बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११५
कुर्यात् सम्पूर्णतश्शास्त्रविधिनातिप्रयत्नत ।
त्रिचक्रभ्रामणीकीलमादौ तस्मात् प्रचालयेत् ॥ ४० ॥
तेन द्विचक्रकोलकाश्च सम्यग्भ्राम्यन्ति वेगत ।
अतस्सम्यग्भ्रामकास्स्युस्तस्तम्भस्थावर्तकीलका ॥ ४१ ॥
ततो द्विचक्रकीलस्थपक्षाघातकभस्त्रिका ।
तच्चक्रभ्रमणादेव विस्तृतास्या भवन्ति हि ॥ ४२ ॥
ततोतिवेगता वायुस्तन्मुखात् सम्प्रधावति ।
पश्चाच्छ्वासोच्छ्वासवत्तत्सन्धिनालान्तरे क्रमात् ॥४३॥
सन्धिनालें द्राव से शुद्ध और सुदृढ करें फिर दो चक्कों वाली कीलें पश्चात् पक्षाघात भस्त्रिकाएं
तथा इससे तीन चक्रों वाला भ्रामणीकील यन्त्र और उपसंहार कील आठ प्रकार या आठ स्थानों में कहे
हैं । यन्त्रों के अङ्ग इस प्रकार कहकर अब उनका प्रयोग वर्णित करते हैं, विषम्भरा शक्ति स्वत भूमि को
वेग से तोड कर विमान के सारे अङ्गों पर आक्रमण करके जब व्याप जाती है तो विमान के अङ्गयन्त्रों
को पूर्णरुप से शास्त्रविधि से अतिप्रयत्न से तुरन्त विस्तृतास्य करदे, प्रथम तीन चक्रों वाली भ्रामणी कील
को चलावे उससे दो चक्रों वाली कीलें सम्यक् वेग से घूमती हैं अत स्तम्भस्थ घूमनेवाले पेंच भली प्रकार
घूमने वाले हो जाते हैं । फिर दो चक्र वाली कीलों में स्थित पक्षाघातक भस्त्रिकाए उन चक्रों के भ्रमण
से ही विस्तृतास्य हो जाती हैं फिर अति वेग से उसके मुख से वायु दौड़ता है पश्चात् क्रम से श्वास
उच्छ्वास की भांति सन्धिनाल के अन्दर—॥ ३६-४३ ॥
प्रविश्य चातिवेगेन तद्वायुश्चरति स्वत ।
तद्घाताघातत पश्चादङ्गयन्त्रमुखस्थिता ॥ ४४ ॥
भस्त्रनाला मध्यकेन्द्रे विस्तृतास्त्वेकथैव हि ।
भवन्ति तन्मुखात् पश्चाद् भस्त्रिकावद् विशेषत ॥४५॥
फूत्कारपूर्वक वायुर्वाति पूरंप्रवाहवन् ।
तत्प्रवाहोतिवेगेन शक्ति सम्यग् विषम्भराम् ॥ ४६ ॥
अपहृत्याकाशवातमण्डले नियोजयति ।
ततो विषम्भरा शक्तिस्तत्रैव लयमेधते ॥ ४७ ॥
ततो विमानस्थजनमेघोर्लुङनाशन भवेत् ।
एव विषम्भराशक्ति नाशयित्वा यथाविधि ॥ ४८ ॥
चालयेदुपसहारकीलक तदनन्तरम् ।
तेन यानाङ्गोपयन्त्र्राण्यभूवन् पूर्ववत् क्रमात् ॥ ४६ ॥
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रप्रयोगश्चैवमीरित (तम्) ।
एवमुक्त्वा विस्तृतास्यक्रियायन्त्र यथाविधि ॥ ५० ॥
सप्रह्लाद वैरूप्यदर्पणायन्त्रमयोच्यते ।