बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११३
लिङ्गुत्रिशतवेगेनोड्डीयोड्डीयातिवेगत
धावत्यूर्ध्वं खमाश्रित्य व्योमयानं यथाविधि ॥२०॥
इस प्रकार यन्त्रोपसंहार यन्त्र कहकर इससे आगे विस्तृतास्य क्रियायन्त्र यथाविधि यहां
कहा जाता है। कूर्म (भूगर्भशक्ति ?†), दिग्गज (पृथिवी की बाह्य दिशाशक्ति ?), भूमि, मेघ, विद्युत्,
वरुण की शक्तियां जब पद्ममुख मे भली प्रकार परस्पर मिल जाती हैं तब विषम्भरी-विरुद्ध प्रयोगको धारण
करने वाली कोई शक्ति‡ प्रकट हो जाती है वह भूमि के मुख को तोड़कर—भूमि से टकराकर अत्यन्त
उष्णस्वभाव से ३०० डिग्री के वेग से उड़ उड़ कर अतिवेग से ऊपर दौड़ती है आकाश को प्राप्त हो
विमान के मार्ग की अवधि तक—॥१७—२०॥
व्याप्य यानपथ पश्चाद् विमानं स्वशक्तित ।
तत्रस्थसर्वलोकानां मेधशक्तिं निमेषत ॥२१॥
विभज्य तत्क्षणात् तस्मिन्नुद्गारं कुरुते क्रमात् ।
बुद्धिमान्द्यशिरोबाधज्वरदाहविरे (रो?) चना. ॥२२॥
सम्भवन्ति विशेषेण तत्क्षणात् तद्विकारत ।
तद्विलयाय विधिवद् यन्त्राद्यैश्शास्त्रयत क्रमात् ॥२३॥
उद्धरेत् तद्विनाशार्थं व्योमयाने यथाविधि ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रमिति शास्त्रविनिर्णय ॥२४॥
तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना विस्तृतास्यक्रियाभिध (द?) म् ।
यन्त्रमत्रातिसंक्षेपात् प्रसङ्गत्या निरूप्यते ॥२५॥
—यानपथ मे व्याप्त होकर पश्चात् विमान को भी व्याप्त हो अपनी शक्ति से विमानस्थित जनों
की मेधशक्ति को भिन्न भिन्न करके तुरन्त उद्गार कर देती है बुद्धिमन्दता शिरपीड़ा ज्वरदाह विरेचन रोग
विशेषत उत्पन्न हो जाते हैं उनके विकार से—पूर्वरूप से तुरन्त विधिवत् यन्त्र आदि से शास्त्रानुसार
जानकर क्रम से उसके नाशार्थ विमान में यथाविधि उद्धार करे—उपाय करे । वह विस्तृतास्य क्रिया यन्त्र
है, यह शास्त्र का निर्णय है, अत शास्त्रोक्त विधि से विस्तृतास्यक्रियानामक यन्त्र को अतिसंक्षेप से
प्रसङ्ग से निरूपित किया जाता है ॥ २१-२५ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है—
बाहुप्रमाण विस्तारे गात्रे द्वाविंशदङ्गुलम् ।
वर्तुलाकारत पीठं कुर्यात् पिप्पलदारुणा ॥२६॥
बाहुप्रमाणगात्रं च द्वात्रिंशद्बाहुरुन्नतम् ।
स्तम्भ कृत्वा दारुमय तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ॥२७॥
व्योमयानाङ्गोपयन्त्रसङ्ख्या विधिवत् क्रमात् ।
अङ्गोपयन्त्रदिग्रेखामनुसृत्य यथाविधि ॥२८॥
† "कूर्मो बिभर्ति धरणीं खलु चारुपृष्ठे" (शुक० ४।१।३१)
‡ "विष विप्रयोगे"