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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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अङ्गोपसंहारयन्त्र ] [ १०६
विमान यान के उपरिभाग में स्थित शिर केन्द्र में यथाविधि उक्त मणियों में से एक एक मणि
सुदृढ़ स्थापित करे । विद्युद्यन्त्र के मुख से सब तारों को शाखानुसार लेकर उनके मुख में जोड़दे और इन
तारों से शक्त्यपकर्षण—शक्ति को खींचने वाले यन्त्र को उसके उपरि मुख के पास किरणों के आक-
र्षण करने वालों को पूर्व की भांति पश्चात् क्रम से दोनों के मेलनार्थ जोड़ दे । इस प्रकार विमान के
शिर की मणियों को कह कर इससे आगे किरणसन्धानकीलों—किरणों के धारण करने वाले पेंचों को
शास्त्र से स्फुट कहूँगा, शक्तिसन्धान कीलें २५ ख्यात हैं प्रसिद्ध हैं कही गई हैं, उनमें से सूर्यकिरणों के
यानसन्धान में कीलक्रम से संक्षेप से यथामति आलोचना करके कही जाती हैं ॥ ८२-८६ ॥
तदुक्तं बृहत्काण्डिके—यह बात बृहत्काण्डिक ग्रन्थ में कही है—
सन्धानकीलका पञ्चविंशति परिकीर्तिता ॥ ८७ ॥
सूर्याशुयानसन्धाने नवमस्तेषु वर्णित ।
तत्कीलविवक्षार्थं तेषा नामान्यनुक्रमात् ॥ ८८ ॥
बृहत्काण्डिकरीत्या तु सुविचार्य निरूप्यते ।
पिञ्जुलीक कि (की ?) रणको डिम्भकोपवितीयक ॥८६॥
कच्छपो गारुडो दृण्डो शक्तिपो गोविदारक. ।
पवनास्य पञ्चवक्त्रो वञ्चक कङ्कणस्तथा ॥ ६० ॥
अहिर्मु ध्न्य (ध्य ?)कुण्डलिको नाकुलश्वोर्णनाभिक ।
त्रिमुखस्सप्तशीर्षण्यो पञ्चावर्त परावत ॥ ६१ ॥
आवर्तनाभिकोर्ध्वास्यशिलावर्त इति क्रमात् ।
विमानशक्तिसन्धानकीलका पञ्चविंशति ॥ ६२ ॥
एतेषु गोविदारकस्तु कीलकस्सुप्रकाशक ।
सूर्याशुयानसन्धानकार्यनिर्वाहको भवेत् ॥ ६३ ॥ इति ॥
सूर्यकिरणों के यान में जोड़ने में सन्धानकीलें २५ कही हैं, उनमें से नवम कील कही है, उस
कील की विवक्षा के लिए उनके नाम अनुक्रम से बृहत्काण्डिक की रीति से यहां सुविचार कर निरूपित
किया जाता है जो कि पिञ्जुलीक, किरणक, डिम्भ, कोप, वितीयक, कच्छप, गारुड, उद्दण्ड, शक्तिप,
गोविदारक, पवनास्य, पञ्चवक्त्र, वञ्चक, कङ्कण, अहिर्मुधन्य, कुण्डलिक, नाकुल, ऊर्णनाभि, त्रिमुख, सप्त-
शीर्षण्य, पञ्चावर्त, परावत, आवर्त, नाभिक, उर्ध्वास्य, शिलावर्त ये क्रम से विमान शक्तिसन्धानकीलें २५
हैं । इनमें गोविन्दारक कीलक अच्छी प्रकाशक है सूर्यकिरण या यानसन्धान कार्य का निर्वाहक
है ॥ ८७-६३ ॥
अङ्गोपसंहारयन्त्रविचार.—अङ्गोपसंहार यन्त्र का विचार—
एवमुक्त्वा परिवेषक्रियायन्त्रमत परम् ।
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्संग्रहेण प्रचक्षते ॥ ६४ ॥
सूर्यादिसर्वग्रहाणा शशिस्यानतस्तथा ।
चारातिचारवक्रातिवकसञ्चारकारणात् ॥ ६५ ॥