बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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त्रिचक्रकीलयन्त्रेथ चोदयेत् सप्रमाणतः ।
तेन भ्राम्यति तद्यन्त्रं स्वतो वेगात् स्वकेन्द्रके ॥ ७० ॥
पश्चात् धूमोपसंहार नाल दशम केन्द्र में तथा दीपोपसंहार नाल ग्यारहवें केन्द्र में रखे, घूमने
वाले तारों की नालकील बारहवें केन्द्र में इस प्रकार विधिवत् प्रसङ्गत लगा कर इसके आगे शत्रु का
रूप बिगाड़ने के अर्थ करना चाहिये क्रम से शास्त्र से निरूपण करके यन्त्र की रचनाविधि को संक्षेप से
यथामति कहूंगा, विशुयन्त्र से शक्ति को लेकर यथाविधि तीन चक्रों वाले यन्त्र में सप्रमाण प्रेरित करे,
इससे वह यन्त्र स्वतः स्वकेन्द्र में घूमता है ॥ ६६-७० ॥
तद्वेगात् सर्वकेन्द्रस्थतत्तत्तन्त्रीमुखात् पुन ।
शक्तिसञ्चोदनात् सर्ववृत्तकीला भवन्ति हि ॥ ७१ ॥
त्रिचतु पञ्चकेन्द्रस्थतन्त्रीमार्गाद् यथाक्रमम् ।
शक्तिसंयोजनं कृत्वा कीलकभ्रमणं ततः ॥ ७२ ॥
कुर्यात् तेन क्रमान्नालत्रयं विकसितं भवेत् ।
पश्चान्नवमकेन्द्रावर्तकीलभ्रमणं तथा ॥ ७३ ॥
पूर्ववत् कारयेत् पश्चात् तेन कोशत्रयं क्रमात् ।
विस्तृतं स्यात् ततः पञ्चमकेन्द्रस्यावर्तकीलकम् ॥७४॥
पूर्ववद् भ्रामयित्वाथ शक्तिं तन्मार्गतः क्रमात् ।
योजयेत् सप्रमाणेन घोण्टिकातैलपात्रके ॥ ७५ ॥
उसके वेग से सर्व केन्द्रस्थ उस उस तार के मुख से पुन शक्ति के प्रेरण से सब ओर घूमने
वाली कीलें-पेंच घूमते हैं, तीन चार पांच केन्द्रों में स्थित हुए तारों के मार्ग से यथाक्रम शक्तिसंयोजन
करके फिर कीलभ्रमण करे-पेंच को घुमावे उससे तीनों नाल खुल जावेंगे पश्चात् नवम केन्द्र की कीली
का भ्रमण पूर्व की भांति करे पश्चात् उससे क्रम से तीनों कोश विस्तृत हो जावें फिर पांचवें केन्द्र की
घूमने वाली कील पूर्ववत् घुमा कर उस मार्ग से शक्ति को सप्रमाण घोण्टिका तैल-मैनफल या सुपारी
के तैल के पात्र में युक्त कर दे ॥ ७१-७५ ॥
तत्तैलं विषधूमस्स्यात् समग्र शक्तिवेगतः ।
कोशत्रयेथ विधिवत् तद्धूमं पूरयेत् तथा ॥ ७६ ॥
एकैककोशस्थधूममेकैकधूमनालके ।
पूरयेद् विधिवत् पश्चात् तत्तत्कालानुसारतः ॥ ७७ ॥
अनुलोमविलोमाभ्यां धूमनालद्वयात् ततः ।
विषधूमं समाहृत्य द्वौ भागौ शत्रु मण्डले ॥ ७८ ॥
संयोजयेत् ततस्तेनावरणं परिवेषवत् ।
बाह्यप्रदेशे शत्रूणां मण्डलस्य भवेत् क्रमात् ॥ ७९ ॥
घोण्टिकातैलतः पश्चाद् दीपं कृत्वा यथाविधि ।
ज्योतिस्तम्भान्तरे कीलबन्धनात् स्थापयेत् दृढम् ॥ ८० ॥