बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिवेशक्रियानालायन्त्र ] [ १२३
कीलों के मध्य कुक्षि में अभ्रमृत दर्पण से बनाए हुए पद्मपत्रों को स्थापित करे, इससे आगे १५० उत्तर
दिशा की केन्द्रतारों में विधिवत् युक्त करके श्रीदेवरूप में स्थापित करे, आचार्य लल्ल की कही विधि से
उन पत्रों को बनावे ॥११४—११७॥
तदुक्तं पट्टिकानिबन्धने—वह पट्टिकानिबन्धन में कहा है—
अभ्रमृद्दर्पणं पञ्चदशभाग तथैव च ।
चत्वारि सौरिकाक्षारं मेलयित्वा परस्परम् ॥११८॥
गालयित्वा यथापक्व पट्टिकायन्त्रके न्यसेत् ।
लशुनत्वगिवाश्यन्त (य ?) सूक्ष्माण्यावर्तरूपत ११६।।
पश्चाद् भवन्ति पत्राणि पद्मपत्रमिव क्रमात् । इत्यादि ॥
अभ्रमृद्दर्पण १५ भाग, सौरिकाक्षार-गजपिप्पली या मजीठ या हुलहुल का क्षार ४ भाग मिलाकर
पक जाने पर पट्टिकायन्त्र पर डालवे फिर लशुन की त्वचा की भांति अत्यन्त सूक्ष्म गोलरूपों से पत्र-पत्त
पद्मपत्र की भांति क्रम से हो जाते हैं ॥११८-११६॥
तै पद्मरचनार्थं तद्वामदक्षिणकेन्द्रयो ॥१२०॥
पद्मप्रस्तारवन् कीलप्रस्तार कारयेत्तथा† ।
तत्पत्रतन्त्रीनाहृत्य तत्तत्केन्द्राद् यथाविधि ॥१२१॥
पत्राहरणसन्धानकीलेषु पृथक् पृथक् ।
सन्धाययेत् तत्प्रस्तारमनुसृत्य यथाविधि ॥१२२॥
उन पत्रों से पद्मरचनार्थ उसके वामदक्षिण केन्द्रों में पद्मप्रस्तार की भांति कीलप्रस्तार बनावे,
अनन्तर पत्र की तारों को उस उस केन्द्र से लेकर यथाविधि पत्रों के पकड़ने के जोड़ कीलों में पृथक् पृथक
उनके फैलाव के अनुसार यथाविधि जोड़ दे ।। १२०-१२२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार में कहा है—
पत्राहरणकीलस्य चालनाद् वेगत क्रमात् ।
प्रस्तारकीलसन्धानानुसारेण यथाक्रमम् ॥१२३॥
एकैकपद्ममायाति तत्तत्तन्त्रीमुखात् पुन ।
तथानुसन्धानकीलचालनात् पत्रसञ्चय ॥१२४॥
स्वतो भूत्वा भवेत् पद्माकार पश्चान्मनोहरम् ।
नालवत् प्रभवेदेकैकपत्रं च स्वभावत । १२५ ॥
एकैकपत्रनालस्याधातपत्रद्वय भवेत् ।
वाताकर्षणकीलं तु स्थापयेत् तन्मुखान्तरे ॥ १२६ ॥
† दीर्घ आर्षप्रयोग ।