बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
लेपनार्थं कीलकानां स्थापयेद् विधिवत्तत. ।
यदङ्गस्योपसंहारः कर्तव्यमिति रोचते ॥१०॥
उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकास के साधनभूत कीलों-पेंचों से विराजित मिश्रलोहे
से किए शुद्ध शलाकाओं को छेद से छत्री की शलाकाओं की भांति उन उन कीलों से अलग अलग
जोड़ दे पुन उन उनकी रेखासुसार जोड़ दे, तीन चक्र की कीलों से युक्त तीन मुखों से विराजित दो आम्र-
णीकील संस्थापित करे, दण्डे के मूल की दो कीलों के मध्य में उनके उत्तर में रुक्मतैल-नागकेशर का
तैल नलिकापात्र में भरा हो कीलों को लपेटने के लिये विधिवत् स्थापित करे । जिस अङ्ग का उपसंहार
करना रुचिकर हो-॥ ५-१० ॥
तत्क्षणाद् दण्डमूलस्थभ्रामणी चालयेद् यदि ।
तेनाङ्गयन्त्रशलाककीलसञ्चालन भवेत् ॥११॥
छत्रीशलाकवत्तेन तच्छलाकमपि क्रमात् ।
प्रत्यङ्ङ्मुख भवेत् तस्मादङ्गयन्त्रोपसङ्घृति ॥१२॥
प्रभवेदतिवेगेन न्यग्भावस्तच्छलाकत ।
पश्चात् प्राप्तापायनाशो भवत्येव न संशय ॥१३॥
एव क्रमेणाङ्गयन्त्रोपसंहारशलाकत ।
तत्तत्कीलप्रचालनात् कर्तव्य स्यात् पृथक् पृथक् ॥१४॥
यदङ्गस्योपरि भवेद् यानस्यापायसम्भव ।
तदङ्गस्योपसंहारात् तदपायनिवारणम् ॥१५॥
अनुलोमविलोमाभ्यां तत्तत्कीलकलाचालनम् ।
तत्तद्यन्त्रोपसंहारोद्धाराश्चापि भवेत् क्रमात् ॥१६॥
यदि तुरन्त दण्डमूलस्थ भ्रामणी को चलावे तो उससे अङ्गयन्त्र शलाका की कील का सञ्चा-
लन होजावे, छत्रीशलाका की भांति उससे वह शलाका भी क्रम से अङ्गमुख की ओर होजावे उससे
अङ्गयन्त्र का उपसंहार अतिवेग से होजावे उस शलाका से नीचे सङ्कोच होजावे पश्चात् प्राप्त अनिष्ट का
नाश हो जाता ही है संशय नहीं । इस प्रकार क्रम से अङ्गयन्त्र का उपसंहार शलाका से उस उस कील
के चलाने से पृथक् पृथक् करना चाहिए, विमान के जिस अङ्ग के ऊपर अनिष्ट का सम्भव हो उस अङ्ग
के उपसंहार से उस अनिष्ट का निवारण होजाता है। सीधे उलटे ढंग से उस कील का चलाना उस उस
यन्त्र का उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकासप्रसार भी क्रम से होता है ॥ ११-१६ ॥
एवमुक्त्वा यन्त्रोपसंहारयन्त्रमत परम् ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्र कथ्येतेत्र यथाविधि ॥१७॥
कूर्मदिग्गजभूमेघविद्युद (र ?) रुणशक्तय ।
यदा पद्ममुखे सम्यङ् मेलयन्ति परस्परम् ॥१८॥
तदा विश्वम्भरी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ।
सा भित्त्वा भूमुल पश्चादत्यन्तोष्णस्वभावत. ॥१६॥