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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

११४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्तम्भमूलाद्यशिरोभागान्त केन्द्रानुसारत ।
प्रदक्षिणावर्तकीलाननुलोमविलोमत ॥ २९ ॥
स्तम्भस्य प्रतिकेन्द्रे थ स्थापयेद् द्वन्द्वत क्रमात् ।
पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्रमध्यकेन्द्रमुखान्तरे ॥ ३० ॥
भस्त्रिकानालस्तम्भकीलद्वन्द्वावधिक्रमात् ।
सर्वत्र योजयेन्नालान् कीलसंख्यानुसारत ॥ ३१ ॥
बाहुभर माप लम्बाई चौड़ाई में, २२ अंगुल मोटाई में गोलाकार पीठ पिप्पल की लकड़ी से
बनावे, बाहुभर माप मोटा ३२ अंगुल ऊंचा स्तम्भ काष्ठ का बना कर उसके मध्य में दृढ स्थापित करे,
व्योमयान के अङ्गोपयन्त्र संख्या से विधिवत् क्रम से अङ्गोपयन्त्र की दिशा रेखा का अनुसरण करके
यथाविधि स्तम्भमूल से शिरोभाग तक केन्द्र के अनुसार घूमने वाली कील के सीधे उलटे ढंग से स्तम्भ
के प्रति केन्द्र में स्थापित करे। दो दो करके पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्र के मध्य केन्द्रमुख में भस्त्रिकानाल
से स्तम्भ की दो कील की अवधि के क्रम