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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

वैरूप्यदर्पणयन्त्र ] [ ११७
द्वावर्तकीलकान् पश्चात् स्थापयेत् प्रतिकेन्द्रके ।
चतुर्विशत्यङ्ग‌ुलावर्तगात्र चोन्नते तथा ॥ ६० ॥
जबकि विमान के विनाशार्थ क्रूरकर्मी शत्रु आकर विमान को घेर कर खड़े हो जावें तो उनके
रूप के विकारार्थ यह यन्त्र कहा है । पीठ, केन्द्र, आवर्तकील, ज्योतिस्तम्भ, विद्युद्यन्त्रावर्त, धूमनाल,
घोण्टिका तैल, —सुपारीतैल, त्रिचक कील, तीन कोश, धूमदीप, उपसंहारनाल ये वैरूप्य आदर्श यन्त्र के
अङ्ग मनीषी विद्वानों ने कहे हैं । २ बालिश्त ऊंचा पीठ गोल विल्वकाष्ठ ( बेल वृक्ष की लकड़ी ) से
शास्त्रानुसार करे । उसमें बारह केन्द्र समरेखा से बनावे पश्चात् घूमने वाले पेंच प्रतिकेन्द्र स्थापित करे,
२४ अंगुल मोटा तथा ऊंचा - ॥ ५४-६० ॥
वैरूप्यदर्पणकृत ज्योतिस्तम्भ यथाविधि ।
मध्यकेन्द्रे प्रतिष्ठाप्य विद्युद्यन्त्र तदग्रत ॥ ६१ ॥
द्वितीयकेन्द्रे विधिवत् स्थापयेत् कीलबन्धनात् ।
क्रमात् केन्द्रत्रये पश्चादावर्तधूमनालकम् ॥ ६२ ॥
प्रदक्षिणाकारतन्त्रीन् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
घोण्टिकातैलपात्र तु कीलके पञ्चमे न्यसेत् ॥ ६३ ॥
मुखत्रयसमायुक्त कोशत्रयमत. परम् ।
वितस्त्येकप्रमाणेन निर्मित दुग्धचर्मणा ॥ ६४ ॥
षट्सप्ताष्टमकेन्द्रादिधूमनालावधिक्रमात् ।
स्थापयेद् विधिवत् पश्चाद् दृढ नवमकेन्द्रके ॥ ६५ ॥
वैरूप्यदर्पण से किया ज्योतिस्तम्भ यथाविधि मध्यकेन्द्र में प्रतिष्ठित करके उसके आगे विद्युद्यन्त्र
दूसरे केन्द्र में विधिवत् कीलबन्धन से स्थापित करे, क्रम से तीन चक्रों में घूमने वाली धूमनालों को
गोलाकार तारों को सुदृढ स्थापित करे, घोण्टिका-मैनफल के तैल या सुपारी तैल का पात्र पांचवें कील में
रखे, इससे आगे तीन मुखों से युक्त तीन कोश एक बालिश्त माप से दुग्धचर्म—दूध के पनीर से
बनाया हुआ ६, ७, ८, संख्या वाले केन्द्र आदि धूमनाल विधानक्रम से नवम केन्द्र में विधिवत् स्थापित
करे ॥ ६१-६५ ॥
धूमोपसंहारनाल पश्चाद् दशमकेन्द्रके ।
दीपोपसंहारनाल तथैकादशके न्यसेत् ॥ ६६ ॥
आवृत्ततन्त्रीनालकीलक द्वादशकेन्द्रके ।
एव सन्धायं विधिवद् विनियोगस्स्वत परम् ॥ ६७ ॥
शत्रुरूपविकारार्थं कर्तव्य शास्त्रत क्रमात् ।
निरूप्यैव यथाशास्त्र यन्त्रस्य रचनाविधिम् ॥ ६८ ॥
तत्प्रयोगविधिं वक्ष्ये सग्रहेण यथामति ।
विद्युद्यन्त्रात् समाहृत्य शक्तिमादौ यथाविधि ॥ ६६ ॥