बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या ८—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह अङ्गोपसंहार यन्त्र 'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थ में कहा है—
सुमुलीक शोधयित्वा लोह माक्षीरमिश्रितम् ।
वितस्तिद्वादशायाम घनमष्टादशाङ्गुलम् ॥ १ ॥
चतुरस्रं वर्तुंल वा पीठ कुर्याद् यथाविधि ।
कान्तडिम्बिकसम्मिश्रलोहाद् द्रावकशोधितात् ॥ २ ॥
त्रिंशद्वितस्त्युन्नत च वितस्तित्रयगात्रकम् ।
मूले मध्ये तथा चान्ते छत्रीवत्कीलकान्वितम् ॥ ३ ॥
दण्डमेक कल्पयित्वा पीठमध्ये दृढ न्यसेत् ।
कीलकत्रयमारभ्य दण्डस्याधो यथाविधि ॥ ४ ॥
विमानमूलमध्यान्तस्स्थाङ्गयन्त्रावधि क्रमात् ।
पञ्चकीलसमायुक्तान् सुदृढान् मृदुलानृजून् ॥ ५ ॥
माक्षीर ? मिले सुमुलीक लोहे को शोधकर १२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ अङ्गुल मोटा चौकोन
या गोल पीठ यथाविधि करे—बनवावे, कान्त—अयस्कान्त, डिम्बिक ? मिश्रलोह द्रावक शोधित से
३० बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त मोटा मूल में मध्य में और अन्त में छत्री की भांति कीलों से युक्त एक
दण्ड बनाकर पीठ के मध्य में लगा दे तीन कीलों से आरम्भ करके दण्ड के नीचे यथाविधि विमान के
मूल मध्य अन्त में स्थित अङ्गयन्त्रों तक क्रम से पांच कीलों से युक्त सुदृढ़ मृदुल सरल—॥ १–५ ॥
उपसंहारोद्धारकावर्तकीलैर्विराजितम् ।
मिश्रलोहकृतान् शुद्धान् शलाकान् विरल यथा ॥ ६ ॥
छत्रीशलाकावत्तत्तत्कीलकेभ्य पृथक् पृथक् ।
तत्तद्देशानुसारेण योजयेत्तदनन्तरम् ॥ ७ ॥
त्रिचक्रकीलकसयुक्त मुखत्रयविराजितम् ।
नालद्वयसमायुक्तं भ्रामणीकीलकद्वयम् ॥ ८ ॥
संस्थापयेद् दण्डमूलकीलकद्वयमध्यमे ।
तदुत्तरे रुक्मतैल नलिकापात्रपूरितम् ॥ ६ ॥