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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 368 में से

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पृष्ठ 144

किरणाकर्षकादर्शनाल ] [ १२१
प्रकल्प्य तस्मिन् द्वादश केन्द्रस्थानानि कारयेत् ।
रेखाप्रसारणं कुर्यान्मध्यकेन्द्रात् समग्रत ॥ १०१ ॥
पीठ, शंकु, नालदण्ड, विद्युत्तार, सूक्ष्मदर्पणयन्त्र, पद्मक्रियाविधि, पद्मप्रतिष्ठा के स्थान,
वाताकर्षण करने वाली खाल की भस्त्रिकाओं की कीलें—पेंच, सङ्कोच विकास की दो कीलें—पेंच, त्रिचक्र
भ्रामणी यन्त्र स्थापन का निर्णय, वायुप्रवाह के मार्ग, उपसंहार कील, ये १२ यन्त्राङ्ग हैं यह शास्त्र का
निर्णय है । ८ बालिशत लम्बा ३ बालिशत ऊंचा चौकोण या गोल पीठ पिप्पल की लकड़ी से बना कर
उसमें १२ केन्द्रस्थान बनावे, मध्य केन्द्र से एक ओर रेखा खींचे ॥ ६६-१०१ ॥
मध्ये शङ्कुर्नालदण्डो शङ्कुनोभयपार्श्वयो ।
विद्युत्तन्त्री पूर्वकेन्द्रे पद्मपत्राण्यथोत्तरे ॥१०२॥
पत्राणां पद्मरचना दक्षिणोत्तरकेन्द्रयो ।
पद्मप्रतिष्ठा ईशानीदादाग्नेयान्तमत परम् ॥१०३॥
तत्पुरस्ताद्† वातापकर्षणत्वग्भस्त्रिका स्मृता ।
सङ्कोचशीलक तद्वत्तस्य वायव्यकेन्द्रके ॥१०४॥
तथा विकासकील च भवेन्नैऋत्यकेन्द्रके ।
त्रिचक्रभ्रामणीकील यन्त्र पूर्वमुखे स्मृत ॥१०५॥
वातप्रवाहमार्गाणि प्रतिपद्मादध क्रमात् ।
उपसंहारकील तद्दक्षिणे स्यादितीरितम् ॥१०६॥
एतद [म?] ङ्गाद्वादशक केन्द्रद्वादशके स्मृतम् ।
अथाङ्गरचनामांऽस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥१०७॥
द्वादशाङ्गुलगात्र च वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
अभ्रमृद्दर्पणात् कुर्याच्छङ्कु शास्त्रविधानत ॥१०८॥
मध्य में शङ्कु, शङ्कु के सहारे दोनों पाश्र्वों में दो नालदण्ड, पूर्व केन्द्र में विद्युत् की दो
तारें, उत्तर में पद्मपत्र, पत्रों की पद्मरचना दक्षिण उत्तर केन्द्रों में, पद्मप्रतिष्ठा ईशानी कोण से आग्नेय
कोण तक इससे आगे उससे पूर्व वायु को खींचने वाली चर्मभस्त्रिका कही है । उसी भांति सङ्कोचनकील
उसके वायव्य केन्द्र में तथा विकासनकील निऋति कोण के केन्द्र में, त्रिचक्रभ्रामणीकील यन्त्र पूर्वमुख
में कहा है । वायुप्रवाहमार्ग प्रतिपद्म के नीचे क्रम से, उपसंहारकील उसके दक्षिण में हो ऐसा कहा है ।
ये १२ अङ्ग १२ केन्द्रों में कहे हैं । अब अङ्गरचना का मार्ग-प्रकार संक्षेप से निरूपित किया जाता है ।
१२ अङ्गुल मोटा ३ बालिशत ऊंचा अभ्रमृद् दर्पण से शंकु शास्त्रविधान से बनावे ॥ १०२–१०८॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह दर्पणप्रकरण में कहा है—
रम्भासत्त्व पञ्चभाग तथैव मञ्जूषक्षाराष्टक पञ्च कान्तम् ।
कुष्ठ्यादसत्त्वाष्टकमाढकस्य सत्त्वत्रय कूर्मकसप्तसारम् ॥१०६॥
† ‘त्वत्पुरस्तात्’ हस्तलेखे ।