बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिरणाकर्षकदर्शनाल ] [ १०७
विमानमध्यभागेऽथदशमे केन्द्रकीलके ।
स्थापयेत् सुदृढं कीले पञ्चावर्तमुखैः क्रमात् ॥६५॥ इत्यादि ॥
एवं बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि ।
निरूप्य पश्चाद् यानस्य शिरोमणिरुदीर्यते ॥६६॥
किरगान्तरेषा (खलु) तत्तच्छक्यपकर्षणे ।
विमानाना अष्टोत्तरशतशिरोमणय ईरिता ॥६७॥
—भरकर, वर्णिकुण्ड में संस्थापित करके पश्चात् सुरघा नामक भस्त्रा से ३१५ दर्जे के वेग से
गलावे, पश्चात् पिंगले शुद्ध रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। शास्त्रविधान से ऐसा करने पर
बिम्बार्कघृष्णिकिरण का आकर्षण करनेवाला दर्पण होआवे जो अत्यन्त सूक्ष्म सुदृढ़ दर्पण से बनी बिम्बार्क-
किरणादर्शनाल यह कहा जाता है। विमान के अग्रभाग में और दशवें केन्द्रकील में पाच घूमनेवाले
मुखवाली कीलों से सुदृढ़ स्थापित करें । इस प्रकार बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि स्थापित करके
पश्चात् विमानयान की शिरोमणि कही जाती है। अन्य किरणों के उस उस शक्ति के खीचने में विमानों
की शिरोमणियां कही हैं ॥ ६१—६७ ॥
तदुक्तं मणिकल्पप्रदीपिकायाम्—वह कहा है मणिकल्पप्रदीपिका ग्रन्थ में—
द्वात्रिंशन्मणिवर्गेषु वर्गे द्वादशके क्रमात् ।
ये प्रोक्तास्त्युत्तरशतमणयस्ते महर्षिभि ॥६८॥
शिरोमणय इत्युक्तविमानाना विशेषतः ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि शास्त्रोक्तानि यथाक्रमम् ॥६६॥
शङ्करो ? शक्तक खर्वो भास्करो मण्डलस्तथा ।
कलान्तको दीप्तिकश्च नन्दको चक्रकण्ठक ॥७०॥
पञ्चनेत्रो राजमुखो राकास्य कालभैरव ।
चिन्तामणि कोशिकश्च चित्रकोशिको भास्करक ॥७१॥
उडुराजो विराजश्च कल्पक कामिकोद्भूत ।
पञ्चशीर्षण पावणिक पञ्चाक्ष पारिभद्रक ॥७२॥
इषीक. काशभृत्काक कङ्कास्य कौटिकस्तथा ।
कलाकर कौर्मिकश्च विघ्न पञ्चपावक ॥७३॥
सैंहिकेयो रौद्रमुखो मञ्जीरो डिम्भकोर्जक ।
पिङ्गक कर्णिक. क्रोधो क्रव्याद कालकोलिक ॥७४॥
विनायको विश्वमुख पावकास्य कपालक ।
विजयो विप्लव. प्राण्ड्डिको कार्मुक (ख ?) पृथु ॥७५॥
शिञ्जीरशिशिकश्चण्डो जम्बाल कुटिलोमिक ।
जृम्भकशक्तामित्रश्च विशाल्य कङ्कुगोरभ ॥७६॥