बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
१२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
नानापकर्षणार्थाय तत्कीलकं चालयेत् तत ।
सीत्कारपूर्वकं वायु तन्नाल. पिबति स्वयम् ॥ १२७ ॥
पीतवायु पुनर्नालस्त्वग्रे(ग्ले ?) वेगात् प्रमुञ्चति ।
आघातपत्रवर्गस्तद्वायु नीत्वा स्ववेगतः ॥ १२८ ॥
विमानाद्दू (दू ?) रतो बाह्यवायौ सम्मेलयेत् क्रमात् । इत्यादि ॥
पत्राहरण कील के चलाने से वेग से क्रमण प्रसारकील-फैलानेवाली कील के जोड़ के अनु-
सार यथाक्रम एक एक पद्म तार के मुख से आता है फिर जोड़नेवाली कील के चलाने से पत्रों का
सञ्चय स्वयं होकर पश्चात् पद्माकार - कमल के आकार वाला मनोहर हो जावे और एक एक पत्र-पत्ता
नाल की भांति हो जावे । एक एक पत्रनाल का आघात - मिले दो पत्र हो जावें, वायु को खींचने वाली
कील तो उसके मुख के अन्दर स्थापित करे, भांति भांति से खींचने के लिये उस कील को चलावे तब वह
नाल सीत्कार-सी करके वायु को स्वयं पीता है फिर पिए हुए वायु को नाल आगे वेग से छोड़ देती है
मेल को प्राप्त पत्रवर्ग उस वायु को नाल आगे वेग से लेकर विमान से दूर बाहिरी वायु में क्रम से
मिलादे ॥ १२३-१२८ ॥
एव निर्मितपद्माना यन्त्रे स्थानविनिर्णय ॥ १२६ ॥
उक्त हि धुण्डिनायेन तदेवान्न निरूप्यते ।
इस प्रकार बने पद्मों-कमलों का यन्त्र में स्थान निश्चय धुण्डिनाथ आचार्य ने कहा है वह
यहां निरूपित किया जाता है ॥ १२६ ॥
उक्त हि सन्धानपटले - सन्धानपटल ग्रन्थ में कहा है-
विमानप्रतिबन्धकचण्डवात निवारणम् ॥ १३० ॥
लल्लोक्तपद्मसन्धानादेव स्यान्नान्यथा भवेत् ।
तस्मात् पद्मानुसन्धानस्थानानि प्रोच्यन्ते (ते?) धुना ॥ १३१॥
पूर्वस्या दिशि ईशान्योदाग्नेयान्तं यथाक्रमम् ।
पद्मानि स्थापयेत् सप्तकेन्द्रेष्वविरल यथा ॥ १३२ ॥
सप्तकेन्द्रस्थपद्माना पुरोभागे यथाविधि ।
एकैकपद्मनालस्याधस्तात् सप्त यथाक्रमम् ॥ १३३ ॥
क्षीरीत्वनिर्मितान् दीर्घवाताकर्षणभस्त्रिकान् ।
स्थापयेत् सुदृढ पश्चाद् द्विचक्रावतंकीलकं ॥ १३४॥
यन्त्रसङ्कोचकीलस्तु तस्य वायव्यकेन्दके ।
विमान को रोकने वाले प्रचण्डवायु का निवारण लल्ल आचार्य के कहे पद्म-कमल के लगाने
से ही हो-होता है अन्यथा नहीं होता है । अतः पद्माकमलों को युक्त करने के स्थान अब कहे जाते हैं ।
पूर्व दिशा में ईशानी कोण से लेकर आग्नेय कोण तक यथाक्रम पद्मों-कमलों - वायु को निका-
लने वाले दलचक्रों को ७ केन्द्रों में पास पास स्थापित करे । ७ केन्द्रों में स्थित पद्मों के सामनेवाले भाग
अङ्गोपसंहारयन्त्र ] [ १२५
में यथाविधि एक एक पद्मनाल के नीचे यथाक्रम क्षीरीवृक्ष की छाल से बनी वायु को खींचनेवाली लम्बी
भस्त्राओं को सुदृढ़ स्थापित करे पश्चात् दो चक्रों को घुमानेवाली कीलों-पेंचों से यन्त्रसङ्कोचकील उसके
वायव्यकेन्द्र में लगावे ॥ १३०-१३४ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है -
अनुलोमान्मूलकील विलोमादूर्ध्वकीलकम् ।
यदा सम्भ्राम्यते वेगाद् यन्त्रसङ्कुचितो भवेत् ॥ १३५ ॥
षट्चक्रं विस्तृतैर्युक्तं पञ्चनालविराजितम् ।
तथा द्वादशतन्त्रीभिर्द्वादशास्यैश्च संयुतम् ॥ १३६ ॥
द्वादशाङ्गोपकरणकीलकं सुमनोहरैः ।
भ्राजमानं विस्तृतास्यमूर्ध्वाधो भागतस्तथा ॥ १३७ ॥
द्वाभ्या भ्रमण कीलाभ्या योजित कमठाकृतिम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रसङ्कोचकीलकम् ॥ १३८ ॥
तत्कील स्थापयेद् यन्त्रवायव्ये सुदृढ यथा ॥ इत्यादि ॥
मूल कील अनुलोम - सीधेरूप ऊपर वाली कील विलोम-उलटे रूप से जब वेग से घूमती हैं
तो यन्त्र सङ्कुचित हो जावे-हो जाता है । विस्तृत ६ चक्रों से युक्त पांच नालों से सम्पन्न १२ तारों से
और १२ मुखों से युक्त १२ अङ्गों का सङ्कोच करनेवाली सुमनोहर कीलों से भ्राजमान-प्रकाशमान-प्रवर्त्त-
मान ऊपर नीचे भागों से बड़े मुखवाला दोनों कीलों के द्वारा भ्रमणसाधन कछवे के आकारवाला ऐसे
लक्षणों से युक्त यन्त्र को सङ्कुचित करनेवाला कील-पेंच हो उस ऐसे पेंच को यन्त्र के वायव्यकोण में
सुदृढ़ स्थापित करे ॥ १३५-१३८ ॥
एव संस्थाप्य सुदृढ यन्त्रसङ्कोचकीलकम् ॥ १३९ ॥
यन्त्रविस्तृतकीलस्य स्थापन चाभिवर्ण्यते ।
इस प्रकार यन्त्रसङ्कोच करनेवाले पेंच को स्थापित करके यन्त्र को विस्तृत करनेवाले पेंच का
स्थापन वर्णित किया जाता है ॥ १३९ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह क्रियासार में कहा है-
क्रमाद् द्वादशचक्रस्य वर्तुलं पूर्णकुम्भवत् ॥ १४० ॥
नालद्वादशकं रन्तस्सशलाकं विराजितम् ।
उत्क्षेपणक्रियावर्तंकीलद्वादशकं युतम् ॥ १४१ ॥
वातप्रपूरणावर्तमध्यकीलकसंयुतम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रविस्तृतकीलकम् ॥ १४२ ॥
विस्तृताङ्गं भवेद् यन्त्रमेतत्कीलचालनात् ।
तस्माद् यन्त्रविकासकीलकं नैऋत्यकेन्द्रके ४३।
१२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्थापयेत् सुदृढं पश्चाद् यन्त्रपूर्वमुखे क्रमात् ।
त्रिचक्रभ्रामणीकीलप्रतिष्ठा च कारयेत् ॥ १४४ ॥
क्रम से बारह चक्रों के मुखवाला पूर्ण घड़े के समान गोल भीतरी शलाकाओं सहित बाहर नालों
से विराजमान, उत्क्षेपणक्रिया के लिए घूमनेवाली बारह कीलों से युक्त वायु से भरे घूमनेवाले मध्य पेंच
से युक्त हो इन लक्षणों से युक्त यन्त्र को विस्तृत करनेवाला पेंच विस्तृतशङ्गवाला होवे, यह यन्त्र कील
चलाने से यन्त्र का विकास करनेवाली कील को नैर्ऋत्यकोण वाले केन्द्र में सुदृढ स्थापित करके पश्चात्
क्रम से यन्त्रमुख के तीन चक्रोंवाली भ्रामणी कील की प्रतिष्ठा को कर देता है ॥ १४०-१४४ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
दन्तचक्रसमायुक्त दण्डत्रयविनिर्मितम् ।
शिरोभागे शिशुमाराकारवत् कृतं दारुणा ॥ १४५ ॥
संयोजित तथा चोर्ध्वकीलचक्रं विराजितम् ।
भ्रामणीकीलक प्रोक्तमेतल्लक्षणलक्षितम् ॥ १४६ ॥
एतत्सञ्चालनादेव यन्त्रसर्वाङ्गचालनम् ।
भवेद् यन्त्रविकासश्च तत्तत्कीलकचालनात् ॥ १४७ ॥
तस्मात् त्रिचक्रभ्रामणीकीलक पूर्वकेन्द्रके ।
स्थापयेद् विधिना पञ्चशङ्कुताडनतो दृढम् ॥ १४८ ॥ इत्यादि ॥
दन्तचक्रों से युक्त तीन दण्डों से बना शिरोभाग में शिशुमार=ऊदबिलाओ जलजन्तु के आकार
वाला लकड़ी से बनाया हुआ और उपरीकीलचक्रों से जोड़ा हुआ इस लक्षणवाला भ्रामणीकील कहा है
इसके चलाने से ही यन्त्र के सब अङ्गों का चलना होता है । अतः तीन चक्रोंवाला भ्रामणी पेंच पूर्वकेन्द्र
में विधि से पांच शङ्कुओं के ताडन से दृढ स्थापित करे ॥ १४५-१४८ ॥
वातप्रवाहमार्गाणि पद्माधो भागसन्धिषु ।
पद्मसङ्ख्यानुसारेण कर्त्तव्यानि यथाक्रमम् ॥ १४६ ॥
वायुप्रवाह के मार्ग पद्मसंख्यानुसार पद्मों के नीचले भाग की सन्धियों में यथाक्रम करने
चाहिए ॥ १४६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासारग्रन्थ में—
द्वादशाङ्गुलमानस्य द्वारेण सुविकल्पितम् ।
द्वादशाङ्गुलप्रमाणेनोन्नतेन समन्वितम् ॥ १५० ॥
त्वगावरणसंयुक्तं कृत पिप्पलदारुणा ।
वातप्रवहनार्थाय नालसप्तकमीरितम् ॥ १५१ ॥
वातप्रवहनालं स्यादेतल्लक्षणलक्षितम् ।
एकैकपद्ममूलस्थकीलकेषु यथाक्रमम् ॥ १५२ ॥
सन्धारयेत् सप्तनालान् तेन वातः प्रधावति । इत्यादि ॥
पद्मचक्रमुखयन्त्र ] [ १२७
१२ अङ्गुल मापवाले मुखद्वार से बना हुआ १२ अङ्गुलमाप ऊंचाई से युक्त छाल के आवरण से युक्त
पिप्पल की लकड़ी से किया गया हो, वायु के बहने के लिये ७ नालें कही है, इन लक्षणों से लक्षित वायु
को बहानेवाला नाल हो, एक एक पद्ममूल में स्थित पेंचों में यथाक्रम ७ नालों को जोड़े—लगावे इस से
वायु दौड़ता है ॥ १५०—१५२ ॥
अथोपसंहारकीलक तद्दक्षिणकेन्द्रके ॥ १५३ ॥
स्थापयेत् सुदृढ शुद्ध द्वादशास्य मनोहरम् ।
अदितेगर्भकोशीयसन्धिस्यानेषु वेगत ॥ १५४ ॥
वसन्तादिक्रमात् तत्तदृत्कालानुसारत ।
जायन्ते चण्डकूर्माद्याश्शक्तयो विषदारुणा ॥ १५५ ॥
वारुणीप्रेरणात् पश्चाद् वातस्तम्भ विशन्ति हि ।
महावातस्तम्भकेन्द्रवातस्रोतस्स्वत परम् ॥ १५६ ॥
पुन दशमुखवाला उपसंहारकील—पेंच उसके दक्षिण केन्द्र में सुदृढ़ स्थापित करे, अग्नि के
गर्भकोश के सन्धिस्थानों में वेग से वसन्त आदि क्रम से उस उस ऋतुकाल के अनुसार प्रचण्ड कूर्म
आदि शक्तियां दारुणविषवाली प्रकट हो जाती है, पश्चात् वारुणी—विद्युत् की प्रेरणा से वातस्तम्भ में
प्रविष्ट होतो है, इस से आगे महावातस्तम्भकेन्द्र के वातस्रोतों में—॥ १५३—१५६ ॥
भवेद्यन्मकल्लोलप्रवाहश्शब्दपूर्वकम् ।
एतदाकाशपरिधिकद्यावरणवायुषु ॥ १५७ ॥
प्रविश्यात्यन्तवेगेन करोति मन्थन तत ।
तत्प्रकोपाच्चण्डवातप्रवाहो वेगतो भवेत् ॥ १५८ ॥
यदा विमानोपरि तद्वायुर्घाति विशेषत ।
क (क ?) श्चिन्निर्यासबत्तस्मिन् पङ्कस्सञ्जायते स्वत ॥१५६॥
तत्सम्पर्काद् विमानस्थयन्तॄणा स्यात् मसूरिका ।
शिथिलत्व समायाति विमानञ्चापि तत्क्षणात् ॥ १६० ॥
अतस्तद्वायुमाकृष्य विमानाद् बाह्यत क्रमात् ।
सञ्चोदनार्थं विधिवत् पद्मपत्रमुखाभिधम् ॥ १६१ ॥
यन्त्र सस्थापयेत् तस्मात् तत्स्वरूपो निरूपित. ।
विशालतरङ्गप्रवाह शब्दपूर्वक हो जावे, इस के आकाश परिधिकक्षा के आवरणवायुओं में
अत्यन्तवेग से प्रविष्ट होकर मन्थनकरता है फिर उसके प्रकोप से प्रचण्डवायुप्रवाह वेग से हो जावे—हो
जाता है, जब विमान के ऊपर वह वायु विशेषत. गति करता है तब कोई गोन्द के समान पङ्क-कीचड़ सा
स्वतः प्रकट हो जाता है उसके सम्पर्क से विमानस्थ चालक और यात्रियों के मसूरिका (छोटी चेचक) हो
जाती है और विमान भो तत्क्षण शिथिलता को प्राप्त हो जाता है अत' उस वायु को खींचकर विमान से
बाहिर क्रम से प्रेरित करने के लिये विधिवत्—पद्मपत्रमुखनामक यन्त्र को संस्थापित करे, अतः उसे
स्वरूपप्रसङ्ग में निरूपित किया है ॥ १५७—१६१ ॥
हस्तलेख कापी संख्या ६—
अथ कुण्टिणीशक्तियन्त्रनिर्णयः—अब कुण्टिणीशक्तियन्त्र का निर्णय देते हैं :—
पद्मचक्रमुखं यन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ।
कुण्टिणीशक्तियन्त्रोथ सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥१॥
ग्रीष्मोष्मांशुसमूहेषु त्रिपञ्चदशमेलनात् ।
कुलकाख्यमहाशक्तिरत्यन्तोष्मा प्रजायते ॥२॥
पद्मचक्रमुख यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर कुण्टिणीशक्तियन्त्र अब संक्षेप से निरूपित
किया जाता है । ग्रीष्म की ऊष्म किरण समूहों में तीन, पांच, दश के मेल से कुलका नामक महाशक्ति
अत्यन्त ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है ॥१।२॥
तदुक्तमृतुकल्पे—वह कहा है ऋतुकल्प में—
महाक्षोणित्रयं पश्चात् कोटीनामेकविंशति. ।
लक्षाणां पञ्चसङ्घं सहस्राणां तु षोडश ॥३॥
पश्चादेकोनविंशत् संख्याकान् † सूर्यमरीचय ।
प्रसरन्ति विशेषेणादितेर्ग्रीष्माख्यगर्भंत ॥४॥
तेषां वर्गविभागस्तु वाल्मीकिगणिते क्रमात् ।
पञ्चकोट्यष्टसहस्रसप्तोत्तरशतं स्मृतम् ॥५॥
तेषामेकैकवर्गेथ विभागाश्शतधा कृता ।
तेषु द्वितीयवर्गस्थविभागेषु यथाक्रमम् ॥६॥
तीन माहक्षोणि ? अविज्ञेय संख्या विशेष सम्भवतः खर्व पश्चात् ३१ क्रोड, पांच सङ्घ
(गुणित) लाख, सोलह सहस्र फिर १६ संख्या में सूर्यकिरणें विशेषरूप में अदिति—सूर्यमाता अग्नि
के ग्रीष्म नामक गर्भ से प्रसार करती हैं उनका वर्गविभाग तो वाल्मीकिगणित में क्रम से ५ क्रोड
८ सहस्र १०७ कहे हैं । उनमें से भी एक एक वर्ग में विभाग १०० किये हैं उनमें द्वितीय वर्गस्थ विभागों
में यथाक्रम—॥३—६॥
त्रिपञ्चदशमोष्म्यांशुमेलनं ग्रीष्ममध्यमे ।
यदा भवति ग्रीष्मोष्मा कूमन्ति व्याप्यते स्वयम् ॥७॥
† जस्-स्थाने शस् आर्षं
कुण्टिणीशक्तियन्त्र ] [ १२६
पश्चात् कच्छपप्रम्लोचशक्त्याकर्षणतः क्रमात् ।
कुलकारूपा जायते काचिच्छक्ति ज्वलनवत्स्वतः ॥८॥
तत्संयोगो यदि भवेद् व्योम्नि यानपथि क्रमात् ।
भस्मीकृत भवेद् व्योमयानमत्यन्तशीघ्रत ॥९॥
तदपायविनाशार्थं कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ।
संस्थापयेद् यानकण्ठप्रदेशे सम्प्रदायतः ॥१०॥ इत्यादि ॥
तीन पांच दश ऊष्म किरणों का मेल ग्रीष्म में जब होता है तो ग्रीष्म की उष्णता कूर्म तक
स्वयं व्याप्तो है पश्चात् कच्छप प्रम्लोचन शक्ति के आकर्षण से क्रम से कुलका नामक कोई शक्ति
ज्वलन की भांति स्वतः उत्पन्न हो जाती है यदि उसका संयोग आकाश में बिमान के मार्ग में क्रम से
हो जाये तो विमान अत्यन्त शीघ्र भस्म हो जावे उस अनिष्ट के विनाशार्थ कुण्टिणीशक्ति यन्त्र विमान के
कण्ठप्रदेश में परम्पराविचार से संस्थापित करे ॥७-१०॥
नारायणोपि—नारायण भी इसमें कहता है—
ग्रीष्मोष्मकिरणवर्गविभागेषु यथाक्रमम् ।
द्वितीयवर्गकिरणाः पञ्चाशीतिसहस्रशः ॥११॥
तेष्वष्टत्रिदशसंख्याकाश्चोत्यन्तसूक्ष्मकाः ।
कूर्मस्थप्रम्लोचशक्त्याकर्षणेन स्वभावतः ॥१२॥
एकीभूय यदा ग्रीष्मे मिलितास्स्यु परस्परम् ।
तदा सञ्जायते काचित् कुलिकाख्या महत्तरा ॥१३॥
शक्तिरत्यन्तोष्णरूपा अग्निज्वालावलीरिव ।
तत्संयोगो यदि भवेद् व्योमयानस्य तत्क्षणात् ॥१४॥
भस्मीकृत भवेद् व्योमयानमत्यन्तशीघ्रतः ।
तदपायविनाशार्थं कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥१५॥
संस्थापयेद् यानकण्ठप्रदेशे सम्प्रदायतः ॥ इति ॥
ग्रीष्म के ऊष्म किरणवर्ग के विभागों में यथाक्रम द्वितीय वर्ग की किरणें ८५ सहस्र हैं उनमें
आठ त्रिदश-८+१३ = २१ संख्या किरणें अत्यन्त सूक्ष्म हैं । कूर्मस्थ प्रम्लोचन शक्ति के आकर्षण से
स्वभावत एक होकर जब ग्रीष्म में परस्पर जब मिल जावें तो कुलिका नामक अत्यन्त उष्णरूपा अग्नि
ज्वालामाला के समान महत्तरा शक्ति उत्पन्न हो जाती है, यदि विमान का उससे संयोग हो जावे तो
विमान अत्यन्त शीघ्र भस्म हो जावे उस अनिष्ट के विनाशार्थ कुण्टिनीशक्तियन्त्र विमान के कण्ठ-
प्रदेश में परम्परा से संस्थापित करे ॥११-१५॥
लल्लोपि—लल्ल आचार्य ने भी कहा—
ग्रीष्मोष्मकिरणवर्गविभागेषु यथाक्रमम् ।
द्वितीयवर्गे द्वात्रिंशद् विभागस्थांशुषु क्रमात् । १६ ॥
१२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
पञ्चत्रिदशसंख्याका किरणा ऊष्मरूपिणः ।
कूर्म्मस्थप्रम्लोचशक्त्याकर्षणेन स्वभावतः ॥ १७ ॥
परस्परं (तु) सम्मिलिता भवेयुर्ग्रीष्मके यदा ।
तदा सजायते काचिच्छक्तिरुष्णस्वरूपिणी ॥ १८ ॥
कुलका नाम तद्वेगाद् विमानं नाशमेधते ।
तां निवारयितुं शास्त्रे कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥ १६ ॥
उक्तं तस्माद् व्योमयाने प्रतिष्ठां कारयेद् दृढम् ॥२०॥ इत्यादि ॥
ग्रीष्म से उष्ण किरणवर्ग के विभागों में यथाक्रम दूसरे वर्ग में ३२ विभागों में रहने वाली
किरणों में क्रम से पांच, तीन, दश संख्या वाली ऊष्मरूपी किरणें कूर्मस्थ प्रम्लोचन शक्ति के स्वभावतः
आकर्षण से ग्रीष्म में जब परस्पर सम्मिलित हो जावें तो उष्णरूपी कोई कुलका शक्ति प्रकट हो जाती है
उससे वेग से विमान नाश को प्राप्त हो जाता है, उसके निवारण करने को शास्त्र में कुण्टिणी यन्त्र कहा
है अतः विमान में दृढ़ प्रतिष्ठा बनावे ॥ १६-२० ॥
अतस्तत्कुण्टिणीशक्तियन्त्रमत्रातिसंग्रहात् ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानसिद्धयर्थं सम्प्रचक्षते ॥ २१ ॥
अतः उस कुण्टिणी शक्तियन्त्र को अति संक्षेप से उसके स्वरूपपरिज्ञान की सिद्धि के अर्थ
यहां कहते हैं ॥ २१ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे-वह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में-
व्योमयानाङ्गयन्त्रेषु कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ।
ग्रीष्मकालीनकुलिकाशक्तिनाशार्थमुच्यते ॥ २२ ॥
पीठकेन्द्रावर्तकीलद्रवपात्रपटोर्मिका ।
चक्रदन्ति क्षीरपटनालावरणकीलका ॥ २३ ॥
विद्युत्तन्त्रीसमायुक्तभ्रामणीचक्रमेव च ।
विस्मृतास्योपसंहारकीलकाश्चेत्यमी दश ॥ २४ ॥
कुण्टिणीशक्तियन्त्रस्या ङ्गानीति विनिर्णित्ता ।
पञ्चाङ्गान्येवमुक्त्वास्य प्रयोगं ( ?) सम्प्रचक्षते ॥२५॥
वितस्तित्रयविस्तारं वितस्त्यर्धोन्नत तथा ।
चषकाकारवत् पीठं वर्तुलं कारयेद् दृढम् ॥ २६ ॥
रचयेद् सप्तकेन्द्राणि तस्मिन् प्रागादितः क्रमात् ।
आवर्तकीलकान् पश्चात् सप्तकेन्द्रेषु योजयेत् ॥ २७ ॥
द्रवपात्रं मध्यकेन्द्रे स्थापयेत् सुदृढं यथा ।
विमान के अङ्गयन्त्रों में कुण्टिणीशक्ति यन्त्र ग्रीष्मकालीन कुलिका शक्ति के नाशार्थ कहा
कुटिटणीशक्तियन्त्र ] [ १३१
जाता है। पीठ, केन्द्र, आवर्तकील, द्रषपात्र, पट, ऊर्मिका, चक्रदन्ति, क्षीरपटनालावरण कील, विद्युत्तारों
से युक्त भ्रामणी चक्र, विस्तृतस्योपसंहार कील ये दश कुट्टिणी शक्तियन्त्र के अङ्ग हैं ऐसा निर्णय
किया गया है। पांच अंग इस प्रकार कह कर प्रयोग कहते हैं। तीन बालिश्त चौड़ा लम्बा आधा बालिश्त
ऊँचा लोटा पात्र के आकार की भांति गोल पीठ दृढ बनावें, उस पर पूर्व आदि क्रम से ७ केन्द्र रचें,
पश्चात् ७ केन्द्रों में घूमने वाले पेंच लगावें, मध्य केन्द्र में द्रषपात्र सुदृढ स्थापित करें ॥ २२-२७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
कुलकाकर्षणे गुञ्जागृध्निकाद्रावक वरम् ।
तथैव श्येनकर्माण चापि श्रेष्ठतम विदुः ॥ २८ ॥
नागक्रौञ्चिकसौरम्भलोहाद् ये कृतदर्पणात् ।
निर्मिते चषकाकारपात्रे पश्चाद् यथाविधि ॥ २९ ॥
सम्पूरयेत् सप्रमाण गुञ्जागृध्निकाद्रावकम् ।
शोधित श्येनकर्माण सूत चापि निवेशयेत् ॥ ३० ॥
पश्चात् संस्थापयेद् यन्त्रमध्यकेन्द्रे यथाविधि ।
आहत्यादित्यकिरणान् पश्चात्तस्मिन्नियोजयेत् ॥ ३१ ॥
तद्रशुवेगात्तत्पात्रद्रावकस्थमणौ क्रमात् ।
क्रौञ्चिनीनामका काचिच्छक्त्यत्यन्तशीतला ॥ ३२ ॥
उद्भूय व्याप्य सर्वत्र कुलिकाभिमुखा भवेत् ।
पश्चात् तत्कुलिका शक्तिस्तदाकर्षणात्स्वयम् ॥ ३३ ॥
पतत्यत्यन्तवेगेन पात्रस्थद्रावके क्रमात् ।
अथ तत्कुलिकाशक्तिं मणि पिबति तत्क्षणात् ॥ ३४ ॥ इत्यादि ॥
तथैव स्थापयेद् वामकेन्द्रे पश्चात् पटोर्मिकान् ।
कुल्लका के आकर्षण में गुञ्जा—रत्ति घूंघची, गृध्निका ? गृध्र पत्र—तम्बाकू या गृञ्जनिका—
रक्त सोञ्जना का शुद्ध द्रावक, इसी प्रकार श्येनकर्मा—पारे को भी श्रेष्ठ समझा नाग क्रौञ्चिक सौरम्भ
लोहे से जिन से किये दर्पण से बने चषकाकार पात्र में यथाविधि सप्रमाण गुञ्जागृध्निका द्रावक भर दे,
शोधित श्येनकर्मा मारा हुआ पारा भी डाले पश्चात् यन्त्र के मध्य केन्द्र में यथाविधि संस्थापित करे,
सूर्य की किरणों को पीछे उसमें नियुक्त करे, उन किरणों के वेग से उस पात्र के द्रावकस्थ मणि में क्रम
से क्रौञ्चिनी नाम वाली कोई शक्ति अत्यन्त शीतल प्रकट होकर सर्वत्र व्याप्त कर कुलिका के सामने हो
जावे पश्चात् कुलिका शक्ति उसके आकर्षण से स्वयं अत्यन्त वेग से पात्रस्थ द्रावक में गिरती है। अनन्तर
कुलिका शक्ति को मणि तुरन्त पी लेती है, वैसे ही पश्चात् वामकेन्द्र में पटोर्मिकों को स्थापित
करे ॥ २८-३४ ॥
तदुक्तं पटकल्पे—वह कहा है पटकल्प में—
१३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
गुहागृध्रिकद्रावस्थमणिपीतां महोष्णिकाम् ।
संरोद्धुं कुलिकाशक्तिं तन्मणावेव तेजसा ॥ ३५ ॥
अत्यन्तसूक्ष्मान् सुदृढान् लाक्षावर्णविराजितान् ।
पञ्चावरणयुक्तानास्यत्रयसमन्वितान् ॥ ३६ ॥
गौरीजटाशणमयपटतन्तुविनिर्मितान् ।
विरञ्चिद्रवसंशुद्धान् सप्रकाशान् पटोर्मिकान् ॥ ३७ ॥
समाहृत्याथ विधिवत् प्रादक्षिणिक्रमात् पुनः ।
यथा समाच्छादितं स्याद् द्रवपात्रमणिस्तथा ॥ ३८ ॥
अधोमुखास्यमाच्छाद्य सन्धानं कारयेद् दृढम् ।
एव संधाय विधिवत् तदास्यत्रयमूलतः ॥ ३९ ॥
अत्यन्तसूक्ष्मानादर्शकृतनालानधोमुखान् ।
सन्धारयेत् सूक्ष्मकीलैः पश्चात्तेषु यथाविधि ॥ ४० ॥
मुखपात्राण्यथाशास्त्रं विस्तृतानि नियोजयेत् । इत्यादि ॥
गुहागृध्रिक द्रावस्थित मार्ग से पी हुई महोष्णिका के रोकने को उस मणि में कुलिका शक्ति
को तेज से अत्यन्त सूक्ष्म सुदृढ़ लाक्षा रंग से युक्त पांच आवरणों से संयुक्त तीन मुख वाले गौरीजटा—
सूक्ष्म जटामांसी शणरूपपट तन्तुओं से बने विरञ्चि ? के द्रव से शुद्ध प्रकाशसहित पटोर्मिकों—वस्त्र की
तहों को लेकर विधिवत् प्रादक्षिण्य—घूम लपेट के क्रम से द्रवपात्र मणि आच्छादित हो जावे तथा नीचे
का मुख ढक कर सन्धान—दृढ बन्धन कर दें इस प्रकार विधिवत् जोडबन्धन करके तीन मुखों के मूल से
अत्यन्त सूक्ष्म आदर्श से बने अधोमुख नालों को सूक्ष्म कीलों से जोड़ दे। पश्चात् उनमें यथाविधि
यथाशास्त्र विस्तृत मुखपात्र नियुक्त कर दे ॥ ३५-४० ॥
ततो द्रावकपात्रस्येशान्ये तु यथाविधि ।
संस्थापयेच्चक्रदन्तिं कुलिकाकर्षणोन्मुखम् ॥ ४१ ॥
फिर द्रावक पात्र के ईशानी कोण में यथाविधि कुलिकाकर्षण के उन्मुख चक्रदन्ति स्थापित
करे ॥ ४१ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कहा है क्रियासार में—
कुलिकाशक्तिपानाय चक्रदन्तिं प्रकल्पयेत् ।
सर्पत्वक्सूर्णिर्निर्यासैश्चोतन्तुसुलघुद्रुतैः ॥ ४२ ॥
पटवत्याकभेदेन निर्मितं दर्पणं क्रमात् ।
संशोध्य विधिवच्छुण्ठिद्रावकेण (न ?) यथाविधि ॥४३॥
कृत्वा बिलेशयस्त्वाङ्ग चक्राकारेण वर्त्तुलम् ।
शेते यथा तथा कृत्वा पश्चात् संस्थापयेद् दृढम् ॥ ४४ ॥
कुण्टिणीशक्तिस्तन्त्र ] [ ११३
अथ तत्पूर्वोक्तनालानतिसूक्ष्मान् यथाविधि ।
सन्धारयेद् दन्तिमूले अविनाभावतः क्रमात् ॥ ४५ ॥
एवमुक्त्वा चक्रदन्तिनालसन्धाननिर्णयम् ।
अथेदान्नी क्षीरपटनालस्थापनमुच्यते ॥ ४६ ॥
कुलिका शक्ति के पी लेन के लिये चक्रदन्ति बनावे। सर्प की केंचुली, सूणि ? –खिरनी ? का
गोन्द, ऊन का धागा, बारीक तिनकों से पाकभेद से वस्त्र की भांति बनाए दर्पण को विधिवत्-शुण्डी-
हाथीशुण्डा वृक्ष के द्रावक से शोधकर जैसे सर्प अपने शरीर को चक्राकार-गोल करके सोता है वैसे
बनाकर संस्थापित करे अनन्तर उन पूर्वोक्त अतिसूक्ष्म नालों को दन्तिमूल में मिलाकर लगावे, इस प्रकार
चक्रदन्तिनाल लगाने के निर्णय को कहकर अथ क्षीरपटनाल का स्थापन कहा जाता है ॥ ४२-४६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है-
क्षीरीपटेन रचितं विवृतास्य दृढ मृदु ।
नालमेक चक्रदन्तिमुखादावर्तनक्रमात् ॥ ४७ ॥
परिवेष्ट्य तदास्य तु पीठच्छिद्रे नियोजयेत् ।
तद्द्वारा कुलिकाशक्तिर्बहिर्निर्गच्छति क्रमात् ॥ ४८ ॥
तस्मात् त स्थापयेत् क्षीरीपटनालमितीरितम् । इत्यादि ॥
क्षीरीपट—दूधवाले वृक्ष के दूध गोन्द पट से बनाया विस्तृतमुखवाला दृढ कोमल एक नाल
चक्रदन्तिमुख से घूमने के क्रम से उस मुख को लपेटकर पीठ के छिद्र में लगादे, उसके द्वारा कुलिका
शक्ति बाहिर क्रम से चली जाती है अतः उस क्षीरीपटनाल को स्थापित करे यह कहा है ॥ ४७-४८ ॥
स्थापयित्वा क्षीरनालपटमेव सकीलकम् ।
विद्युत्तन्त्रीसमायोगाद् भ्रामणीचक्रकीलकम् ॥ ४६ ॥
सर्वाङ्गभ्रमण यन्त्रे तत्तत्कीलकमार्गत ।
यथा भवेत् तथाकीले स्थापयेत् पश्चिमान्तरे ॥ ५० ॥
एव संस्थाप्य विधिवद् भ्रामणीचक्रकीलकम् ।
तस्यैशान्य विवृतास्यकीलक स्थापयेद् दृढम् ॥ ५१ ॥
इस प्रकार क्षीरनालपट कीलसहित स्थापित करके बिजुली के तार के सम्बन्ध से भ्रामणीचक्र
को सर्वाङ्ग भ्रमणयन्त्र में उस कीलवाले मार्ग से कीलों के साथ पश्चिम भाग के अन्दर स्थापित करे,
इस प्रकार विधिवत् भ्रामणीचक्रकील उसके ईशानी दिशा में बड़े मुखवाले पेंच को दृढ स्थापित
करे ॥ ४६-५१ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कियासार में कहा है—
कोशद्वयसमायुक्त मुखद्वयविराजितम् ।
प्रदक्षिणाप्रदक्षिणाकीलचक्रसमन्वितम् ॥ ५२ ॥
[ १३४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रादक्षिण्येन पूर्वास्ये कीलचक्रद्वयं तथा ।
विलोमेनोत्तरास्ये च स्थापयेच्चक्रकीलकम् ॥ ५३ ॥
छत्रीशलाकावत् सर्वकीलव्याप्तशलाककम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं विवृतास्याख्यकीलकम् ॥ ५४ ॥ इत्यादि ॥
दो कोणों से युक्त दो मुखों से सम्पन्न प्रदक्षिणा से घूमनेवाले कीलचक्र से युक्त शराएं पूर्व
मुख में दो कीलचक्र तथा बांए से उत्तरमुख में चक्रकील स्थापित करे, छत्री शालाकाओं की भांति सब
कीलों पेंचों में व्याप्त—पूरित शलाकाओंवाला हो इस लक्षण से युक्त विस्तृत मुखवाला नाम का कील
पेंच है ॥ ५२-५४ ॥
पूर्वास्यकीलभ्रमणात् सर्वाङ्गा विवृता क्रमात् ।
तथा मुकुलिताङ्गाः स्युरुत्तरे कीलकभ्रमात् ॥ ५५ ॥
एव क्रमेणोपसंहारकीलकं यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं यथा यन्त्रोपसंहृतिः ॥ ५६ ॥ इत्यादि ॥
कुण्डिणीशक्तियन्त्र ] [ १३५
अष्टन्यङ्कूप्रमाणेन जायतेत्यन्तवेगत ।
विद्युत्सयोजनात् पश्चात् तयोस्सम्मेलनं भवेत् ॥ ६३ ॥
तत्सम्मेलनत काचिच्छक्तिरत्यन्तशीतला ।
जायते कौञ्चिनीनाम कुलिकाकर्षणक्षमा ॥ ६४ ॥
अथ तच्छक्तिमाहृत्य कुलिकाभिमुखं यथा ।
भवेत् तथा नालमुखात् प्रेरयेत् सप्रमाणतः ॥ ६५ ॥
सूर्यकिरण विद्युत् के सम्पर्क से द्रावक में और मणि में क्रम से शीतघन-अत्यन्त शीत हो
जावे उस में द्रवसंंसर्ग से सौलिकानामक स्त्रीशक्ति पांच न्यङ्कू ? प्रमाण से उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार
मणिसंसर्ग से चुलिकानामक पुरुषशक्ति आठ न्यङ्कू ? प्रमाण से अत्यन्त उत्पन्न हो जाती है । विद्युत्स-
योजन से पश्चात् दोनों का मेल हो जावे-हो जाता है उस मेल से कौञ्चिनीनामक अत्यन्त शीतल कुलिका
के आकर्षण में समर्थ कोई शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उस शक्ति को लेकर कुलिका के सामने जैसे हो
जावे ऐसे नाल के मुख से सप्रमाण प्रेरित करे-छोड़े ॥ ६१-६५ ॥
जतुपिण्डे यथा गुञ्जा कुलिकाया तथैव हि ।
कौञ्चिनीशक्तिसंयोगं कारयेद् विधिवत् क्रमात् ॥ ६६ ॥
अथ सा कौञ्चिनीशक्तिस्समाकर्षति वेगतः ।
तथाकर्षणात् पश्चात् कुलिकाद्रावकं क्रमात् ॥ ६७ ॥
पतत्यत्यन्तवेगेन तां मणिः पिबति स्वयम् ।
तत पटोलिकाकीलभ्रमणं कारयेत् क्रमात् ॥ ६८ ॥
पटोर्मिको विस्तृतास्यः प्रभवेत् तेन सत्वरम् ।
न भवेद् वातसंयोगस्सुतरां तन्मणौ यथा ॥ ६९ ॥
आच्छादयेत् तथा सम्यक् तन्मणिं सम्प्रदायत ।
ततः परं चक्रदन्तिकीलकं भ्रामयेच्छनै ॥ ७० ॥
लाख के पिण्ड में जैसे घूंघची-रत्ति वैसे ही कुलिका में कौञ्चिनीशक्ति का संयोग क्रम से
विधिवत् करावे, अनन्तर उस कुलिका को कौञ्चिशक्ति वेग से खींचती है पुनः उस प्रकार के आकर्षण से
कुलिका क्रम से द्रावक में अत्यन्त वेग से गिर जाती है उस कुलिका को स्वयं मणि पी लेती है-अपने
अन्दर लीन कर लेती है फिर पटोलिका नामक या पटोलक-घोंघा सीपी के आकारवाले पेंच के भ्रमण को
करावे तिस से शीघ्र पटोर्मिकनामक या वस्त्र की तह विस्तृत मुख हो जावे उस मणि में वातसंयोग ठीक
न हो सकेगा किन्तु उस मणि का अपनी कलाप्रमाण से चक्रदन्ति कील को धीरे से घुमावे-॥ ६६-७० ॥
तस्माद् विकासमायाति चक्रदन्तिमूलं क्रमात् ।
मणिद्रावकमध्यस्थामत्युष्णा कुलिका तत ॥७१॥
चक्रदन्तिमूलात् पीत्वा स्वगर्भे सन्निधास्यति ।
सम्पूरिता भवेत् पश्चाच्चक्रदन्तिगुहाशये ॥७२॥
१३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततस्सूक्ष्मदर्शनालकीलकं भ्रामयेत् क्रमात् ।
चक्रदन्त्यन्तर्गता सा कुलिका तेन वेगत ॥७३॥
नालत्रयाकर्षणेन बहिर्याति शनैश्शनै. ।
यदा नालत्रयाकर्षणोन्मुखा सा भवेत् तदा ॥७४॥
सम्यक् सम्भ्रामयेद् विवृतास्यकील यथाविधि ।
तेनाङ्गान्य (ण्य?) थ यानस्य विवृतानि हि ॥७५॥
—उससे चक्रदन्ति का मुख क्रम से विकास को प्राप्त होजाता है-खुल जाता है, फिर द्रावक
मणि के मध्य में वर्तमान अत्युष्ण कुलिका को चक्रदन्ति स्वमुख से पीकर अपने अन्दर रख लेगी
पश्चात् चक्रदन्ति के गुहाशय गुप्तस्थान में भर जावेगी फिर सूक्ष्मदर्शनालवाले पेंच को क्रम से घुमावे
उससे चक्रदन्ति के अन्तर्गत वह कुलिका बेग से तीन नालों के आकर्षण से धीरे धीरे बाहिर चली जाती
है । जबकि वह तीनों नालों के आकर्षण के उन्मुख होती होवे तो सम्यक् विस्तृतमुखवाले पेंच को
यथाविधि घुमावे उससे विमान के अङ्ग विस्तृत हो जाते हैं-खुल जाते हैं ॥७१-७५॥
तस्मात् तत्रत्यकुलिका बहिर्यात्यपकर्षणात् ।
पश्चात् तत्कुलिकाशक्तिर्निश्शेष नाशमेधते ॥७६॥
ततोपसहारयन्त्रकीलक † चालयेत् सुधी. ।
तेन सर्वाङ्गोपसंहारस्स्यादेकैकतः क्रमात् ॥७७॥
पश्चाद् यन्त्रस्वरूपं लभते पूर्ववत्स्वयम् ।
एवमुक्तवा समासेन कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥७८॥
अथेदानों पुष्पिण्यकयन्त्रमत्र निरूप्यते ।
उससे वहां की कुलिका खींचे जाने से बाहिर चली जाती है, पश्चात् वह कुलिकाशक्ति निःशेष
नाश को प्राप्त हो जाती है फिर उपसंहारयन्त्र की कील को बुद्धिमान् चलावे उससे सब अङ्गों का उपसंहार
एक एक करके हो जावेगा पश्चात् पूर्ववत् यन्त्र अपने रूप को प्राप्त करता है इस प्रकार कुण्टिणी यन्त्र को
संक्षेप से कहकर अब पुष्पिणीक यन्त्र यहां कहा जाता है ॥७६-७८॥
अथ पुष्पिणीयन्त्रनिर्णयः—अब पुष्पिणीयन्त्र का निर्णय देते हैं—
वसन्तग्रीष्मतुं कालप्रयाणे यानयन्तॄणाम् ।
सुखशैत्योपचारार्थं पुष्पिणीयन्त्रमुच्यते ॥७६॥
वसन्त ग्रीष्म ऋतुकाल के प्रवर्तमान होने पर या आक्रमण पर विमानचालक सवारियों के
सुख शीतता के उपचारार्थ पुष्पिणीयन्त्र कहा जाता है ॥७६॥
उक्तं हि खेटविलासे—कहा ही है खेटविलास ग्रन्थ में—
ग्रीष्मे पञ्चशिखा शक्तिर्वसन्ते सौरिकाभिधा ।
वायव्याग्नेयकेन्द्राभ्यामीषादण्डस्य वेगतः ॥८०॥
तत उपसंहार=ततोपसहार इत्यत्र सन्धिरार्षः ।
पुष्पणीयन्त्र ] [ १३७
जायते सूर्यकिरणसंसर्गादूर्ध्वरूपतः ।
तयोः पञ्चशिखा शक्तिर्विषद्वयविराजिता ॥८१॥
अग्नियोमात्मिका सौरिसमशीतोष्णरूपिणी ।
अन्तश्शीतलतामेत्य बाह्येत्यन्तोष्णरूपताम् ॥८२॥
निदाघं कुरुते सर्वसृष्टिवर्गेषु वेगतः ।
स्वेदोद्रेकं मनुष्येषु निर्यास वृक्षवर्गके ॥८३॥
करोति तेन सर्वेषा सर्वामयविनाशनम् ।
एव स्वशीतलीशक्त्या सर्वत्र व्याप्य पूर्ववत् ॥८४॥
आकृष्य सूर्यकिरणस्थितवासन्तिकान्ततः ।
बसन्तेनर्तु नेत्यादिश्रुतिवाक्यानुसारतः । ॥८५॥
ग्रीष्म में पञ्चशिखा शक्ति वसन्त में सौरिका नामवाली शक्ति वायव्य आग्नेयकेन्द्रों से ईषा-
दण्ड (पृथिवी सूर्य रेखा) की शक्ति वेग से सूर्यकिरणसंसर्ग से उत्पन्न हो जाती है, उन दोनों में पञ्च-
शिखा शक्ति दो विषों से युक्त होती है और सौरिका शक्ति अग्निसोमात्मिका-अग्नि सोम धर्मवाली
समानशीतोष्णरूपा होती है 'जोकि' अन्दर' शीतलता को और बाहिर अत्यन्त उष्णता को प्राप्त होती है,
सब सृष्टि वर्गों-जड जङ्गमों में वेग से निदाघ-घाम-दाह करती है, मनुष्यों में स्वेद-पसीने को बाहिर और
वृक्षवर्ग में चेप गोन्द को करती है इससे सब के रोगों का नाश हो जाता है इस प्रकार अपनी शीतली
शक्ति से पूर्ववत् सर्वत्र व्यापकर सूर्यकिरणस्थित वसन्त लाने वाली शक्ति को आकर्षित करके
“बसन्तेनर्तु ना” (यजु० २१। २३) वसन्त ऋतु से इत्यादि श्रुतिवाक्य के अनुसार ॥८०-८५॥
कृत्वाभिषेकं पश्चात् तद्वृदि† (हृधि?) कोषाष्टकेपि च ।
प्रभापल्लवपुष्पादीन् करोत्यगलतादिषु ॥८६॥
तथैव प्राणिना देहसप्तधात्वादिषु क्रमात् ।
बलदाढ्यं प्रकाशादीन् संप्रयच्छति पुष्कलम् ॥८७॥
तथा पञ्चशिखा शक्ति (क्ते?) विषरूपा हि गृध्निका ।
स्थावर जङ्गमं व्याप्य तद्धातून् सप्त शोष (घ') येत् ॥८८॥
तथैव मारिका नाम शक्तिरन्या स्वभावतः ।
स्थावरे काण्डवल्काश्च हृत्कोशान् पञ्च जङ्गमे ॥८६॥
सङ्कोचं कुरुते सम्यक् तेन पुष्टिविनाशनम् ।
अतः पञ्चशिखावेग सशुष्णा (सौयुष्णा?) च विशेषत ॥६०॥
नाशयित्वा विमानस्थयन्तॄणामूष्मभाजिनाम् ।
सुखशैत्याह्लादहर्षप्रदानार्थं यथाविधि ॥६१॥
विमानस्याङ्गयन्त्रेषु पुष्पणीयन्त्रमुच्यते ।
† हृत्कोशान् ॥८६॥ (देखो)
सिञ्चन-जलसिञ्चन करके पश्चात् 'प्राणियों के' हृदय में कोशाष्टक-अष्टमकोश ?-
मस्तिष्क ? में भी प्रभा-तेज आभा तथा अगों-वृक्षों लता फैलने वाले पौधों आदि में भी पल्लव-
नवकोंपल फूल फल आदि उत्पन्न करती है, उसी प्रकार प्राणियों के देह की सात धातुओं में क्रम से
बल दृढ़ता चमक कान्ति आदि अधिक प्रदान करती है। और पञ्चशिखा शक्ति विषरूपा गुल्फिका-
गर्भारूपा क्रूरणा खाजाने वाली शोषण करने वाली शक्ति स्थावर जङ्गम को व्याप कर
उनकी सात धातुओं को सुखा देती है इसी प्रकार यह दूसरी मारिका-मारनेवाली शक्ति स्वभावतः स्थावर
में काण्ड-शाखा, वल्क-छाल को और जङ्गम में हृदय पांच कोशों-अन्नमय प्राणमय मनोमय आदि
को संकुचित करती है निश्चय उससे पुष्टि का नाश होता है अतः पञ्चशिखा शक्ति के वेग बलसहित
नष्ट करके विमान में स्थित ऊष्मभागी-गर्मी को सहते हुए गर्मी से आक्रान्त चालक यात्रियों के सुख
शीतता शान्ति हर्ष देने के लिये यथाविधि विमान के अङ्गयन्त्रों में पुष्पणीयन्त्र कहा जाता है ॥८६-६१॥
:
Line 6 has: इत्युक्त्वा सुन्दमृत्काचमथाङ्गरचनाविधि ।॥ ९९ ॥ (or विधि ॥ ९९ ॥).
Let's look REALLY closely at line 6:
इत्युक्त्वा सुन्दमृत्काचमथाङ्गरचनाविधि ॥ ९९ ॥
Wait, is that a single danda before double danda?
There's धि, then space, then ॥ ९९ ॥. There is a faint vertical mark or space. Let's transcribe faithfully: विधि ॥ ९९ ॥ or विधि ।॥ ९९ ॥. It looks like विधि ॥ ६६ ॥? Wait, earlier I thought 66, but we proved it's ९९.
Wait, is there an extra danda? It looks like विधि ।॥ ९९ ॥ or just विधि ॥ ९९ ॥ with a thick first danda. Let's look at line 8: दृढम् ॥ १०० ॥. The double danda has two bars. In line 6, there are two bars ॥ and maybe a stray speck. It's ॥ ९९ ॥.
-
Line 7:
निरूप्यते विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् । -
Line 8:
द्वात्रिंशत्पाकशुद्धसुन्दमृत्काचतो दृढम् ॥ १०० ॥
१४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
ताराग्निबाणोडुदशद्विमृद्वसुसागराः ।
द्वाविंशत्यङ्गविभागास्तेषां शास्त्रनिरूपिताः ॥ १०९ ॥
एतानाहृत्य संशुद्धान् तत्तद्भागानुसारतः ।
पूरयित्वापद्ममुखमूषायां पद्मकुण्डके ॥ ११० ॥
तन्मूषां विन्यसेत् पश्चाद् दृढमिङ्गालपूरिते ।
त्रयोविंशदुत्तरत्रिशतकक्ष्योष्णमानतः ॥ १११ ॥
गालयित्वा पञ्चमुखभस्त्रेणात्यन्तवेगतः ।
तद्रसं योजयेद् यन्त्रस्योर्ध्वनालमुखे शनैः ॥ ११२ ॥
भवेदेवंककृते शीतरञ्जिकादर्शमुत्तमम् ॥ इत्यादि ॥
शश का पिथ्य ?-पित्त और उडु ? का पिथ्य?,-पित्त, पांशुक्षार-नवसादर, कुड्मल-नीलोत्पल-
नीलोफर, ज्योत्नासार-रेणुका गन्ध द्रव्य का तैल इतर, शीतरस कन्द-रसोंत के कन्द की पिट्ठी,
कुडुपक्षार ?, अभ्रक का क्षार, शौण्डीरका जङ्घा शल्य-गजपिप्पली के मूल का चूर्ण, वातोयर-खुले मैदान
का शोरा, श्वेत निर्यास-आक का दूध ?, मृत्सार-मृत्सा-सौराष्ट्र मृत्तिका, उरघ ? । ये बारह पदार्थ ५,
३, ५, १, १०, १०, ११, ८, ७, २२, ६, भागों को उनके शास्त्र से उन उन भागों के अनुसार शुद्ध लेकर
पद्ममुखमूषा में भर कर अङ्गार से भरे पद्मकुण्ड में उस मूषा-बोतल को रख दे, पश्चात् ३३२ दर्जे की
उष्णता प्रमाण से पांच मुख वाली भस्त्रा से गला कर, उस पिघले रस को धीरे से यन्त्र के ऊपरवाले
नालमुख में युक्त करे ऐसा करने पर शीतरञ्जिकादर्श हो ॥ १०६-११२ ॥
शीतप्रसूतिकमणिमुक्तं मणिप्रकरणे-शीतप्रसूति मणि कही है मणिप्रकरण में-
वराटिकामञ्जुलचूर्णपञ्चक मोदुम्बरक्षारचतुष्टय तथा ।
रुक्मत्रय वचुलकाष्टकं च शीतरञ्जिकादर्शसप्तकं तथा ॥ ११३ ॥
बदुत्रय शाल्मलिकाष्टविंशति क्षारत्रय पारदभागसप्तकम् ।
श्वेताभ्रसत्त्वाष्टककर्कटाङ्घ्रिक्षाराष्टक चौलिकसत्त्वपञ्चकम् ॥११४॥
निर्यासमुष्ट्युदशांशकं तथा सम्पातिजङ्घास्थि च पञ्चविंशति ।
चतुर्दशैतान् परिगृह्य शोधितान् सम्पूर्य मृत्कुण्डलमूषिकामुखे ॥११५॥
सस्थाप्य पश्चात् कुलकुण्डिकान्तरे वेगाद् धमेत् त्र्यम्बकभस्त्रिकामुखात् ।
सगाल्य पश्चात् त्रिशतोष्णकक्ष्यतो मणिप्रसूतस्य मुखे प्रपूरयेत् ॥११६॥
एवंकृते शीतप्रसूतिकामणिर्भवेत् सुदृढस्सुदृढस्सुशीतल ॥११७॥ इत्यादि ॥
कौडी, मजीठ का चूर्ण ५ भाग, गूलरक्षार ४ भाग, रुक्म ? ३ भाग, वचुलक ?-वञ्जुल-तिनिश
वृत्त ? ८ भाग,-शीतरञ्जिकादर्श ७ भाग, बदु-शोनापाठा वृक्ष ३ भाग, सिम्बल २८ भाग, कर्कटाङ्घ्रि-
काकडासिङ्गी के मूल का क्षार या केकड़ा जन्तु की टांगों का क्षार ? ८ भाग, चौलिक सत्त्व-मोरपुष्पी ?
या दारुचीनी का सत्त्व ५ भाग, निर्यासमुष्ट-कत्था ? १५ भाग, सम्पाति-गिद्ध पक्षी की जांघ की हड्डी
२५ भाग इन १४ वस्तुओं को लेकर शोध कर मिट्टी के कुण्डलाकार मूषिका-बोतल के मुख में भर कर
पुष्पलोचन ] [ १४१
कुल्लकुण्डिका के अन्दर रख कर वेग से त्र्यम्बक भक्षिका मुख से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर
मणिप्रसूतास्य के मुख में भर दे, ऐसा करने पर शुद्ध सुदृढ सुशीतल शीतप्रसूतिका मणि हो जावे—हो
जाती है ॥ ११३-११७ ॥
विद्युत्तन्त्र्या समायुक्तं द्रावकत्रयशोधितम् ।
शतारविद्युत्पङ्क तत्पुरस्तात् स्थापयेद् दृढम् ॥ ११८ ॥
विद्युत् के तारयुक्त तीन द्रावक से शोधा हुआ या बहुत अराओं से युक्त पङ्क--पंखडीचक्र
को तो उसके सामने दृढरूप में स्थापित करे ॥ ११८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में —
द्वादशार्कं चाञ्जनैकत्रय द्विवृद्धाष्टक तथा ।
सम्मेल्य गालयेत सम्यक् शतकक्ष्योष्णमानत ॥ ११९ ॥
तद्भवेत्सर्जवच्छुद्धमारारं पीतवर्णकम् ।
अत्यन्तलघुसूक्ष्म च मृदुलं सुदृढ शुचि ॥ १२० ॥
पञ्चलोहमिति प्राहु रेत तच्छास्त्रवित्तमा. ।
तस्मात् प्रकल्पयेत् पत्रशतं कमलपत्रवत् ॥ १२१ ॥
तथा नाभित्रय कीलत्रय तन्त्रीत्रय क्रमात् ।
घण्टारकीलञ्चैव कारयेच्छास्त्रमानत ॥ १२२ ॥
सकीलकशलाकाभिस्संयुत सुमनोहरम् ।
नाभिचक्रत्रयं तस्मिन्नादौ सञ्चारयेद् दृढम् ॥ १२३ ॥
शण(न ?) पत्रभ्रमो वेगादनुलोमाद् यथा भवेत् ।
षट्षुपाश्र्वेषु चक्रस्य विधिवद् योजयेत् क्रमात् ॥ १२४ ॥
तथैव तत्पुरोभागचक्रपाश्र्वेष्वपि क्रमात् ।
सञ्चारयेत् पत्रशतं विलोमभ्रमण यथा ॥ १२५ ॥
ताम्बा १२ भाग, सुरमा ३ भाग, द्विवृद्ध--लोह विशेष या जस्ता ८ भाग, इन्हें मिला कर १०० दर्जे
की उष्णता से गलावे, वह शुद्ध सर्जीक्षार जैसा आरे आरों वाला पीतरंग का अत्यन्त हल्का सूक्ष्म मृदुल
सुदृढ पवित्र हो जावे उसे उत्तम शास्त्रवेत्ता पञ्चलोह कहते हैं । अतः उससे १०० पत्र-कमलपत्र की भांति
बनावे तथा ३ नाभियां ३ कीलें ३ तार क्रम से घण्टा देने वाली कील भी शास्त्र रीति से करावे कीलसहित
शलाकाओं से युक्त भी हो । उसमें प्रथम ३ नाभिचक्र लगावे, इसी प्रकार पुरोभाग—सामनेवाले चक्रपाश्र्वों
में भी क्रम से १०० पत्र लगावे जिससे विलोम—उल्टा भ्रमण हो सके ॥ ११८-१२५ ॥
तत्पश्चाद्भागचक्रस्य नाभीमूले यथाविधि ।
विद्युत्तन्त्री समाहृत्य पाश्र्वयोरुभयोरपि ॥ १२६ ॥
शतारविद्युत्पङ्कस्य भ्रमणार्थं नियोजयेत् ।
पश्चात् सम्पूरयेत् पात्रे शीतप्रसुवकद्रावम् ॥ १२७ ॥
१४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र'
विद्युत्तन्त्या समावेष्ट्य शीतप्रसुवकं मणिम् ।
द्रवपात्रान्तरे पश्चात् स्थापयेन्मध्यकेन्द्रके ॥ १२८ ॥
क्षीरीपटान्तर्गतौदुम्बरतन्त्रीन् यथाविधि ।
द्रवपात्रस्थतन्त्र्यग्रे पश्चात् सन्धारयेत् समम् ॥ १२६ ॥
तत्प्रदेशात् समानीय तन्त्रीद्वयमतः परम् ।
यन्त्रमध्यस्य शीतरञ्जिकादर्शकीलके ॥ १३० ॥
उसके पिछले भागवाले चक्र के नाभिमूल में यथाविधि दो विद्युत्तारों को लेकर दोनों पाश्र्वों
में भी सौ अरोंवाले विद्युच्चक्र के भ्रमणार्थ लगावे, पश्चात् पात्र में शीतप्रसुवक को भर दे, शीतप्रसुवक
मणि को विद्युत् के तार से लपेट कर द्रवपात्र के अन्दर मध्य केन्द्र में स्थापित करे । क्षीरी—दूधवाले
वृक्ष के दूध से बने वस्त्र के अन्तर्गत औदुम्बर-ताम्बे की तारों को यथाविधि द्रवपात्रस्थ तारों के अग्रभाग
में समान रूप से लगादे । उस प्रदेश से दो तारों को लाकर यन्त्रमध्यस्थ शीतरञ्जिकादर्शकील
में—॥ १२६-१३० ॥
अनुलोमप्रकारेण सकीलं योजयेत् ततः ।
मणिद्रावकसम्बद्ध (न्ध?) विद्युत्तन्त्रीमुखाच्छनैः ॥ १३१॥
शक्तिं सञ्चोदयेत् सम्यङ् मणिद्रावकयोः क्रमात् ।
पश्चाच्छक्तिद्वये वेगाद् विद्युत्संयोगत पुनः ॥ १३२ ॥
तन्निष्ठसुखशैत्यस्वभावशक्तिं यथाक्रमम् ।
तच्छीतरञ्जिकादर्शकीलमाक्रम्य वर्तते ॥ १३३ ॥
तत्कीलभ्रमणाद् व्योमयानमावृत्य वेगतः ।
तच्छक्ती यन्तॄणां ग्रीष्मविषशक्तिं निमेषतः ॥ १३४ ॥
विहत्य सुखसन्तोषमधोवृद्ध्यादिकान् क्रमात् ।
प्रयच्छतो विशेपेण मकरन्दामृतं यथा ॥ १३५ ॥
—अनुलोम प्रकार से कीलसहित युक्त करदे, द्रावक मणि से सम्बन्ध रखने वाले विद्युत्तारों के
मुख से धीरे से शक्ति को दोनों मणिद्रावकों में भली भांति प्रेरित करें पश्चात् दोनों शक्तियों में वेग से
विद्यु त् के संयोग से उन में रखी उन में अवलम्बित सुख शैत्य स्वभाववाली शक्ति को यथाक्रम वह शीत-
रञ्जिक आदर्शीकील को अवलम्बित करके रहती है, उस कील के घूमनेसे वे दोनों शक्तियां वेग से व्योम-
यान को प्राप्त होकर चालक और यात्रियों की गरमीरूप विषशक्ति को निमेष भर में नष्ट करके सुख सन्तोष
बुद्धिवृद्धि आदिकों को क्रम से विशेषरूप से मधु के समान देती है ॥ १३१—१३५ ॥
ततश्शतारपङ्कभ्रमणं तन्त्रया प्रकाशयेत् ।
तेन वायुविशेषेण प्रादुभूयं यथासुखम् ॥ १३६ ॥
व्योमयानस्थयन्तॄणां सर्वेषामुपरि स्वतः ।
मन्द मन्दं प्रसरति मन्दमारुतवत् क्रमात् ॥ १३७ ॥
पिञ्जुलादर्श ] [ १४३
तेन सौर्योष्णसन्तापो निःशेष नाशमेधते ।
मणिद्रावकपङ्केभ्यो व्योमयानस्थयन्तॄणाम् ।। १३८ ।।
सुखशैत्याह्लादहर्षा एवं सम्भवन्ति (ति?) स्वतः ।
देहस्थसप्तधातूना भवेत् तस्माच्छुचिर्बलम् ।। १३६ ।।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यानदक्षिणकेन्द्रके ।
स्थापयेत् पुष्पिणीयन्त्र शास्त्रोक्तविधिना दृढम् ।। १४०।।
तदधस्स्थापयेत् पश्चात् तत्र घण्टारकीलकम् ।
सौरिपञ्चशिखोत्पन्नशक्तयो विषरूपका ।। १४१ ।।
घण्टारकीलकमुखाद् भवेयुर्बाह्यखे लयम् ।। १४२ ।। इत्यादि ।।
फिर सौ अरे वाले चक्र के भ्रमण को तार से प्रकाशित करे, उससे वायु विशेषरूप से सुग-
मता से प्रकट होकर विमान में स्थित सब चालक यात्रियों के ऊपर मन्द वायु के समान क्रम से स्वत
मन्द मन्द पड़तो है । उस से सूर्य का उष्णताप सर्वथा नाश को प्राप्त हो जाता है । मणिद्रावक