बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भल्यत्वगष्टादश कुड्मलस्य क्षारत्रय वैणविक्राष्टसत्त्वम् ।
खुरत्रय शून्यमृदष्टविंशत् त्रिविक्रमक्षारचतुष्टयम् ।।११०।।
शङ्खद्वय पारदपञ्चकं च क्षाराष्टक वीरुधसारमेकम् ।
रोप्यत्रय वाञ्जनिकत्रय चाष्टादशैते विधिवद् यथाक्रमम् ।।१११।।
सशोध्य शास्त्राद् वरपरांमूषामुखेऽथ सम्पूर्य वि (व?) राट्कुण्डे ।
निक्षिप्य वेगाद् द्विशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो गालयित्वाथ शीघ्रम् ।।११२।।
शनैश्शनैरुष्णरस रू (स?) वाङ्गात् सम्पूरयेद् यन्त्रमुखोर्ध्वनाले ।
एव कृते त्वभ्रमृद्दर्पण स्याद् दृढ सुसूक्ष्म सुमनोहर च ।।११३।। इत्यादि ।।
रम्भासत्त्व - केले का सत्त्व (क्षार या कपूर ५ भाग, मञ्जूषक्षार - मञ्जीठ का क्षार ८ भाग,
कान्त - सूर्यकान्त ५ भाग; क्रव्यादसत्त्व ? - क्रव्यादा - जटामांसी का सत्त्व या क्रव्यादरस - तांबे लोहे
गन्धक पारे आदि से बना योग ? ८ भाग, आढक - अरहर का सत्त्व ३ भाग, कूर्मसार ? - कछुवे की
खोपड़ी की भस्म या कूर्मपृष्ठ - वाश पुष्प का सार ? ७ भाग, भल्यत्वक् - भल्ल - भिलावे की छाल
१० भाग, कुड्मल - पुष्पकोरक शीतल चीनी का क्षार ३ भाग, वैणविक - वेणु - बांस का सत्त्व वंशलोचन
या वंशाङ्गार ८ भाग, खुर - नखी गन्धद्रव्य ३ भाग, शून्यमृत् - अभ्रक मिट्टी या अभ्रकभस्म ?
२८ भाग, त्रिविक्रम क्षार ? - त्रिविक्रमरस ? - ताम्बा भस्म पारा गन्धक कृत्रिम योग ? ४ भाग, शङ्ख
२ भाग, पारा ५ भाग, क्षार - सज्जीक्षार ८ भाग, वीरुधसार ? १ भाग, रौप्य - चान्दी ३ भाग, आञ्जनिक-
सुरमा ३ भाग, ये अठारह वस्तुएं विधिवत् यथाक्रम शोधकर शास्त्ररीति से वरपरांमूषा बोतल के मुख
में भर कर विराट् कुण्ड में रख कर वेग से २०० दर्जे उष्णता प्रमाण से शीघ्र गलाकर धीरे धीरे उष्णरस
को स्र वा अङ्ग से यन्त्रमुख की ऊपरवाली नाल में भर दे, ऐसा करने पर अभ्रमृत् - दर्पण सूक्ष्म मनोहर
हो जावे ।। १०६-११३ ।।
बाहुदण्डप्रमाणेन तद्दर्पणविनिर्मितौ ।
नालदण्डौ तथैवास्य वामदक्षिणपार्श्वयो ।।११४।।
संस्थापयेद् दृढ पश्चाद् विद्युत्तन्त्रीन् यथाक्रमम् ।
पूर्वकेन्द्रादितस्सर्वत्रानून् † स्यूत यथा भवेत् ।।११५।।
स्थापयेत् कीलनालाना मध्यकुक्षौ यथाविधि ।
अभ्रमृद्दर्पणकृतपथपत्राय्यतः परम् ।।११६।।
पञ्चाशदुत्तरशतमुदीचीकेन्द्रतन्त्रिषु ।
योजयित्वाथ विधिवत् स्थापयेद् विरल यथा ।।११७।।
लल्लोक्तेनैव विधिना तत्पत्राणि प्रकल्पयेत् ।
वायुदण्ड प्रमाण से उस दर्पण से दो नाल दण्ड इसके वाम दक्षिण पार्श्वों में दृढ संस्थापित
करे पश्चात् विद्युत्तार - बिजली के तारों को यथाक्रम पूर्व केन्द्र के आदि से सर्वत्र पहुंचे हुए हो जावें ऐसे
† सर्वत्रानस्रुत हस्तलेखे (सर्वत्र-धनसि-ऊत) यदि तदा ह्रस्वेन भवितव्यमुकारेण ।