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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 368 में से

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पृष्ठ 143

१२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
फिर धूम दीपवत्ता को प्रकाशित करता है उस दीपप्रकाश को लेकर नालमार्ग से यथाविधि
ज्योतिस्तम्भ के सामने वाले भाग में स्थित वैरूप्य दर्पण संयुक्त कर दे फिर वह दीपप्रकाश उस “वैरूप्य-
दर्पण" को समग्र रूप से व्याप्त कर विशेषरूप से ३०० कलाओं में भास्वर—सूर्यजैसा प्रकाशवाला
हो जावे और शत्रुओं के लिए देखने में अशक्य तथा स्तब्ध करने वाला हो जावे, फिर तीनों कोशों से
विधिवत् धूम को लेकर क्रम से शत्रुमण्डल के बाहिरी परिवेष के अन्दर २५ डिग्री प्रमाण में यथाविधि
युक्त कर दे, पश्चात् उस प्रकाश में धूमनाल के अन्दर से धूम को—॥ ८६-६० ॥
संयोजयेदष्टविंशल्लिङ्कमात्रमत परम् ।
तद्धूमेनावृत भान शत्रूणामुपरि क्रमात् ॥ ६१ ॥
व्याप्य तेषामङ्गसन्धिमद्योस्थानं च वेगत ।
मनोविकारता नेत्रमान्य देहाङ्गबन्धनम् ॥ ६२ ॥
दग्धवृन्ताकवद् देह ज्वरदाहादिपीडनम् ।
करोति तत्क्षणात् सर्वे मूर्च्छिताश्च भवन्ति हि ॥६३॥
पश्चाद् विमानं शास्त्रोक्तविधिना लाघवात् पुन ।
आकाशपथरेखाया चोदयेत् पूर्ववत् सुधी ॥ ६४ ॥
एवमुक्त्वा वैरूप्यदर्पणायन्त्रक्रिया तत ।
पद्मचन्द्रमुख नाम यन्त्रमद्य प्रचक्षते ॥ ६५ ॥
अठाईस लिङ्क—डिग्री प्रमाण में युक्त करे, इससे आगे उस धूम से आच्छादित या पूर्ण-
भान—प्रकाशक्रम से शत्रुओं के ऊपर व्याप कर वेग से उनके अंगों की सन्धि मेद-स्थान और मनो-
विकारता को नेत्रमन्दता देहांगों का बन्धन—जकड़ाव को जले बैंगन के समान देह को ज्वरदाह आदि
पीडा को तुरन्त कर देता है और सब मूच्छित हो जाते हैं । पश्चात् विमान को शास्त्रोक्त विधि से लाघव
से फिर आकाशमार्ग की रेखा में बुद्धिमान् प्रेरित करे-उड़ावे । इस प्रकार वैरूप्य दर्पणयन्त्र क्रिया को
कह कर पद्मचक्रमुख नाम का यन्त्र अब कहते हैं ॥ ६१-६५ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में —
पीठषट्कुर्नालदण्डो विद्युत्तन्त्री तथैव च ।
सूक्ष्मदर्पणपत्राणि तथा पद्मक्रियाविधि ॥ ६६ ॥
पद्मप्रतिष्ठास्थानानि तद्यन्त्रेष यथाक्रमम् ।
वाताकर्षणत्वग्भस्त्रकीलकाश्च तथैव हि ॥ ६७ ॥
सङ्कोचनविकासनकीलको च तत परम् ।
त्रिचक्रभ्रामणीयन्त्रस्थानानिर्यांण्यस्तथा ॥ ६८ ॥
वातप्रवाहमार्गाणि चोपसंहारकीलकम् ।
एते द्वादश यन्त्राङ्गानीति शास्त्रविनिर्णय ॥ ६६ ॥
वितस्त्यष्टकमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
चतुरस्रं वर्तुलं वा पीठ पिप्पलदारुणा ॥ १०० ॥