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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

परिवेषक्रियानालाधिकरणम् ] [ १०५

विमानमध्यकेन्द्रस्थावृत्तकीलाद् यथाविधि ।
यानबाह्य प्रदेशे तु अनुलोमविलोमत ॥ ४६ ॥
वेष्टयेद् विधिवत् सम्यक् कीलकैस्सुदृढ यथा ।
परिवेषक्रियानालमित्युक्त्वा शास्त्रत स्फुटम् ॥ ४७ ॥
किरणाकर्षणादर्शनालमद्य निरूप्यते ॥ ४८ ॥

पट से निर्मित यह परिवेषक्रियानाल कीली चलाने से धूवा विमान को ढकेलता है विमान
मध्यकेन्द्रस्थ घूमनेवाली कील से यथाविधि विमान के बाहरी प्रदेश में ही अनुलोम विलोम से कीलों
से सम्यक् विधिवत् लपेटे, शास्त्र से स्फुट रूप में परिवेषक्रियानाल कहकर किरणाकर्षण आदर्शनाल अब
निरूपित करते हैं ॥ ४६-४८ ॥

तदुक्तं नालिकानिर्णये - वह कहा है नालिकानिर्णय में -
पञ्चोत्तरत्रिशतदर्पणषोडशाश काञ्चोलिकाभरणसत्त्व । पञ्चभागम् ।
सर्पास्यपाटवसुराञ्जिकासत्त्वषट्क हैरण्यकान्तजटसा।रचतुष्टय च ॥ ४९ ॥
शुद्धीकृत टङ्कणमष्टभाग सिञ्जाणसत्त्व वरकुञ्जलद्रवम् ।
आ (मा ?) वृणचूर्णं मणिकुड्मलास्यादर्श च क्षारत्रय बालुका च ॥५०॥
सुराञ्जिकासत्त्वविरञ्चिपिष्ट पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक च ।
शेलूपसत्त्व वरकुड्मलद्रवम्, एते क्रमात् द्वादश वस्तु वर्णितम् ॥५१॥
नक्षत्रबाणार्कमुनित्रयाष्टशैलाग्निरुद्रा वसुराशिपञ्च ।
एव क्रमाद् द्वादशवस्तुभागानाहृत्य शुद्धान् विधिवद् यथाक्रमम् ॥५२॥
भेकास्यमूषामुखरन्ध्रनाले सम्पूर्णभेकोदरकुण्डमध्ये ।
संस्थापयेद् वेगेन द्विपक्षभस्त्रया संगालयेत् कथ्यशतत्रयोष्णात् ॥५३॥
पश्चात् समाहृत्य च तद्रस वर सम्पूरयेद् दर्पणयन्त्रनाले ।
एव कृते किरणाकर्षणाश्यादर्शो भवेत् सूक्ष्मरूप च शुद्धम् ॥५४॥ इत्यादि

तीन सौ पाश्वें दर्पण के १६ भाग काञ्चोलिकाभरणसत्त्व ? पांच भाग, सर्पास्यपाटव सुराञ्ज-
कासत्त्व?-सर्पास्य-नागकेसर, सुराञ्जिका-सुराञ्जिका-मूर्वाळता ६ भाग, हैरण्यकान्तजटसार ?-हिरण्य-कौडी,
कान्त-सूर्यकान्त, जटा-जटामासी का सार ४ भाग, शुद्ध किया सुहागा ८ भाग, सिञ्जाण ? सिञ्जाण-लोह-
किट्ट ? का सत्त्व, अच्छा कुञ्जललशुन का द्राव, आवृण-कावृण-गन्धतृण का चूर्ण, कुड्मलास्यमणि-
पद्मरागमणि ? का आदर्श, तीनों क्षार-सज्जीक्षार यवक्षार नौसादर और बालु-रेत, सुराञ्जिकासत्त्व,
विरञ्चि की पिष्टी या चूर्ण, पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक-पोषणनामक कृष्णाभ्रक का सत्त्व, शेलूपसत्त्व-
बिल्व का सत्त्व, वरकुड्मलद्रव, क्रम से ये १२ वस्तुएं कही हैं। जो कि २८, ५, ६, ३ या ७, ३, ८, ७,
३, ११, ८, १२, ५ इस क्रम से १२ वस्तुओं के भागों को लेकर विधिवत् भेकास्य-मेण्डकमुख नामक
मूषामुखछिद्रवाले नाल में भरकर भेकोदरकुण्ड के मध्य में संस्थापित करे वेग से दो पक्षभस्त्रा से तीन
सौ दर्जे की उष्णता से गला दे। पश्चात् उस अच्छे गले रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। ऐसा
करने पर सूक्ष्मरूप किरणाकर्षणनामक हो जावे ॥ ४६-५४ ॥