बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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यदेतद्दर्पणकृतनाल तच्छास्त्रत स्फुटम् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमित्युच्यते बुधै ॥ ५५ ॥
यन्त्रस्योर्ध्वमुखे पश्चान्नालमेतन्नियोजयेत् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमुक्त्वा यथाविधि ॥ ५६ ॥
प्रतिबिम्बार्ककिरणाकर्षणादर्शनालकम् ।
विविच्यतेऽत्र विधिवत् सग्रहेण यथामति ॥ ५७ ॥
जो यह दर्पण से बना नाल शास्त्र से स्फुट है किरणाकर्षणादर्शनाल बुद्धिमानों के द्वारा कहा
जाता है । पश्चात् यन्त्र के उपरिमुख में इस नाल को युक्त करे किरणाकर्षणादर्शनाल यथाविधि कहकर
प्रतिबिम्बकिरणाकर्षणादर्शनाल का विधिवत् संग्रह से विवेचन करते हैं ॥ ५५ - ५७ ॥
तदुक्तं नालिकानिर्णये-यह बात नालिकानिर्णय में कही है-
कूष्माण्डसत्त्व कुडुहञ्चिद्रव द्विचक्रकन्दद्वयक्षारसत्त्वकम् ।
पञ्चास्यमूलत्रयक्षारमोर्व्य चन्द्रद्रव चोलिक