बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
—प्रविष्ट होकर वह वायु स्वत अतिवेग से सञ्चार करती है पश्चात् इस वायु के आघात से अङ्ग-
यन्त्रों के मुख में स्थित भस्त्रानालें मध्य केन्द्र में एक साथ—एक दम विस्तृत हो जाती हैं फिर उनके
मुख से भस्त्रिका की भांति विशेषत फूत्कारपूर्वक वायु पूर्ण प्रवाह से चलती है वह प्रवाह अति वेग से
विषम्भरा शक्ति को खींच कर आकाशमण्डल में नियुक्त कर देता है तब विषम्भरा शक्ति वहां ही लय
को प्राप्त हो जाती है । फिर विमान में स्थित मनुष्यों के मेघरोग का नाश हो जाता है। इस प्रकार
विषम्भरा शक्ति को यथाविधि नष्ट करके अनन्तर उपसंहार कील को चलावे उससे विमानांगों के उपयन्त्र
पूर्व जैसे हो जाते हैं । विवृतास्यक्रियायन्त्र कह कर वैरूप्यदर्पण यन्त्र अब संक्षेप से कहा जाता
है ॥ ४४-५० ॥
वैरूप्यदर्पणयन्त्रनिर्णय. —वैरूप्य दर्पणयन्त्र का निर्णय—
विमाननाशनाय ये समागच्छन्ति शत्रव ॥ ५१ ॥
तेषा देहविरूपत्व यस्य सन्दर्शनाद् भवेत् ।
वैरूप्यदर्पण इति तमाहु पण्डितोत्तमा ॥ ५२ ॥
तद्दर्पणकृत यन्त्र वैरूप्यादर्शयन्त्रकम् ।
इति शास्त्रेषु निर्णीत यन्त्रतत्त्वविदा वरे ॥ ५३ ॥
सङ्ग्रहेणात्र विधिवत् वक्ष्ये तद्रचनाविधिम् ।
विमान के नाशार्थ जो शत्रुजन आ जाते हैं उनके देह की विरूपता जिसके देखने से हो
जावे उसे वैरूप्य दर्पण इस नाम से ऊंचे विद्वान् कहते हैं । वह दर्पण से किया यन्त्र वैरूप्यादर्श यन्त्र
शास्त्रों में यन्त्रतत्त्ववेत्ताओं ने निर्णय किया है । उसकी रचनाविधि को संक्षेप से विधिवत्
कहूंगा ॥ ५१-५३ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
यदा तु व्योमयानस्य विनाशार्थ तु शत्रव ॥ ५४ ॥
आगत्यावृत्य तिष्ठन्ति विमानं क्रूरकर्मिण ।
तेषा रूपविकारार्थ यन्त्रोय परिकीर्तित ॥ ५५ ॥
पीठकेन्द्रावर्तकीलज्योतिस्तम्भास्तथैव च।
विद्युद्यन्त्रावर्तधूमनालञ्चापि तत परम् ॥ ५६ ॥
घोण्टिकातैलत्रिचक्रकीलकोशत्रय तथा ।
घूमदीपोपसहारनालो चापि यथाक्रमम् ॥ ५७ ॥
वैरूप्यादर्शयन्त्रस्याङ्गानीत्याहुर्मनीषिण ।
वितस्तिद्वयविस्तार वितस्तिद्वयमु (रु ?) न्नतम् ॥ ५८ ॥
बैलवेन वर्तुलं पीठ कुर्याच्छास्त्रविधानतः ।
तस्मिन् द्वादशकेन्द्राणि कल्पयेत् समरेखतः ॥ ५६ ॥