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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 368 में से

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वैरूप्यदर्पणयन्त्र ] [ ११६
वह तैल शक्ति वेग से सब विषैला धुआं हो जावे—हो जावेगा, उस धुएं को तीनों कोशों में
भर दे फिर एक कोश में स्थित धूवां एक एक धूमनाल में विधिवत् भर दे, पश्चात् उस उसके समयानुसार
अनुलोम विलोम—सीधे उलटे ढंग से दो धूमनालों से विषधूम दो भाग लेकर शत्रुमण्डल मे संयुक्त
कर दे फिर परिवेषक्रिया की भांति बाह्य प्रदेश में शत्रुओं के मण्डल का आवरणक्रम से हो जावे ।
पश्चात् घोष्टिका तैल—मैनफल या सुपारी के तैल से यथाविधि दीपक करके ज्योतिस्तम्भ के अन्दर
कीलबन्धन से स्थापित कर दे ॥ ७६-८० ॥
ज्योतिस्तम्भान्तर व्याप्य तत्प्रकाशस्समग्रत ।
आसमन्ताद् रक्तवर्णं जपाकुसुमवत् क्रमात् ॥ ८१ ॥
करोति पश्चात् तज्ज्योतिस्तम्भस्योपर्यथाविधि ।
संयोजयेत् सप्रमाणं विद्युद्भासनमत् परम् ॥ ८२ ॥
ज्योतिर्भान समाहृत्य विद्युद्भासस्स्ववेगत ।
हरितश्वेतपीतादिसप्तवर्णविकारताम् ॥ ८३ ॥
करोति तत्क्षणात् पश्चात् समग्र स्तम्भकेन्द्रके ।
ज्योतिस्तम्भे भासमानविद्युद्दीप्रकाशयो ॥ ८४ ॥
तृतीयधूमनालेन धूममाकृष्य कोषात् ।
विधिवद् योजयेद् वातनालमार्गात् प्रमाणतः ॥ ८५ ॥
ज्योतिस्तम्भ के अन्दर व्याप कर उसका समग्र प्रकाश सब ओर से जपाफूल की भांति रक्त-
वर्ण—लाल रंग वाला कर देता है पश्चात् इस ज्योतिस्तम्भ के ऊपर यथाविधि सप्रमाण विद्युद्भास—
बिजुली के प्रकाश को संयुक्त कर दे । इसके आगे ज्योतिर्भान—ज्योति के भान को विद्युत् का भास
स्वत लेकर हरा सफेद पीला आदि सात रंगों की विकारता को तत्क्षण करता है । पश्चात् स्तम्भ केन्द्र में
ज्योतिस्तम्भ में भासमान विद्युत् और दीपप्रकाश में तीसरे धूमनाल से कोश से धूम को खींच कर
विधिवत् वातनाल मार्ग से प्रमाण में जोड़ दे ॥ ८१-८५ ॥
विषधूमस्ततस्तेन दीपवत्त्व प्रकाशते ।
तद्दीपभानमाहृत्य नालमार्गाद् यथाविधि ॥ ८६ ॥
ज्योतिस्तम्भपुरोभागस्थितवैरूप्यदर्पणम् ।
संयोजयेत् ततो दीपप्रकाशस्त समग्रत ॥ ८७ ॥
व्याप्य वेगाद् विशेषेण कलात्रिंशत्प्रभास्वर ।
भवेद् द्रष्टुमशक्य च शत्रूणा स्तम्भन तथा ॥ ८८ ॥
पुन कोषात् त्रयाद् धूममाहृत्य विधिवत् क्रमात् ।
शत्रु मण्डलवाह्यस्थपरिखेवान्तरे पुन ॥ ८९ ॥
संयोजयेत् पञ्चविंशल्लिङ्गमात्र यथाविधि ।
पश्चाद् धूमं तत्प्रकाशे धूमनालान्तरात् पुन ॥ ९० ॥