्त्रमत परम् ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्र कथ्येतेत्र यथाविधि ॥१७॥
कूर्मदिग्गजभूमेघविद्युद (र ?) रुणशक्तय ।
यदा पद्ममुखे सम्यङ् मेलयन्ति परस्परम् ॥१८॥
तदा विश्वम्भरी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ।
सा भित्त्वा भूमुल पश्चादत्यन्तोष्णस्वभावत. ॥१६॥
विस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११३
लिङ्गुत्रिशतवेगेनोड्डीयोड्डीयातिवेगत
धावत्यूर्ध्वं खमाश्रित्य व्योमयानं यथाविधि ॥२०॥
इस प्रकार यन्त्रोपसंहार यन्त्र कहकर इससे आगे विस्तृतास्य क्रियायन्त्र यथाविधि यहां
कहा जाता है। कूर्म (भूगर्भशक्ति ?†), दिग्गज (पृथिवी की बाह्य दिशाशक्ति ?), भूमि, मेघ, विद्युत्,
वरुण की शक्तियां जब पद्ममुख मे भली प्रकार परस्पर मिल जाती हैं तब विषम्भरी-विरुद्ध प्रयोगको धारण
करने वाली कोई शक्ति‡ प्रकट हो जाती है वह भूमि के मुख को तोड़कर—भूमि से टकराकर अत्यन्त
उष्णस्वभाव से ३०० डिग्री के वेग से उड़ उड़ कर अतिवेग से ऊपर दौड़ती है आकाश को प्राप्त हो
विमान के मार्ग की अवधि तक—॥१७—२०॥
व्याप्य यानपथ पश्चाद् विमानं स्वशक्तित ।
तत्रस्थसर्वलोकानां मेधशक्तिं निमेषत ॥२१॥
विभज्य तत्क्षणात् तस्मिन्नुद्गारं कुरुते क्रमात् ।
बुद्धिमान्द्यशिरोबाधज्वरदाहविरे (रो?) चना. ॥२२॥
सम्भवन्ति विशेषेण तत्क्षणात् तद्विकारत ।
तद्विलयाय विधिवद् यन्त्राद्यैश्शास्त्रयत क्रमात् ॥२३॥
उद्धरेत् तद्विनाशार्थं व्योमयाने यथाविधि ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रमिति शास्त्रविनिर्णय ॥२४॥
तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना विस्तृतास्यक्रियाभिध (द?) म् ।
यन्त्रमत्रातिसंक्षेपात् प्रसङ्गत्या निरूप्यते ॥२५॥
—यानपथ मे व्याप्त होकर पश्चात् विमान को भी व्याप्त हो अपनी शक्ति से विमानस्थित जनों
की मेधशक्ति को भिन्न भिन्न करके तुरन्त उद्गार कर देती है बुद्धिमन्दता शिरपीड़ा ज्वरदाह विरेचन रोग
विशेषत उत्पन्न हो जाते हैं उनके विकार से—पूर्वरूप से तुरन्त विधिवत् यन्त्र आदि से शास्त्रानुसार
जानकर क्रम से उसके नाशार्थ विमान में यथाविधि उद्धार करे—उपाय करे । वह विस्तृतास्य क्रिया यन्त्र
है, यह शास्त्र का निर्णय है, अत शास्त्रोक्त विधि से विस्तृतास्यक्रियानामक यन्त्र को अतिसंक्षेप से
प्रसङ्ग से निरूपित किया जाता है ॥ २१-२५ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है—
बाहुप्रमाण विस्तारे गात्रे द्वाविंशदङ्गुलम् ।
वर्तुलाकारत पीठं कुर्यात् पिप्पलदारुणा ॥२६॥
बाहुप्रमाणगात्रं च द्वात्रिंशद्बाहुरुन्नतम् ।
स्तम्भ कृत्वा दारुमय तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ॥२७॥
व्योमयानाङ्गोपयन्त्रसङ्ख्या विधिवत् क्रमात् ।
अङ्गोपयन्त्रदिग्रेखामनुसृत्य यथाविधि ॥२८॥
† "कूर्मो बिभर्ति धरणीं खलु चारुपृष्ठे" (शुक० ४।१।३१)
‡ "विष विप्रयोगे"
११४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्तम्भमूलाद्यशिरोभागान्त केन्द्रानुसारत ।
प्रदक्षिणावर्तकीलाननुलोमविलोमत ॥ २९ ॥
स्तम्भस्य प्रतिकेन्द्रे थ स्थापयेद् द्वन्द्वत क्रमात् ।
पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्रमध्यकेन्द्रमुखान्तरे ॥ ३० ॥
भस्त्रिकानालस्तम्भकीलद्वन्द्वावधिक्रमात् ।
सर्वत्र योजयेन्नालान् कीलसंख्यानुसारत ॥ ३१ ॥
बाहुभर माप लम्बाई चौड़ाई में, २२ अंगुल मोटाई में गोलाकार पीठ पिप्पल की लकड़ी से
बनावे, बाहुभर माप मोटा ३२ अंगुल ऊंचा स्तम्भ काष्ठ का बना कर उसके मध्य में दृढ स्थापित करे,
व्योमयान के अङ्गोपयन्त्र संख्या से विधिवत् क्रम से अङ्गोपयन्त्र की दिशा रेखा का अनुसरण करके
यथाविधि स्तम्भमूल से शिरोभाग तक केन्द्र के अनुसार घूमने वाली कील के सीधे उलटे ढंग से स्तम्भ
के प्रति केन्द्र में स्थापित करे। दो दो करके पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्र के मध्य केन्द्रमुख में भस्त्रिकानाल
से स्तम्भ की दो कील की अवधि के क्रम
विस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११५
कुर्यात् सम्पूर्णतश्शास्त्रविधिनातिप्रयत्नत ।
त्रिचक्रभ्रामणीकीलमादौ तस्मात् प्रचालयेत् ॥ ४० ॥
तेन द्विचक्रकोलकाश्च सम्यग्भ्राम्यन्ति वेगत ।
अतस्सम्यग्भ्रामकास्स्युस्तस्तम्भस्थावर्तकीलका ॥ ४१ ॥
ततो द्विचक्रकीलस्थपक्षाघातकभस्त्रिका ।
तच्चक्रभ्रमणादेव विस्तृतास्या भवन्ति हि ॥ ४२ ॥
ततोतिवेगता वायुस्तन्मुखात् सम्प्रधावति ।
पश्चाच्छ्वासोच्छ्वासवत्तत्सन्धिनालान्तरे क्रमात् ॥४३॥
सन्धिनालें द्राव से शुद्ध और सुदृढ करें फिर दो चक्कों वाली कीलें पश्चात् पक्षाघात भस्त्रिकाएं
तथा इससे तीन चक्रों वाला भ्रामणीकील यन्त्र और उपसंहार कील आठ प्रकार या आठ स्थानों में कहे
हैं । यन्त्रों के अङ्ग इस प्रकार कहकर अब उनका प्रयोग वर्णित करते हैं, विषम्भरा शक्ति स्वत भूमि को
वेग से तोड कर विमान के सारे अङ्गों पर आक्रमण करके जब व्याप जाती है तो विमान के अङ्गयन्त्रों
को पूर्णरुप से शास्त्रविधि से अतिप्रयत्न से तुरन्त विस्तृतास्य करदे, प्रथम तीन चक्रों वाली भ्रामणी कील
को चलावे उससे दो चक्रों वाली कीलें सम्यक् वेग से घूमती हैं अत स्तम्भस्थ घूमनेवाले पेंच भली प्रकार
घूमने वाले हो जाते हैं । फिर दो चक्र वाली कीलों में स्थित पक्षाघातक भस्त्रिकाए उन चक्रों के भ्रमण
से ही विस्तृतास्य हो जाती हैं फिर अति वेग से उसके मुख से वायु दौड़ता है पश्चात् क्रम से श्वास
उच्छ्वास की भांति सन्धिनाल के अन्दर—॥ ३६-४३ ॥
प्रविश्य चातिवेगेन तद्वायुश्चरति स्वत ।
तद्घाताघातत पश्चादङ्गयन्त्रमुखस्थिता ॥ ४४ ॥
भस्त्रनाला मध्यकेन्द्रे विस्तृतास्त्वेकथैव हि ।
भवन्ति तन्मुखात् पश्चाद् भस्त्रिकावद् विशेषत ॥४५॥
फूत्कारपूर्वक वायुर्वाति पूरंप्रवाहवन् ।
तत्प्रवाहोतिवेगेन शक्ति सम्यग् विषम्भराम् ॥ ४६ ॥
अपहृत्याकाशवातमण्डले नियोजयति ।
ततो विषम्भरा शक्तिस्तत्रैव लयमेधते ॥ ४७ ॥
ततो विमानस्थजनमेघोर्लुङनाशन भवेत् ।
एव विषम्भराशक्ति नाशयित्वा यथाविधि ॥ ४८ ॥
चालयेदुपसहारकीलक तदनन्तरम् ।
तेन यानाङ्गोपयन्त्र्राण्यभूवन् पूर्ववत् क्रमात् ॥ ४६ ॥
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रप्रयोगश्चैवमीरित (तम्) ।
एवमुक्त्वा विस्तृतास्यक्रियायन्त्र यथाविधि ॥ ५० ॥
सप्रह्लाद वैरूप्यदर्पणायन्त्रमयोच्यते ।
११६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
—प्रविष्ट होकर वह वायु स्वत अतिवेग से सञ्चार करती है पश्चात् इस वायु के आघात से अङ्ग-
यन्त्रों के मुख में स्थित भस्त्रानालें मध्य केन्द्र में एक साथ—एक दम विस्तृत हो जाती हैं फिर उनके
मुख से भस्त्रिका की भांति विशेषत फूत्कारपूर्वक वायु पूर्ण प्रवाह से चलती है वह प्रवाह अति वेग से
विषम्भरा शक्ति को खींच कर आकाशमण्डल में नियुक्त कर देता है तब विषम्भरा शक्ति वहां ही लय
को प्राप्त हो जाती है । फिर विमान में स्थित मनुष्यों के मेघरोग का नाश हो जाता है। इस प्रकार
विषम्भरा शक्ति को यथाविधि नष्ट करके अनन्तर उपसंहार कील को चलावे उससे विमानांगों के उपयन्त्र
पूर्व जैसे हो जाते हैं । विवृतास्यक्रियायन्त्र कह कर वैरूप्यदर्पण यन्त्र अब संक्षेप से कहा जाता
है ॥ ४४-५० ॥
वैरूप्यदर्पणयन्त्रनिर्णय. —वैरूप्य दर्पणयन्त्र का निर्णय—
विमाननाशनाय ये समागच्छन्ति शत्रव ॥ ५१ ॥
तेषा देहविरूपत्व यस्य सन्दर्शनाद् भवेत् ।
वैरूप्यदर्पण इति तमाहु पण्डितोत्तमा ॥ ५२ ॥
तद्दर्पणकृत यन्त्र वैरूप्यादर्शयन्त्रकम् ।
इति शास्त्रेषु निर्णीत यन्त्रतत्त्वविदा वरे ॥ ५३ ॥
सङ्ग्रहेणात्र विधिवत् वक्ष्ये तद्रचनाविधिम् ।
विमान के नाशार्थ जो शत्रुजन आ जाते हैं उनके देह की विरूपता जिसके देखने से हो
जावे उसे वैरूप्य दर्पण इस नाम से ऊंचे विद्वान् कहते हैं । वह दर्पण से किया यन्त्र वैरूप्यादर्श यन्त्र
शास्त्रों में यन्त्रतत्त्ववेत्ताओं ने निर्णय किया है । उसकी रचनाविधि को संक्षेप से विधिवत्
कहूंगा ॥ ५१-५३ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
यदा तु व्योमयानस्य विनाशार्थ तु शत्रव ॥ ५४ ॥
आगत्यावृत्य तिष्ठन्ति विमानं क्रूरकर्मिण ।
तेषा रूपविकारार्थ यन्त्रोय परिकीर्तित ॥ ५५ ॥
पीठकेन्द्रावर्तकीलज्योतिस्तम्भास्तथैव च।
विद्युद्यन्त्रावर्तधूमनालञ्चापि तत परम् ॥ ५६ ॥
घोण्टिकातैलत्रिचक्रकीलकोशत्रय तथा ।
घूमदीपोपसहारनालो चापि यथाक्रमम् ॥ ५७ ॥
वैरूप्यादर्शयन्त्रस्याङ्गानीत्याहुर्मनीषिण ।
वितस्तिद्वयविस्तार वितस्तिद्वयमु (रु ?) न्नतम् ॥ ५८ ॥
बैलवेन वर्तुलं पीठ कुर्याच्छास्त्रविधानतः ।
तस्मिन् द्वादशकेन्द्राणि कल्पयेत् समरेखतः ॥ ५६ ॥
वैरूप्यदर्पणयन्त्र ] [ ११७
द्वावर्तकीलकान् पश्चात् स्थापयेत् प्रतिकेन्द्रके ।
चतुर्विशत्यङ्गुलावर्तगात्र चोन्नते तथा ॥ ६० ॥
जबकि विमान के विनाशार्थ क्रूरकर्मी शत्रु आकर विमान को घेर कर खड़े हो जावें तो उनके
रूप के विकारार्थ यह यन्त्र कहा है । पीठ, केन्द्र, आवर्तकील, ज्योतिस्तम्भ, विद्युद्यन्त्रावर्त, धूमनाल,
घोण्टिका तैल, —सुपारीतैल, त्रिचक कील, तीन कोश, धूमदीप, उपसंहारनाल ये वैरूप्य आदर्श यन्त्र के
अङ्ग मनीषी विद्वानों ने कहे हैं । २ बालिश्त ऊंचा पीठ गोल विल्वकाष्ठ ( बेल वृक्ष की लकड़ी ) से
शास्त्रानुसार करे । उसमें बारह केन्द्र समरेखा से बनावे पश्चात् घूमने वाले पेंच प्रतिकेन्द्र स्थापित करे,
२४ अंगुल मोटा तथा ऊंचा - ॥ ५४-६० ॥
वैरूप्यदर्पणकृत ज्योतिस्तम्भ यथाविधि ।
मध्यकेन्द्रे प्रतिष्ठाप्य विद्युद्यन्त्र तदग्रत ॥ ६१ ॥
द्वितीयकेन्द्रे विधिवत् स्थापयेत् कीलबन्धनात् ।
क्रमात् केन्द्रत्रये पश्चादावर्तधूमनालकम् ॥ ६२ ॥
प्रदक्षिणाकारतन्त्रीन् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
घोण्टिकातैलपात्र तु कीलके पञ्चमे न्यसेत् ॥ ६३ ॥
मुखत्रयसमायुक्त कोशत्रयमत. परम् ।
वितस्त्येकप्रमाणेन निर्मित दुग्धचर्मणा ॥ ६४ ॥
षट्सप्ताष्टमकेन्द्रादिधूमनालावधिक्रमात् ।
स्थापयेद् विधिवत् पश्चाद् दृढ नवमकेन्द्रके ॥ ६५ ॥
वैरूप्यदर्पण से किया ज्योतिस्तम्भ यथाविधि मध्यकेन्द्र में प्रतिष्ठित करके उसके आगे विद्युद्यन्त्र
दूसरे केन्द्र में विधिवत् कीलबन्धन से स्थापित करे, क्रम से तीन चक्रों में घूमने वाली धूमनालों को
गोलाकार तारों को सुदृढ स्थापित करे, घोण्टिका-मैनफल के तैल या सुपारी तैल का पात्र पांचवें कील में
रखे, इससे आगे तीन मुखों से युक्त तीन कोश एक बालिश्त माप से दुग्धचर्म—दूध के पनीर से
बनाया हुआ ६, ७, ८, संख्या वाले केन्द्र आदि धूमनाल विधानक्रम से नवम केन्द्र में विधिवत् स्थापित
करे ॥ ६१-६५ ॥
धूमोपसंहारनाल पश्चाद् दशमकेन्द्रके ।
दीपोपसंहारनाल तथैकादशके न्यसेत् ॥ ६६ ॥
आवृत्ततन्त्रीनालकीलक द्वादशकेन्द्रके ।
एव सन्धायं विधिवद् विनियोगस्स्वत परम् ॥ ६७ ॥
शत्रुरूपविकारार्थं कर्तव्य शास्त्रत क्रमात् ।
निरूप्यैव यथाशास्त्र यन्त्रस्य रचनाविधिम् ॥ ६८ ॥
तत्प्रयोगविधिं वक्ष्ये सग्रहेण यथामति ।
विद्युद्यन्त्रात् समाहृत्य शक्तिमादौ यथाविधि ॥ ६६ ॥
११८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
त्रिचक्रकीलयन्त्रेथ चोदयेत् सप्रमाणतः ।
तेन भ्राम्यति तद्यन्त्रं स्वतो वेगात् स्वकेन्द्रके ॥ ७० ॥
पश्चात् धूमोपसंहार नाल दशम केन्द्र में तथा दीपोपसंहार नाल ग्यारहवें केन्द्र में रखे, घूमने
वाले तारों की नालकील बारहवें केन्द्र में इस प्रकार विधिवत् प्रसङ्गत लगा कर इसके आगे शत्रु का
रूप बिगाड़ने के अर्थ करना चाहिये क्रम से शास्त्र से निरूपण करके यन्त्र की रचनाविधि को संक्षेप से
यथामति कहूंगा, विशुयन्त्र से शक्ति को लेकर यथाविधि तीन चक्रों वाले यन्त्र में सप्रमाण प्रेरित करे,
इससे वह यन्त्र स्वतः स्वकेन्द्र में घूमता है ॥ ६६-७० ॥
तद्वेगात् सर्वकेन्द्रस्थतत्तत्तन्त्रीमुखात् पुन ।
शक्तिसञ्चोदनात् सर्ववृत्तकीला भवन्ति हि ॥ ७१ ॥
त्रिचतु पञ्चकेन्द्रस्थतन्त्रीमार्गाद् यथाक्रमम् ।
शक्तिसंयोजनं कृत्वा कीलकभ्रमणं ततः ॥ ७२ ॥
कुर्यात् तेन क्रमान्नालत्रयं विकसितं भवेत् ।
पश्चान्नवमकेन्द्रावर्तकीलभ्रमणं तथा ॥ ७३ ॥
पूर्ववत् कारयेत् पश्चात् तेन कोशत्रयं क्रमात् ।
विस्तृतं स्यात् ततः पञ्चमकेन्द्रस्यावर्तकीलकम् ॥७४॥
पूर्ववद् भ्रामयित्वाथ शक्तिं तन्मार्गतः क्रमात् ।
योजयेत् सप्रमाणेन घोण्टिकातैलपात्रके ॥ ७५ ॥
उसके वेग से सर्व केन्द्रस्थ उस उस तार के मुख से पुन शक्ति के प्रेरण से सब ओर घूमने
वाली कीलें-पेंच घूमते हैं, तीन चार पांच केन्द्रों में स्थित हुए तारों के मार्ग से यथाक्रम शक्तिसंयोजन
करके फिर कीलभ्रमण करे-पेंच को घुमावे उससे तीनों नाल खुल जावेंगे पश्चात् नवम केन्द्र की कीली
का भ्रमण पूर्व की भांति करे पश्चात् उससे क्रम से तीनों कोश विस्तृत हो जावें फिर पांचवें केन्द्र की
घूमने वाली कील पूर्ववत् घुमा कर उस मार्ग से शक्ति को सप्रमाण घोण्टिका तैल-मैनफल या सुपारी
के तैल के पात्र में युक्त कर दे ॥ ७१-७५ ॥
तत्तैलं विषधूमस्स्यात् समग्र शक्तिवेगतः ।
कोशत्रयेथ विधिवत् तद्धूमं पूरयेत् तथा ॥ ७६ ॥
एकैककोशस्थधूममेकैकधूमनालके ।
पूरयेद् विधिवत् पश्चात् तत्तत्कालानुसारतः ॥ ७७ ॥
अनुलोमविलोमाभ्यां धूमनालद्वयात् ततः ।
विषधूमं समाहृत्य द्वौ भागौ शत्रु मण्डले ॥ ७८ ॥
संयोजयेत् ततस्तेनावरणं परिवेषवत् ।
बाह्यप्रदेशे शत्रूणां मण्डलस्य भवेत् क्रमात् ॥ ७९ ॥
घोण्टिकातैलतः पश्चाद् दीपं कृत्वा यथाविधि ।
ज्योतिस्तम्भान्तरे कीलबन्धनात् स्थापयेत् दृढम् ॥ ८० ॥
वैरूप्यदर्पणयन्त्र ] [ ११६
वह तैल शक्ति वेग से सब विषैला धुआं हो जावे—हो जावेगा, उस धुएं को तीनों कोशों में
भर दे फिर एक कोश में स्थित धूवां एक एक धूमनाल में विधिवत् भर दे, पश्चात् उस उसके समयानुसार
अनुलोम विलोम—सीधे उलटे ढंग से दो धूमनालों से विषधूम दो भाग लेकर शत्रुमण्डल मे संयुक्त
कर दे फिर परिवेषक्रिया की भांति बाह्य प्रदेश में शत्रुओं के मण्डल का आवरणक्रम से हो जावे ।
पश्चात् घोष्टिका तैल—मैनफल या सुपारी के तैल से यथाविधि दीपक करके ज्योतिस्तम्भ के अन्दर
कीलबन्धन से स्थापित कर दे ॥ ७६-८० ॥
ज्योतिस्तम्भान्तर व्याप्य तत्प्रकाशस्समग्रत ।
आसमन्ताद् रक्तवर्णं जपाकुसुमवत् क्रमात् ॥ ८१ ॥
करोति पश्चात् तज्ज्योतिस्तम्भस्योपर्यथाविधि ।
संयोजयेत् सप्रमाणं विद्युद्भासनमत् परम् ॥ ८२ ॥
ज्योतिर्भान समाहृत्य विद्युद्भासस्स्ववेगत ।
हरितश्वेतपीतादिसप्तवर्णविकारताम् ॥ ८३ ॥
करोति तत्क्षणात् पश्चात् समग्र स्तम्भकेन्द्रके ।
ज्योतिस्तम्भे भासमानविद्युद्दीप्रकाशयो ॥ ८४ ॥
तृतीयधूमनालेन धूममाकृष्य कोषात् ।
विधिवद् योजयेद् वातनालमार्गात् प्रमाणतः ॥ ८५ ॥
ज्योतिस्तम्भ के अन्दर व्याप कर उसका समग्र प्रकाश सब ओर से जपाफूल की भांति रक्त-
वर्ण—लाल रंग वाला कर देता है पश्चात् इस ज्योतिस्तम्भ के ऊपर यथाविधि सप्रमाण विद्युद्भास—
बिजुली के प्रकाश को संयुक्त कर दे । इसके आगे ज्योतिर्भान—ज्योति के भान को विद्युत् का भास
स्वत लेकर हरा सफेद पीला आदि सात रंगों की विकारता को तत्क्षण करता है । पश्चात् स्तम्भ केन्द्र में
ज्योतिस्तम्भ में भासमान विद्युत् और दीपप्रकाश में तीसरे धूमनाल से कोश से धूम को खींच कर
विधिवत् वातनाल मार्ग से प्रमाण में जोड़ दे ॥ ८१-८५ ॥
विषधूमस्ततस्तेन दीपवत्त्व प्रकाशते ।
तद्दीपभानमाहृत्य नालमार्गाद् यथाविधि ॥ ८६ ॥
ज्योतिस्तम्भपुरोभागस्थितवैरूप्यदर्पणम् ।
संयोजयेत् ततो दीपप्रकाशस्त समग्रत ॥ ८७ ॥
व्याप्य वेगाद् विशेषेण कलात्रिंशत्प्रभास्वर ।
भवेद् द्रष्टुमशक्य च शत्रूणा स्तम्भन तथा ॥ ८८ ॥
पुन कोषात् त्रयाद् धूममाहृत्य विधिवत् क्रमात् ।
शत्रु मण्डलवाह्यस्थपरिखेवान्तरे पुन ॥ ८९ ॥
संयोजयेत् पञ्चविंशल्लिङ्गमात्र यथाविधि ।
पश्चाद् धूमं तत्प्रकाशे धूमनालान्तरात् पुन ॥ ९० ॥
१२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
फिर धूम दीपवत्ता को प्रकाशित करता है उस दीपप्रकाश को लेकर नालमार्ग से यथाविधि
ज्योतिस्तम्भ के सामने वाले भाग में स्थित वैरूप्य दर्पण संयुक्त कर दे फिर वह दीपप्रकाश उस “वैरूप्य-
दर्पण" को समग्र रूप से व्याप्त कर विशेषरूप से ३०० कलाओं में भास्वर—सूर्यजैसा प्रकाशवाला
हो जावे और शत्रुओं के लिए देखने में अशक्य तथा स्तब्ध करने वाला हो जावे, फिर तीनों कोशों से
विधिवत् धूम को लेकर क्रम से शत्रुमण्डल के बाहिरी परिवेष के अन्दर २५ डिग्री प्रमाण में यथाविधि
युक्त कर दे, पश्चात् उस प्रकाश में धूमनाल के अन्दर से धूम को—॥ ८६-६० ॥
संयोजयेदष्टविंशल्लिङ्कमात्रमत परम् ।
तद्धूमेनावृत भान शत्रूणामुपरि क्रमात् ॥ ६१ ॥
व्याप्य तेषामङ्गसन्धिमद्योस्थानं च वेगत ।
मनोविकारता नेत्रमान्य देहाङ्गबन्धनम् ॥ ६२ ॥
दग्धवृन्ताकवद् देह ज्वरदाहादिपीडनम् ।
करोति तत्क्षणात् सर्वे मूर्च्छिताश्च भवन्ति हि ॥६३॥
पश्चाद् विमानं शास्त्रोक्तविधिना लाघवात् पुन ।
आकाशपथरेखाया चोदयेत् पूर्ववत् सुधी ॥ ६४ ॥
एवमुक्त्वा वैरूप्यदर्पणायन्त्रक्रिया तत ।
पद्मचन्द्रमुख नाम यन्त्रमद्य प्रचक्षते ॥ ६५ ॥
अठाईस लिङ्क—डिग्री प्रमाण में युक्त करे, इससे आगे उस धूम से आच्छादित या पूर्ण-
भान—प्रकाशक्रम से शत्रुओं के ऊपर व्याप कर वेग से उनके अंगों की सन्धि मेद-स्थान और मनो-
विकारता को नेत्रमन्दता देहांगों का बन्धन—जकड़ाव को जले बैंगन के समान देह को ज्वरदाह आदि
पीडा को तुरन्त कर देता है और सब मूच्छित हो जाते हैं । पश्चात् विमान को शास्त्रोक्त विधि से लाघव
से फिर आकाशमार्ग की रेखा में बुद्धिमान् प्रेरित करे-उड़ावे । इस प्रकार वैरूप्य दर्पणयन्त्र क्रिया को
कह कर पद्मचक्रमुख नाम का यन्त्र अब कहते हैं ॥ ६१-६५ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में —
पीठषट्कुर्नालदण्डो विद्युत्तन्त्री तथैव च ।
सूक्ष्मदर्पणपत्राणि तथा पद्मक्रियाविधि ॥ ६६ ॥
पद्मप्रतिष्ठास्थानानि तद्यन्त्रेष यथाक्रमम् ।
वाताकर्षणत्वग्भस्त्रकीलकाश्च तथैव हि ॥ ६७ ॥
सङ्कोचनविकासनकीलको च तत परम् ।
त्रिचक्रभ्रामणीयन्त्रस्थानानिर्यांण्यस्तथा ॥ ६८ ॥
वातप्रवाहमार्गाणि चोपसंहारकीलकम् ।
एते द्वादश यन्त्राङ्गानीति शास्त्रविनिर्णय ॥ ६६ ॥
वितस्त्यष्टकमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
चतुरस्रं वर्तुलं वा पीठ पिप्पलदारुणा ॥ १०० ॥
किरणाकर्षकादर्शनाल ] [ १२१
प्रकल्प्य तस्मिन् द्वादश केन्द्रस्थानानि कारयेत् ।
रेखाप्रसारणं कुर्यान्मध्यकेन्द्रात् समग्रत ॥ १०१ ॥
पीठ, शंकु, नालदण्ड, विद्युत्तार, सूक्ष्मदर्पणयन्त्र, पद्मक्रियाविधि, पद्मप्रतिष्ठा के स्थान,
वाताकर्षण करने वाली खाल की भस्त्रिकाओं की कीलें—पेंच, सङ्कोच विकास की दो कीलें—पेंच, त्रिचक्र
भ्रामणी यन्त्र स्थापन का निर्णय, वायुप्रवाह के मार्ग, उपसंहार कील, ये १२ यन्त्राङ्ग हैं यह शास्त्र का
निर्णय है । ८ बालिशत लम्बा ३ बालिशत ऊंचा चौकोण या गोल पीठ पिप्पल की लकड़ी से बना कर
उसमें १२ केन्द्रस्थान बनावे, मध्य केन्द्र से एक ओर रेखा खींचे ॥ ६६-१०१ ॥
मध्ये शङ्कुर्नालदण्डो शङ्कुनोभयपार्श्वयो ।
विद्युत्तन्त्री पूर्वकेन्द्रे पद्मपत्राण्यथोत्तरे ॥१०२॥
पत्राणां पद्मरचना दक्षिणोत्तरकेन्द्रयो ।
पद्मप्रतिष्ठा ईशानीदादाग्नेयान्तमत परम् ॥१०३॥
तत्पुरस्ताद्† वातापकर्षणत्वग्भस्त्रिका स्मृता ।
सङ्कोचशीलक तद्वत्तस्य वायव्यकेन्द्रके ॥१०४॥
तथा विकासकील च भवेन्नैऋत्यकेन्द्रके ।
त्रिचक्रभ्रामणीकील यन्त्र पूर्वमुखे स्मृत ॥१०५॥
वातप्रवाहमार्गाणि प्रतिपद्मादध क्रमात् ।
उपसंहारकील तद्दक्षिणे स्यादितीरितम् ॥१०६॥
एतद [म?] ङ्गाद्वादशक केन्द्रद्वादशके स्मृतम् ।
अथाङ्गरचनामांऽस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥१०७॥
द्वादशाङ्गुलगात्र च वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
अभ्रमृद्दर्पणात् कुर्याच्छङ्कु शास्त्रविधानत ॥१०८॥
मध्य में शङ्कु, शङ्कु के सहारे दोनों पाश्र्वों में दो नालदण्ड, पूर्व केन्द्र में विद्युत् की दो
तारें, उत्तर में पद्मपत्र, पत्रों की पद्मरचना दक्षिण उत्तर केन्द्रों में, पद्मप्रतिष्ठा ईशानी कोण से आग्नेय
कोण तक इससे आगे उससे पूर्व वायु को खींचने वाली चर्मभस्त्रिका कही है । उसी भांति सङ्कोचनकील
उसके वायव्य केन्द्र में तथा विकासनकील निऋति कोण के केन्द्र में, त्रिचक्रभ्रामणीकील यन्त्र पूर्वमुख
में कहा है । वायुप्रवाहमार्ग प्रतिपद्म के नीचे क्रम से, उपसंहारकील उसके दक्षिण में हो ऐसा कहा है ।
ये १२ अङ्ग १२ केन्द्रों में कहे हैं । अब अङ्गरचना का मार्ग-प्रकार संक्षेप से निरूपित किया जाता है ।
१२ अङ्गुल मोटा ३ बालिशत ऊंचा अभ्रमृद् दर्पण से शंकु शास्त्रविधान से बनावे ॥ १०२–१०८॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह दर्पणप्रकरण में कहा है—
रम्भासत्त्व पञ्चभाग तथैव मञ्जूषक्षाराष्टक पञ्च कान्तम् ।
कुष्ठ्यादसत्त्वाष्टकमाढकस्य सत्त्वत्रय कूर्मकसप्तसारम् ॥१०६॥
† ‘त्वत्पुरस्तात्’ हस्तलेखे ।
१२२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भल्यत्वगष्टादश कुड्मलस्य क्षारत्रय वैणविक्राष्टसत्त्वम् ।
खुरत्रय शून्यमृदष्टविंशत् त्रिविक्रमक्षारचतुष्टयम् ।।११०।।
शङ्खद्वय पारदपञ्चकं च क्षाराष्टक वीरुधसारमेकम् ।
रोप्यत्रय वाञ्जनिकत्रय चाष्टादशैते विधिवद् यथाक्रमम् ।।१११।।
सशोध्य शास्त्राद् वरपरांमूषामुखेऽथ सम्पूर्य वि (व?) राट्कुण्डे ।
निक्षिप्य वेगाद् द्विशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो गालयित्वाथ शीघ्रम् ।।११२।।
शनैश्शनैरुष्णरस रू (स?) वाङ्गात् सम्पूरयेद् यन्त्रमुखोर्ध्वनाले ।
एव कृते त्वभ्रमृद्दर्पण स्याद् दृढ सुसूक्ष्म सुमनोहर च ।।११३।। इत्यादि ।।
रम्भासत्त्व - केले का सत्त्व (क्षार या कपूर ५ भाग, मञ्जूषक्षार - मञ्जीठ का क्षार ८ भाग,
कान्त - सूर्यकान्त ५ भाग; क्रव्यादसत्त्व ? - क्रव्यादा - जटामांसी का सत्त्व या क्रव्यादरस - तांबे लोहे
गन्धक पारे आदि से बना योग ? ८ भाग, आढक - अरहर का सत्त्व ३ भाग, कूर्मसार ? - कछुवे की
खोपड़ी की भस्म या कूर्मपृष्ठ - वाश पुष्प का सार ? ७ भाग, भल्यत्वक् - भल्ल - भिलावे की छाल
१० भाग, कुड्मल - पुष्पकोरक शीतल चीनी का क्षार ३ भाग, वैणविक - वेणु - बांस का सत्त्व वंशलोचन
या वंशाङ्गार ८ भाग, खुर - नखी गन्धद्रव्य ३ भाग, शून्यमृत् - अभ्रक मिट्टी या अभ्रकभस्म ?
२८ भाग, त्रिविक्रम क्षार ? - त्रिविक्रमरस ? - ताम्बा भस्म पारा गन्धक कृत्रिम योग ? ४ भाग, शङ्ख
२ भाग, पारा ५ भाग, क्षार - सज्जीक्षार ८ भाग, वीरुधसार ? १ भाग, रौप्य - चान्दी ३ भाग, आञ्जनिक-
सुरमा ३ भाग, ये अठारह वस्तुएं विधिवत् यथाक्रम शोधकर शास्त्ररीति से वरपरांमूषा बोतल के मुख
में भर कर विराट् कुण्ड में रख कर वेग से २०० दर्जे उष्णता प्रमाण से शीघ्र गलाकर धीरे धीरे उष्णरस
को स्र वा अङ्ग से यन्त्रमुख की ऊपरवाली नाल में भर दे, ऐसा करने पर अभ्रमृत् - दर्पण सूक्ष्म मनोहर
हो जावे ।। १०६-११३ ।।
बाहुदण्डप्रमाणेन तद्दर्पणविनिर्मितौ ।
नालदण्डौ तथैवास्य वामदक्षिणपार्श्वयो ।।११४।।
संस्थापयेद् दृढ पश्चाद् विद्युत्तन्त्रीन् यथाक्रमम् ।
पूर्वकेन्द्रादितस्सर्वत्रानून् † स्यूत यथा भवेत् ।।११५।।
स्थापयेत् कीलनालाना मध्यकुक्षौ यथाविधि ।
अभ्रमृद्दर्पणकृतपथपत्राय्यतः परम् ।।११६।।
पञ्चाशदुत्तरशतमुदीचीकेन्द्रतन्त्रिषु ।
योजयित्वाथ विधिवत् स्थापयेद् विरल यथा ।।११७।।
लल्लोक्तेनैव विधिना तत्पत्राणि प्रकल्पयेत् ।
वायुदण्ड प्रमाण से उस दर्पण से दो नाल दण्ड इसके वाम दक्षिण पार्श्वों में दृढ संस्थापित
करे पश्चात् विद्युत्तार - बिजली के तारों को यथाक्रम पूर्व केन्द्र के आदि से सर्वत्र पहुंचे हुए हो जावें ऐसे
† सर्वत्रानस्रुत हस्तलेखे (सर्वत्र-धनसि-ऊत) यदि तदा ह्रस्वेन भवितव्यमुकारेण ।
परिवेशक्रियानालायन्त्र ] [ १२३
कीलों के मध्य कुक्षि में अभ्रमृत दर्पण से बनाए हुए पद्मपत्रों को स्थापित करे, इससे आगे १५० उत्तर
दिशा की केन्द्रतारों में विधिवत् युक्त करके श्रीदेवरूप में स्थापित करे, आचार्य लल्ल की कही विधि से
उन पत्रों को बनावे ॥११४—११७॥
तदुक्तं पट्टिकानिबन्धने—वह पट्टिकानिबन्धन में कहा है—
अभ्रमृद्दर्पणं पञ्चदशभाग तथैव च ।
चत्वारि सौरिकाक्षारं मेलयित्वा परस्परम् ॥११८॥
गालयित्वा यथापक्व पट्टिकायन्त्रके न्यसेत् ।
लशुनत्वगिवाश्यन्त (य ?) सूक्ष्माण्यावर्तरूपत ११६।।
पश्चाद् भवन्ति पत्राणि पद्मपत्रमिव क्रमात् । इत्यादि ॥
अभ्रमृद्दर्पण १५ भाग, सौरिकाक्षार-गजपिप्पली या मजीठ या हुलहुल का क्षार ४ भाग मिलाकर
पक जाने पर पट्टिकायन्त्र पर डालवे फिर लशुन की त्वचा की भांति अत्यन्त सूक्ष्म गोलरूपों से पत्र-पत्त
पद्मपत्र की भांति क्रम से हो जाते हैं ॥११८-११६॥
तै पद्मरचनार्थं तद्वामदक्षिणकेन्द्रयो ॥१२०॥
पद्मप्रस्तारवन् कीलप्रस्तार कारयेत्तथा† ।
तत्पत्रतन्त्रीनाहृत्य तत्तत्केन्द्राद् यथाविधि ॥१२१॥
पत्राहरणसन्धानकीलेषु पृथक् पृथक् ।
सन्धाययेत् तत्प्रस्तारमनुसृत्य यथाविधि ॥१२२॥
उन पत्रों से पद्मरचनार्थ उसके वामदक्षिण केन्द्रों में पद्मप्रस्तार की भांति कीलप्रस्तार बनावे,
अनन्तर पत्र की तारों को उस उस केन्द्र से लेकर यथाविधि पत्रों के पकड़ने के जोड़ कीलों में पृथक् पृथक
उनके फैलाव के अनुसार यथाविधि जोड़ दे ।। १२०-१२२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार में कहा है—
पत्राहरणकीलस्य चालनाद् वेगत क्रमात् ।
प्रस्तारकीलसन्धानानुसारेण यथाक्रमम् ॥१२३॥
एकैकपद्ममायाति तत्तत्तन्त्रीमुखात् पुन ।
तथानुसन्धानकीलचालनात् पत्रसञ्चय ॥१२४॥
स्वतो भूत्वा भवेत् पद्माकार पश्चान्मनोहरम् ।
नालवत् प्रभवेदेकैकपत्रं च स्वभावत । १२५ ॥
एकैकपत्रनालस्याधातपत्रद्वय भवेत् ।
वाताकर्षणकीलं तु स्थापयेत् तन्मुखान्तरे ॥ १२६ ॥
† दीर्घ आर्षप्रयोग ।