बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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भवेन्मेषादिराशिस्थशक्तिसम्मथनं क्रमात् ।
तेनाकाशतरङ्गस्थशक्त्युद्रेको भवेत्स्वतः ॥ ९६ ॥
तयोस्सङ्घर्षणं पश्चाज्जायतेत्यन्तवेगतः ।
तस्माच्छक्तिप्रवाहाश्चाग्निज्वालाप्रवाहवत् ॥ ९७ ॥
अनुलोमविलोमाभ्यां वक्रगत्यतिवेगतः ।
प्रवहन्ति विशेषेण राशिभोगानुसारतः ॥ ९८ ॥
सञ्चारकाले स्वपथि विमानाङ्गोपरि क्रमात् ।
तत्प्रवाहोष्णसंयोगो यदङ्गो स्याद् विशेषतः ॥ ९९ ॥
दग्ध्वा भस्मीकृत (तो ?' भूयात् तदङ्गमतिशीघ्रतः ।
उष्णप्रमापकाद् यन्त्रात् तद्विज्ञायाथ वेगतः ॥ १०० ॥
तदपायनिवृत्त्यर्थं तदङ्गमुपसंहरेत् ।
तस्मादङ्गोपसंहारयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १०१ ॥
इस प्रकार परिवेशक्रिया यन्त्र कह कर इससे आगे अङ्गोपसंहार यन्त्र संक्षेप से कहते हैं ।
सूर्य आदि सब ग्रहों के राशिसंस्थान से चार अतिचार वक्र अतिवक्र सञ्चार के कारण मेष आदि राशिस्थ
शक्ति का मन्थनक्रम से हो जावे—हो जाता है उससे आकाशतरङ्गों में स्थित शक्ति का उद्रेक—
आधिक्य—प्राबल्य स्वत हो जाता है फिर उन दोनों का संघर्षण—टकराव अत्यन्त वेग से हो जाता है
अत शक्तिप्रवाह अग्निज्वालाप्रवाह की भांति सीधे उलटे ढंग से वक्रगति के अतिवेग से राशिभोगा-
नुसार विशेषरूप से प्रवाहित हो जाते हैं । सञ्चारकाल में अपने मार्ग में विमानाङ्गों के ऊपर क्रम से
उस प्रवाह का उष्ण संयोग जिस अङ्ग में विशेष हो जावे तो वह अङ्ग अतिशीघ्र जल कर भस्म हो
जावे, उष्णतामापक यन्त्र से उसको जान कर शीघ्र उस अनिष्ट की निवृत्ति के अर्थ उस अङ्ग का
उपसंहार करे अत. अङ्गोपसंहार यन्त्र यहां कहते हैं ॥ ९४–१०१ ॥