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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

).

  • Line 33:
    पश्चात् पारद्रवे सम्यक् तच्छक्ति सम्प्रवेशयेत् ॥ १०८ ॥
    Notice तच्छक्ति (no bindu).
  1. Double check Line 6 word रुचिद्रावक-सञ्जो...:
    • Wait, is it सञ्जोच्चार?
    • Let's re-examine that word:
      रुचिद्रावक-सञ्जोच्चार के द्रावक की मणि के मूल से
      Wait, in line 6: सञ्जो...
      Wait, could it be सञ्जोच्चार?
      Wait, let's look at the letters:
      स
      ञ्जो
      च्चा or वा?
      Wait! In line 15: विधिवच्छक्तिद्वयमत -> look at च्छ.
      In line 6: look at the glyph after ञ्जो:
      It's a व? No, wait! Is it सञ्जोच्चार or सञ्जोचार?
      Wait, look at च्चार: च has a loop? No, च has a flat top, curved bottom.
      Wait, look at the glyph: does it look like च्चार?
      Wait, could it be `सञ्जो

दर्पणशधिकरण ] [ ८३
मणिप्रेरिततच्छक्ति द्रवशक्तिं तथैव च ।
समाहृत्य विशेषेण रुचिकद्रवसंस्थिते ॥ १०६ ॥
मणौ सन्धारयेत् पश्चात् तच्छक्तिं पूर्ववत् क्रमात् ।
रुचिकादर्शमूलस्थरेखाकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ११० ॥
पश्चात् उन दोनों शक्तियों को पकड़ कर पारे के द्राव में नियुक्त कर दे, फिर दिशा देश केन्द्र
तक स्थित वस्तुओं के बिचार से—प्रभाव से वह द्रावक नाना चित्ररंग वाली प्रभा से युक्त हो जाता है,
सूर्यकिरणशक्ति को खींच कर पारे के द्राव वाली मणि में १५ लिक्ष (डिग्री) माप में यथाविधि युक्त
कर दे, पश्चात् पारे के द्राव में सम्यक् उस शक्ति को प्रविष्ट कर दे, मणिद्वारा प्रेरित उस शक्ति को तथा
द्रवशक्ति को लेकर विशेषत सञ्जीक्षार द्राव में स्थित मणि में जोड़ दे, पश्चात् उस शक्ति को पूर्व की
भांति सञ्जीक्षार द्रावदर्पण के मूल में स्थित रेखा केन्द्र में नियुक्त करे ॥ १०६-११० ॥
तच्छक्तिं रुचिकादर्शस्स्वस्मिन् सन्धारयेत् (सन्धार्यते ? ) ततः ।
मुखदर्पणमारभ्य रुचिकान्तं यथाविधि ॥ १११ ॥
लक्ष्यं कृत्वा सप्ततिमाद्दर्शनालात् क्रमं यथा ।
तथैव रूपाकर्षणयन्त्रकेन्द्रान्तमन्तरे ॥ ११२ ॥
लक्ष्यं प्रकल्पयेत् सम्यग् रुचिकादर्शकेन्द्रतः ।
पश्चात् पारद्रवमणिशक्ती संयोजयेत् समम् ॥ ११३ ॥
विश्वक्रियादर्शवामकेन्द्रलक्ष्यात् प्रयत्नतः ।
दिग्देशरेखाकेन्द्रान्तं गणितोक्तेन वर्त्मना ॥ ११४ ॥
पश्चात् सच्याप्य तच्छक्ती तत्रत्याना स्फुटं यथा ।
कार्यकारणकर्त्तृ स्वरूपमाकृष्य वेगतः ॥ ११५ ॥
उक्त शक्ति को रुचिक आदर्श अपने में धारण कर लेता है, मुखदर्पण को आरम्भ कर रुचिक
दर्पण पर्यन्त यथाविधि लक्ष्य करके ७० वें आदर्श नाल से यथाक्रम वैसे ही रूपाकर्षण यन्त्र के केन्द्र तक
अन्दर लक्ष्य को रुचिकादर्श केन्द्र से बनावे, पश्चात् क्रियादर्श वामकेन्द्र के लक्ष्य से प्रयत्न से दिशा देश
रेखा केन्द्र तक गणित शास्त्र में कहे मार्ग से पारे के द्राववाली मणि की दोनों शक्तियों को समान रूप
से युक्त करे पश्चात् वे दोनों शक्तियां व्याप कर वहा के कार्यकारण कर्ता के स्वरूप को वेग से आकर्षित
करके—॥१११-११५ ॥
प्रतिबिम्बाकारयुक्ता सा शक्ति पूर्ववत् पुन ।
परा गतिमवाप्याथ मुखदर्पणकेन्द्रतः ॥ ११६ ॥
आंगम्य रुचिकद्रावमणौ संविशति स्वयम् ।
तामाकृष्यातिवेगेन मणिशक्तिस्स्वभावतः ॥ ११७ ॥
स्वस्मिन् तत्प्रतिबिम्बस्वरूपं सन्धार्यते*स्फुटम् ।
पश्चात् तत्रत्यरुचिकद्रावकस्स्वप्रभावतः ॥ ११८ ॥

  • व्यत्ययेन कर्मप्रत्यय कर्तरि ।

८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रत्यक्षवत् तत्स्वरूपं विशदीक्रियते* स्फुटम् ।
रूपाकर्षणयन्त्रेण पश्चात् तत्प्रतिबिम्बकम् ॥ ११९ ॥
समादाय विशेषेण सप्तमाभ्रकदर्पणात् ।
प्रतिबिम्बस्वरूपेण कर्तृ कार्यादिकान् क्रमात् ॥ १२० ॥
वह प्रतिबिम्बाकारयुक्त शक्ति पूर्व की भांति परा गति को प्राप्त होकर मुखदर्पण केन्द्र से आकर
रुचिक द्राववाली मणि में स्वयं घुस जाती है, उसे मणिशक्ति स्वभावतः अतिवेग से अपने अन्दर
आकर्षित कर प्रकट रूप में प्रतिबिम्बस्वरूप धारण कर लेती है, पश्चात् वहां के रुचिक द्राव स्वप्रभाव से
प्रत्यक्ष जैसा उसके स्वरूप को विशद करता है, पश्चात् रूपाकर्षण यन्त्र से उस प्रतिबिम्ब को सातवें
अभ्रक दर्पण से लेकर प्रतिबिम्बस्वरूप से कर्ता कार्य आदि को क्रम से—॥ ११९-१२० ॥
द्रष्टुं यथावद् योग्यं स्यात् पृथक् पृथक् स्वरूपतः ।
तस्मिन् दृष्ट्वा विमानस्य सम्भवापायसञ्चयान् ॥ १२१ ॥
विज्ञाय शास्त्रतस्सम्यक् सर्वापायनिवारणम् ।
कृत्वा निर्मूलमथ तद्विमानं प्रेषयेत् पुनः ॥ १२२ ॥
एतत्कायोपयोगार्थं वर्णितं शास्त्रतः क्रमात् ।
विश्वक्रियाकर्षणदर्पणयन्त्रं समासतः ॥ १२३ ॥
पृथक् पृथक् स्वरूपतः यथावत् देखने योग्य हो जावे, उसमें विमान के सम्भावनीय–होने
वाले अनिष्ट सञ्चयों को देख कर शास्त्र से सब अनिष्टों के निवारणप्रकार को जान कर पुन निर्मूल कर
उस विमान को चलावे । इस कार्य के उपयोगार्थ शास्त्र से क्रम से विश्वक्रियाकर्षण दर्पण यन्त्र संक्षेप से
वर्णित किया है ॥ १२१-१२३ ॥

  • व्यत्ययेन कर्तरि कर्मप्रत्यय ।

पूना फोटो संख्या ४ वस्तुत. हस्तलेख प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ६—
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रनिर्णयः—अब शक्त्याकर्षण दर्पणयन्त्र का निर्णय है--
इत्युक्त्वा विश्वक्रियाकर्षणयन्त्रमत परम् ।
शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १ ॥
इस प्रकार विश्वक्रियाकर्षण यन्त्र को कह कर इससे आगे शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र यहां
कहते हैं ॥ १ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
वियत्तरङ्गपवनरौद्रीसञ्जातशक्तय. ।
ऋतुकालानुसारेण खेटयानविनाशका ॥ २ ॥
तास्समाकृष्य वेगेन नाशयित्वा खमण्डले ।
यत् स्वशक्त्या पालयति व्योमयानान् विशेषत ॥३॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमिति कीर्त्यते ।
वियत्तरङ्ग - आकाश के स्तरों मण्डलों और पवन रौद्री-वायु की वेग पंक्तियों से उत्पन्न शक्तियां
ऋतुकाल के अनुसार विमान का विनाश करने वाली हैं । उन्हें अपने वेग से खींच कर आकाश में नष्ट
करके जो अपनी शक्ति से विमानों की रक्षा करता है वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा जाता है ॥२-३॥
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है--
रौद्रवाताकाशवीचिसञ्जाता विश्वरूपका ॥ ४ ॥
शक्तयस्त्रिविधा प्रोक्ता व्योमयानविनाशका ।
तन्निवृत्य स्वशक्त्या यद्विमानं पालयेत् स्वत ॥ ५ ॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमित्युदीर्यते ।
यन्त्रस्वभावमुक्त्वैवं सग्रहेण यथामति ॥ ३ ॥
अथ तद्यन्त्ररचनाविधिरत्र निरूप्यते ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्तिद्वयविस्तृतम् ॥ ७ ॥
पीठ प्रकल्पयेच्छुद्धक्रौञ्चलोहेन शाश्वत ।

[ ८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेगपंक्ति पूर्ण वात और आकाश के तरङ्गरूप मण्डलों से उत्पन्न तीन प्रकार की विषशक्तियां
विमान को नष्ट करने वाली कही हैं। उन्हें अपनी शक्ति से निवृत्त करके जो विमान की स्वत रक्षा करे
वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा है । यन्त्र के स्वभाव को इस प्रकार संक्षेप से यथामति कह कर अब
उस यन्त्र की रचनाविधि यहां निरूपित की जाती है । तीन बालिश्त लम्बा दो बालिश्त चौड़ा पीठ शुद्ध
क्रौञ्च लोहे से शास्त्र से बनावे ॥ ४-७ ॥
द्वाविंशदङ्गुलायाममङ्‌गुलत्रयविस्तृतम् ॥ ८ ॥
सप्तविंशतिमादर्शकृतशङ्कुं यथाविधि ।
तन्मध्ये स्थापयेत् पश्चात् तस्य पूर्वदिशि क्रमात् ॥६॥
केन्द्रत्रय कल्पयित्वा तथैवोत्तरदक्षिणो ।
द्वौ द्वौ केन्द्रौ तथा कुर्यात् समरेखाप्रमाणत ॥ १० ॥
पूर्ववत् पश्चिमे केन्द्रत्रय कुर्यात् यथाविधि ।
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् प्रतिकेन्द्रके ॥ ११ ॥
पश्चात् सप्तोत्तरशततमादर्शकृतान् दृढान् ।
नालान् सन्धारयेत् पश्चात् सतन्त्रीन् द्रवशोधितान् ॥१२॥
१२ अंगुल लम्बे ३ अंगुल चौड़े २७ वें आदर्श से किये हुए शङ्कु को उसके मध्य मे यथा-
विधि स्थापित करके फिर उसकी पूर्वदिशा मे क्रम से तीन केन्द्र बनाकर वैसे ही उत्तर दक्षिण में दो दो
केन्द्र समान रेखा में करे, पूर्व की भांति पश्चिम में तीन केन्द्र यथाविधि करे । प्रत्येक केन्द्र में घूमने
वाली कीलों—पेंचों को स्थापित करे पश्चात् १०७ वें आदर्श से बने दृढ़ नालों को तारोंसहित द्रव से
शोधित लगावे—॥ ८-१२ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलमूलस्थानावधि क्रमात् ।
च (छ ?) षकाकारवत्पञ्चदशागुलप्रमाणत ॥ १३ ॥
पूर्वोक्तदर्पणात् सम्यक्कृतपात्र यथाविधि ।
सस्थापयेच्छङ्कुमुलस्थकीलकोपरि पूर्वके ॥ १४ ॥
वितस्त्यायाम सङ्क्लृप्तं विस्तृते तथाविधम् ।
तथैवादर्शगोलं च छिद्रत्रयसमन्वितम् ॥ १५ ॥
स्थापयेन्मध्यकेन्द्रस्थकीलकोपरि पूर्ववत् ।
द्वादशागुलायाम द्वादशागुलविस्तृतम् ॥ १६ ॥
त्रिकोणकुण्ड्याकारेण कृतमादर्शंत क्रमात् ।
तृतीयकेन्द्रस्थकीलोपरि सस्थापयेत् तथा ॥ १७ ॥
कान्तोदुम्बरसम्मिश्रचक्रद्वय क्रमात् ।
घूमने वाली कील की अवधि तक । पात्र—लोटा गिलास के आकार जैसा १५ अंगुल माप में
पूर्वोक्त दर्पण से सम्यक् यथाविधि बने पात्र को शंकुमूलस्थ पूर्व कील – पेंच के ऊपर बालिश्त भर लम्बा

शक्त्यधिकरण ] [ ८७
चौड़ा सिद्ध वैसा ही आदर्श गोल तीन छिद्रों से युक्त मध्य केन्द्रस्थ पेंच के ऊपर पूर्व की भांति स्थापित
करे, १२ अं'गुल लम्बे १२ अं'गुल चौड़े त्रिकोण भित्ति के आकार में आदर्शदर्पण से बने हुए को तीसरे
केन्द्र में स्थित पेंच के ऊपर संस्थापित कर दे, तथा कान्त—अयस्कान्त लोहे, उदुम्बर अर्थात् तांबे से
मिश्रित दो चक्रदण्ड क्रम से—॥ १३-१७ ॥
पूर्वोक्तादर्शगोलस्य गर्भकेन्द्रे यथाविधि ॥ १८ ॥
सन्धारयेद् यथा सम्यग् भवेत् सङ्घर्षणं तयो ।
पश्चात् तत्पश्चिमे भागे वातपादार्पणात् कृतम् ॥ १९ ॥
पिण्डमेक विस्तृतास्यमित्थं मूलस्थकीलके ।
स्थापयेद् विधिवत् पश्चात् पञ्चस्रोतोमुख दृढम् ॥ २० ॥
शक्तिपादर्पणकृतमन्तःप्रवाहिकं तथा ।
मूल सूक्ष्म तथा मध्ये वर्तुलं कण्ठसूक्ष्मकम् ॥ २१ ॥
विस्तृतास्य मध्यकीलोपरि संस्थापयेन् तत ।
तदत्यन्तकीलके तद्वद् भ्राजस्वद्रावकं न्यसेत् ॥ २२ ॥
अथ तद्दक्षिणपार्श्वस्थितकीलद्वये तत ।
स्थापयेदन्योन्यसंघर्षण चक्रत्रयं क्रमात् ॥ २३ ॥
तयोवोदीचिदिशिस्थकीलद्वयमध्यमे ।
कान्तपाराभ्रसत्वार्कं चुकद्रावकं न्यसेत् ॥ २४ ॥
पश्चान्मणीन् यथाशास्त्रं तत्तत्स्थाने नियोजयेत् ।
पूर्वोक्त आदर्श गोल के गर्भ केन्द्र में यथाविधि लगा दे, जिससे उन दोनों का संघर्षण हो,
पश्चात् उसके पश्चिम भाग में वातपादर्पण से बने विस्तृत मुख वाले एक पिण्ड को मूलस्थ पेंच में विधि-
वत् स्थापित कर दे, पुन पांच स्रोत मुख वाले दृढ़ शक्तिपा दर्पण से बने अन्दर बहने वाले सूक्ष्म मूल
बीच में गोल सूक्ष्म कण्ठ वाले विस्तृत मुख वाले को मध्य कील के ऊपर रख दे, उसी भांति उसके
अन्तिम कील पर भ्राजस्वद्रावक ?—गन्धक द्राव ? डाल दे और उसके दक्षिण में पार्श्वस्थित दो कीलों
में स्थापित करे, पश्चात् अन्योऽन्य—परस्पर तीन संघर्षण चक्र स्थापित करे, वैसे ही उत्तर दिशा में दो
कीलों के मध्य में कान्त—अयस्कान्त या सूर्यकान्त ?, पारा, अभ्रक के सत्व से कञ्चुक द्राव--सांप की
केंचुली के द्राव ? या चुक—चुक—अम्लवेतस के द्राव में डाल दे, फिर मणियों को यथाशास्त्र उस उस
स्थान में नियुक्त करे ।' १८-२४ ॥
उक्तं हि मणिरत्नाकरे—कहा ही मणिरत्नाकर ग्रन्थ में—
भारद्वाजो साङ्खनिकस्सोर्य्यपिङ्गुलको तथा ॥ २५ ॥
शक्तिपञ्जरक पञ्चज्योतिर्गर्भे इति क्रमात् ।
मणय षड्विधा ज्ञेयाश्शक्त्याकर्षणयन्त्रके ॥ २६ ॥ इत्यादि ॥
भारद्वाज, साङ्खनिक, सौर्य्य, पिङ्गुलक, शक्तिपञ्जरक, पञ्चज्योतिर्गर्भ, ये क्रम से छ' प्रकार की
मणियां शक्त्याकर्षण यन्त्र में जाननी चाहिए ॥ २५-२६ ॥

८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्थाननिर्णयमाह स एव — वह ही स्थाननिर्णय कहता है—
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षके न्यसेत् सौम्यमणिं तथा ।
कुड्यात्रिकोणमध्ये तु मणिं साञ्जनिकं न्यसेत् ॥ २७ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डे न्यसेत् पैङ्गलकं मणिम् ।
नालदण्डस्थछिद्रे ऽथ भारद्वाजमणिं तथा ॥ २८ ॥
भ्राजस्वद्रावके पञ्चज्योतिर्गर्भमणिं न्यसेत् ।
कान्तपाराभ्रजोर्क चुक्रद्रावे शक्तिपञ्जरमिति ॥ २९ ॥
एवं मणीन् स्थापयित्वा तत्तत्स्थाने यथाविधि ।
आदर्शनालसयुक्तान् सर्वकीलान्तरे क्रमात् ॥ ३० ॥
सौम्य मणि को शंकुमूलस्थ पात्र में डाल दे, साञ्जनिक मणि को भित्तित्रिकोण के मध्य में
रख दे, पैङ्गलक मणि को विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड में धर दे, पञ्चज्योतिर्गर्भ मणि को भ्राजस्व द्रावक में
रखदे, शक्तिपञ्जर मणि को कान्त पारे अभ्रक से पूर्ण अम्लवेतस द्राव में रखे । इस प्रकार उस उस स्थान
में यथाविधि मणियों को आदर्शनाल सहित सब कीलों के अन्दर क्रम से स्थापित करके—॥ २७-३० ॥
तन्त्रीन् सन्धारयेत् पश्चान्मूलकेन्द्राद् यथाक्रमम् ।
पश्चात् सञ्चालयेच्चक्रत्रयकीलं यथाविधि ॥ ३१ ॥
तेन दर्पणगोलस्थपिण्डयोरुभयोः क्रमात् ।
परस्परघर्षणं स्यादिति वेगात् स्वभावतः ॥ ३२ ॥
तस्मात् सञ्जायते शक्तिश्शतकक्ष्यौष्णमानतः ।
अथ तच्छक्तिमादाय स्थापयित्वा यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
मणौ साञ्जनिके पश्चात् तन्त्रिभ्यां नालमार्गतः ।
संयोजयेत् ततश्शक्तिस्तन्मणौ लयमेष्यते ॥ ३४ ॥
मणिगर्भस्थशक्त्या सा मिलित्वाथ स्वयं पुनः ।
निस्सरेन्मणिगर्भस्थमुखकेन्द्राद् विशेषतः ॥ ३५ ॥
पश्चात् मूल केन्द्र से यथाक्रम तारों को जोड़ दे, पश्चात् तीन चक्रों की कील को यथाविधि
चलावे उससे दर्पण गोल में स्थित दो पिण्डों का परस्पर घर्षण अति वेग से स्वभाव से हो जावे उससे
सौ दर्जे की उष्णता मान से शक्ति उत्पन्न हो जाती है फिर उस शक्ति को लेकर यथाक्रम स्थापित करके
पश्चात् दो तारों से नालमार्ग द्वारा साञ्जनिक मणि में संयुक्त करे फिर वह शक्ति उस मणि में लय को
प्राप्त हो जाती है । मणिगर्भस्थ शक्ति से वह मिलकर पुनः स्वयं मणिगर्भस्थ मुख केन्द्र से विशेषतः
निकल जावे ॥ ३१-३५ ॥
तमाकृष्य यथाशास्त्रं नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
संयोजयेत् सौरमणौ पूर्ववत् सप्रमाणतः ॥ ३६ ॥

शक्त्यधिकरणम् ] [ ८६
ततस्तन्मणिगर्भस्थशक्त्या सा भिद्यते क्रमात् ।
पञ्चस्रोतस्स्वभावेन व्याप्य तत्रैव तिष्ठति ॥ ३७ ॥
तत्रत्यपञ्चस्रोतस्सु एकस्रोतस्ततः परम् ।
योजयेन्नालतन्त्रीभ्यां भारद्वाजमणौ क्रमात् ॥ ३८ ॥
तथैव पिङ्गलमणावेकस्रोतः प्रमाणतः ।
पञ्चज्योतिर्गर्भमणावेकं तस्तथैव हि ॥ ३९ ॥
एकस्रोतोमणौ शक्तिपञ्जराख्ये नियोजयेत् ।
एवं प्रवेशिताः पञ्च शक्तयो मणिषु स्वतः ॥ ४० ॥
उसे फिर नाल तार मुख से शास्त्रानुसार खींच कर पूर्ववत् सप्रमाण सौर मणि में युक्त करे
फिर वह मणिगर्भस्थ शक्ति से क्रमशः विभक्त हो जाती है पञ्चस्रोत स्वभाव से वहां पर ही व्याप कर
रहती है, वहां पांच स्रोतों में उससे आगे एक स्रोत को दो नालतारों से भारद्वाज मणि में जोड़ दे, उसी
प्रकार एक स्रोत तरङ्ग पिङ्गल मणि में एक स्रोत पञ्चज्योतिर्गर्भमणि में पुन एक स्रोत शक्तिपञ्जर नामक
मणि में नियुक्त कर दे । इस प्रकार मणियों में प्रवेश कराई हुई शक्तिया स्वतः—॥ ३६-४० ॥
एकैकमणिगर्भस्थशक्तिमाकृष्य वेगतः ।
बहिःप्रसारण पश्चात् कुर्वन्ति स्वेन तेजसा ॥ ४१ ॥
मणिसञ्जातशक्तीनां नामान्यत्र यथाक्रमम् ।
यथोक्तमत्रिणा साक्षात्रिरूप्यन्ते तथैव हि ॥ ४२ ॥
राजा मौक्तिकचुण्डीरशून्यगर्भविषोदरा ।
इत्येते मणिसञ्जातशक्तिनामान्यथाक्रमात् ॥ ४३ ॥
एतच्छक्तीस्समाहृत्य भ्राजस्वद्रावके क्रमात् ।
पूर्ववन्नालतन्त्रीभ्यां योजयेत् सप्रमाणतः ॥ ४४ ॥
इमा मणिसमुद्भूतशक्तय स्वेन तेजसा ।
भ्राजस्वद्रावक प्राप्य त्रेधा तत्र प्रभिद्यते* ॥ ४५ ॥
एक एक मणि के गर्भ में स्थित शक्ति को वेग से खींच कर पश्चात् तेज से बांहिर प्रसारित कर
देती है । मणियों में उत्पन्न शक्तियों के नामों को यथाक्रम जैसे अत्रि ने साक्षात् कहे हैं वैसे ही यहां
निरूपित किये जाते हैं । जो कि राजा, मौक्तिक, चुण्डीर, शून्य, गर्भ, विषोदर ये मणियों से उत्पन्न
शक्तियों के नाम यथाक्रम हैं । इन शक्तियों को लेकर क्रम से भ्राजस्व द्रावक ?—गन्धकद्राव ? में पूर्व
की भांति दो नालतारों द्वारा सप्रमाण जोड़ दे । मणि से उत्पन्न ये शक्तियां अपने तेज से भ्राजस्व द्रावक
को प्राप्त कर तीन स्थानों में भिन्न भिन्न हो जाती हैं ॥ ४१--४५ ॥
अत्रिणोक्तप्रकारेण नाम तासा निरूप्यते ।
मार्तण्डरोहिणी भद्रा चेति नामान्यथाक्रमम् ॥ ४६ ॥

  • वचनव्यत्ययोऽत्र ।

६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र

मार्तण्डशक्तिमाकृष्य पश्चाच्छास्त्रविधानतः ।
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रौजकञ्चुकद्रावके ॥ ४७ ॥
तत्रत्यकान्तशक्त्या सा मिलित्वा चञ्चला सती (मति?) ।
अतिवेगात् समुड्डीय गगनाभिमुखी भवेत् ॥ ४८ ॥
तां समाहृत्य विधिवन्नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
विस्तृतास्यादर्शपिण्डगर्भकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ४९ ॥
सूर्यांशून् खतरङ्गस्थशक्तिगर्भान् यथाविधि ।
सच्छिद्रनालदण्डस्योर्ध्वनालात् ततः परम् ॥ ५० ॥

अत्रि के कहे प्रकार से उनका नाम कहा जाता है। मार्तण्ड, रौहिणी, भद्रा ये यथाक्रम हैं।
मार्तण्डशक्ति को खींच कर पश्चात् शास्त्रविधान से कान्त पारा अभ्रक पूर्ण कंचुलीद्राव या अम्बुवेतस-
द्राव में युक्त कर दे, वहां की कान्तशक्ति से मिल कर चञ्चल हुई अतिवेग से उठ कर गगनाभिमुखी हो
जावे। फिर उसे लेकर विधि नालतार के मुख से विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड के गर्भकेन्द्र में जोड़ दे,
आकाशतरङ्गों—आकाशमण्डलों में स्थित शक्तिगर्भ वाली सूर्यकिरणों को यथाविधि छिद्रसहित नाल
दण्ड के ऊपर वाले नाल से—॥ ४६-५० ॥

समाहृत्य विशेषेण तत्रैव स्थापयेद् दृढम् ।
पश्चात् तन्नालमूलस्थकेन्द्रमार्गात् प्रमाणतः ॥ ५१ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डमुखकेन्द्रे प्रवेशयेत् ।
सूर्यांशुशक्तितत्पिण्डं पश्चात् सव्याप्य वेगत ॥ ५२ ॥
तद्गर्भस्थितमार्तण्डशक्त्या सम्मिलिता स्वयम् ।
आकाशाभिमुखी भूत्वा परिभ्राम्यति वर्तुलम् ॥ ५३ ॥
ता समाहृत्य वेगेन विमानखपथि क्रमात् ।
वियत्तरङ्गप्रवाहमुखमध्ये नियोजयेत् ॥ ५४ ॥
एव कृतेथ तच्छक्तिर्व्योमयानविनाशकम् ।
आकाशवीचीसङ्घातविषशक्ति समूलत ॥ ५५ ॥
आकृष्य पीत्वा वेगेन विमान रक्षति स्वयम् ।

—लेकर विशेषतः वहीं पर दृढ़ स्थापित करे, पश्चात् नालमूल में स्थित केन्द्रमार्ग से प्रमाण
से विस्तृतास्य आदर्श पिण्डमुख के केन्द्र मे प्रविष्ट कर दे, सूर्य किरणशक्ति उस पिण्ड को व्याप्त कर वेग
से उसके गर्भ में स्थित मार्तण्डशक्ति से मिली हुई स्वयं आकाशाभिमुखी होकर गोलरूप में घूमती है
उसे वेग से लेकर विमान के आकाशमार्ग में क्रमशः आकाशतरङ्गों के प्रवाहमुख के मध्य में नियुक्त
करे। ऐसा करने पर वह शक्ति आकाशतरंग से उत्पन्न विमानविनाशक विषशक्ति को समूलतः स्वयं
वेग से सर्वथा खींच पीकर विमान की रक्षा करती है ॥ ५१-५५ ॥

अथ तद्रोहिणीशक्तिं समाहृत्य च पूर्ववत् ॥ ५६ ॥

शक्त्यधिकरणं ] [ ६१
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रजकंचुकद्रावके ।
तस्य पाराभ्रशक्तिभ्या मिलित्वा सातिवेगत ॥ ५७ ॥
उड्डीयोड्डीय वेगेन गगनाभिमुखी भवेत् ।
विधिवत् ता समाहृत्य नालतन्त्रीमुखात् पुनः ॥ ५८ ॥
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षकमूलकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तथा विमानसञ्चाररेखामार्गाद् यथाविधि ॥ ५९ ॥
तत्रत्यवातावृत्तस्थशक्तिगर्भान् सुसूक्ष्मकान् ।
आदित्यकिरणान् पश्चाद् यथाशास्त्र मरुन्मुखात् ॥६०॥
समाहृत्य प्रमाणेन च(छ ?)षकास्ये नियोजयेत् ।
उस रोहिणी शक्ति को लेकर कान्त पारा अभ्र से पूर्ण कञ्चुकद्राव में पूर्व की भांति युक्त करे
उसकी पारा अभ्र शक्तियों से वेग से मिल कर वेग से उड उड कर आकाश के अभिमुख हो जावे उसे
विधिवत् नालतार के मुख से लेकर शङ्कुमूलस्थित पात्रमूल केन्द्र मे युक्त करे तथा विमान के सञ्चार
रेखा मार्ग से यथाविधि वहा के वायुचक्र—वायुमण्डल में स्थित शक्तिगर्भ से सूक्ष्म सूर्यकिरणों की
वायुमुख से यथाशास्त्र प्रमाण से लेकर पात्र के मुख में नियुक्त कर दे ॥ ५६-६० ॥
ततस्समग्र तच्छक्तिर्व्याप्य त स्वेन तेजसा ॥ ६१ ॥
तत्रत्यरोहिणीशक्त्या मिलित्वा वेगतस्स्वयम् ।
गगनाभिमुखी भूत्वा वेगात् सम्भ्राम्यति स्वयम् ॥६२॥
तत्रैव स्थाप्य तच्छक्ति तन्त्रिभ्या सप्रमाणतः ।
उदीचीपार्श्वकीलस्थमूलकेन्द्रान्तरात् पुनः ॥ ६३ ॥
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षकमध्यकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तद्गर्भस्थितरोहिण्या मिलित्वा वेगतस्स्वयम् ॥ ६४ ॥
आकाशाभिमुखी भूत्वा परिभ्राम्यति तेजसा ।
विधिवत् ता समाहृत्य विमानपथि क्रमात् ॥ ६५ ॥
वातावर्तमुले पश्चाद् योजयेन्नालमार्गतः ।
फिर उस समग्र पात्र को वह शक्ति अपने तेज से व्याप्त कर वहां की रोहिणी शक्ति से स्वयं
वेग से मिल कर आकाश के अभिमुख होकर वेग से घूमती है वहां की उस शक्ति को दोनों तारों से
सप्रमाण स्थापित करके उत्तर दिशा के पार्श्वकीलस्थ मूलकेन्द्र से फिर शंकुमूलस्थ पात्र के मध्य केन्द्र में
नियुक्त करे । उसके गर्भ में स्थित रोहिणी से वेग से स्वयं मिल कर आकाश के अभिमुख होकर तेज
से घूमती है उसे विमान के आकाशमार्ग में लेकर पश्चात वायु के घूममुख में नालमार्ग से युक्त
कर दे ॥ ६१-६५ ॥
तच्छक्तिर्वातसम्बन्धविषशक्ति समूलतः ॥ ६६ ॥
नाशयित्वा खेटयानं स्वभाद् रक्षति स्वयम् ।
तथैव भद्रामाकृष्य सुरघानालतः क्रमात् ॥ ६७ ॥

६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रोजकञ्चुकद्रावके ।
तस्योर्जंकञ्चुकशक्त्या सा मिलित्वातिवेगतः ॥ ६८ ॥
आकाशाभिमुखी भूत्वा चक्रवद् भ्राम्यति स्वयम् ।
ततस्तच्छक्तिसमाहृत्य कुड्यमूलस्थकेन्द्रके ॥ ६९ ॥
सतन्त्रीनालमार्गेण योजयेद् विधिपूर्वकम् ।
पश्चात् खे यानसञ्चारमार्गात् प्रमाणात् ॥ ७० ॥
तत्र रौद्रीसम्बन्धशक्तियुक्तान् सुसूक्ष्मकान् ।
समाहृत्यार्ककिरणान् पिञ्जलामार्गत क्रमात् ॥ ७१ ॥
यह शक्ति वात सम्बन्ध विषशक्ति को समूलतः नष्ट करके स्वयं विमान की रक्षा करती है, उसी
प्रकार सुरघा नाल से भद्रा को क्रम से खींच कर कान्त पारा अभ्रक पूर्ण कञ्चुकद्राव में युक्त करवे, उसके
ऊर्ज कञ्चुक शक्ति से वह मिल कर अतिवेग से आकाश के अभिमुख होकर चक्र की भांति स्वयं घूमती
है फिर उस शक्ति को लेकर भित्तिमूलस्थ केन्द्र में तारोंसहित नालों के मार्ग से विधिपूर्वक युक्त कर दे
पश्चात् आकाश में विमान के सञ्चाररेखामार्ग से प्रमाण से वहां के रौद्री सम्बन्ध शक्तियुक्त सूक्ष्म सूर्य-
किरणों को पिञ्जुलामार्ग से—॥ ६६-७१ ॥
सच्छिद्रनालाध केन्द्रमूले नियोजयेत् ।
दण्डकेन्द्रात् पुनस्तन्त्रीनालमार्गात् प्रमाणात् ॥ ७२ ॥
समाकृष्य किरणशक्तिं सम्यग् यथाविधि ।
त्रिकोणादर्शकुड्याधो दक्षकेन्द्रमुखे न्यसेत् ॥ ७३ ॥
पश्चात् समग्रं तत्कुड्य व्याप्य वेगेन सा क्रमात् ।
तच्छक्त्याकर्षणात् तस्या मिलित्वा भ्राम्यति स्वयम् ॥७४॥
पश्चात् तां तन्त्रिनालेन सप्रमाणाद् यथाविधि ।
समादाय विशेषेण बाह्यवायुविवर्जिताम् ॥ ७५ ॥
छिद्रसहित नालों के नीचे केन्द्रमूल में नियुक्त करे, फिर दण्डकेन्द्र से तन्त्रीनालमार्ग से प्रमाण
से किरणशक्ति को यथाविधि सम्यक् खींचकर त्रिकोणदर्पण की भित्ति से नीचे केन्द्रमुख में लगावे
पश्चात् वह समग्र उस भित्ति को वेग से क्रम से व्याप कर उस शक्ति के आकर्षण से उस में मिलकर
स्वयं घूमती है पश्चात् उस शक्ति को तारों के नाल से सप्रमाण यथाविधि विशेषतः बाह्य वायु से रहित
होकर—॥७२-७५ ॥
कुड्यदक्षिणपार्श्वस्थमुखकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तद्गर्भकुड्यादुड्डीय तच्छक्त्या मिलिता सती ॥ ७६ ॥
परिभ्राम्यति वेगेन गगनाभिमुख यथा ।
तामादायाथ विधिवद् विमानखपथि क्रमात् ॥ ७७ ॥

शक्त्यधिकरणम् ] [ ६३
रौद्रघावंतमुखे सम्यग् योजयेन्नालमार्गत ।
एव ,कृतेथ तद्रौद्रीविषशक्ति समूलत ॥ ७८ ॥
स्वतेजसा निवार्याय विमान रक्षति स्वयम् ।
एव शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्र च तत्क्रियाम् ॥ ७९ ॥
यथाशास्त्रं निरूप्याय सग्रहेण यथाविधि ।
परिवेषक्रियायन्त्रमुच्यतेत्र यथाक्रमम् ॥ ८० ॥
भित्ति के दक्षिणपार्श्वस्थ मुखकेन्द्र में नियुक्त करे । उस गर्भभित्ति से —मध्यभित्ति से उठकर
उस शक्ति से मिली हुई गगनाभिमुख वेग से घूमती है फिर उसे विधिवत् लेकर विमान के आकाशमार्ग
में क्रम से रौद्री के घूममुख में भली प्रकार नालमार्ग से युक्त करे, ऐसा करने पर वह रौद्री विषशक्ति को
समूलत अपने तेज से निवृत्त करके स्वयं विमान की रक्षा करती है । इस प्रकार शक्त्याकर्षण दर्पणयन्त्र
और उसकी क्रिया को शास्त्रानुसार संक्षेप से यथाविधि निरूपित करके परिवेषक्रियायन्त्र यहा यथाक्रम
कहा जाता है ॥ ७६-८० ॥
परिवेषक्रियायन्त्र विचार . — परिवेषक्रियायन्त्र का विचार करते हैं —
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे —यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
पञ्चशक्तिसमायोगात् परिवेषो यथा भवेत् ।
तथाम्बरे विमानस्य कृत्वा शास्त्रविधानत ॥ ८१ ॥
अविनाभावतस्तेनार्ककिरणविमनयो ।
परिवेषमुखेनेव संयोज्याथ परस्परम् ॥ ८२ ॥
विधायाधीनता सूर्यकिरणाना यथाविधि ।
विमानाकर्षण रेखामार्गातिक्रमण विना ॥ ८३ ॥
यथा भवेत् तथा सम्यग् य करोति स्वभावत ।
परिवेषक्रियायन्त्र इति तत्सम्प्रचक्षते ॥ ८४ ॥
पांच शक्तियों के सम्बन्ध से विमान का आकाश में परिवेष जिससे हो जावे वैसे शास्त्र-
विधान से अनिवार्य भाव से करके सूर्यकिरणों और विमान के बीच में परिवेष मुख से ही परस्पर संयुक्त
करके सूर्यकिरणों को यथाविधि रेखामार्ग के अधीन करके अतिक्रमण किए बिना विमान का आकर्षण
जिससे हो जावे वैसे भली प्रकार जो स्वभावत करता है वह परिवेषक्रियायन्त्र है ऐसा कहते हैं ॥८१-८४॥
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है—
पञ्चशक्तिप्रयोगेण (न ?) परिवेष स्वभावत ।
कल्पयित्वा विमानस्य तेनार्ककिरणान् क्रमात् ॥ ८५ ॥
समाकृष्य विशेषेण विमानोपरि वेगतः ।
संयोज्य पश्चात् तत्सूर्यकिरणाधीनतां क्रमात् ॥ ८६ ॥
कृत्वा सम्यग् विमानाना स्वपथातिक्रमण विना ।
यत्प्रयच्छति सञ्चारे वेगं तच्छास्त्रतः स्फुटम् ॥ ८७ ॥

६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
परिवेषक्रियायन्त्रमिति संकीर्त्यते बुधै ॥ ८८ ॥ इति
पांचशक्तियों के प्रयोग से विमान के परिवेष को स्वभावतः बनाकर उस से सूर्यकिरणों को क्रम
से पूर्णरूप से खींचकर विमान के ऊपर वेग से संयुक्त करके पश्चात् उन सूर्यकिरणों की अधीनता को
कम से करके—सूर्यकिरणों को क्रम से अधीन करके सम्यक् विमानों के स्वपथ के अतिक्रमण के बिना
जो सञ्चार में वेग प्रदान करता है वह शास्त्र से स्फुट परिवेषक्रियायन्त्र विद्वानोंद्वारा कहा जाता
है ॥ ८५-८८ ॥
सौदामिनीकलायामपि—सौदामिनीकला में भी कहा है—
सू० क्षजलभहशक्तिसंयोगात् किरणाकर्षणम् ॥ इति ।
क्ष ज ल भ ह शक्तियों के संयोग से किरणों का आकर्षण होता है ।
गोप्यकारिका—गोप्यकारिका है—
शिरीषमेघभूताराकाशाना शक्तय क्रमात् ।
शास्त्रेस्मिन् क्ष ज ल भ ह वर्णैस्साङ्केततस्स्मृत ॥ ८६ ॥
आसा सम्मेलन कृत्वा प्रयोगदम्बरे स्फुटम् ।
परिवेषो† भवेत्सम्यगादित्यस्य यथा घने ॥ ६० ॥
तेनार्ककिरणाकर्षण भवेन्नात्र सशय ॥ इति
शिरीष ?-इन्द्र ?-विद्युत् ?, मेघ, भू-पृथिवी, तारा-ग्रह, आकाश इन पांचों की शक्तियां क्रम
से इस शास्त्र में क्ष, ज, ल, भ, ह वर्णों-अक्षरों से सङ्केतकृत कही हैं। इनका सम्मेलन करके प्रयोग
से आकाश में सूर्य के घनों ?-किरणों ? से परिवेष हो जावे, तिस से किरणों का आकर्षण हो जावे
इस में सन्देह नहीं ॥ ८६-६० ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
शिरीषशक्तेर्द्वा भागौ घनस्याष्टावितीरित ॥ ६१ ॥
भूशक्ते पञ्च नक्षत्रशक्तेस्सप्त तथैव हि ।
दशान्तरिक्षशक्ते स्यादिति शास्त्रविनिर्णय. ॥ ६२ ॥
शक्त्याकर्षणयन्त्रेणैव सम्यग् यथाविधि ।
समाहृत्य विशेषेण निर्वात स्थापयेत् क्रमात् ॥ ६३ ॥
पश्चात्तद्द्योमयानोर्ध्वकेन्द्राद्दर्शान्तरे स्फुटम् ।
प्रतिबिम्बितसूर्यस्य प्रकाशकिरणैस्सह ॥ ६४ ॥
संयोजयेत् तत्पूर्वक पञ्चशक्तीर्यथाविधि ।
एव कृतेम्बरे सम्यक् परिवेषो भवेद् ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
तेनाम्बरन्गेशक्तिकिरणाकर्षणं क्रमात् ।
वेगाद् भवति तान् पश्चाद् विमानोपरिशाखतः ॥ ६६ ॥
परिवेषमुखेनेव योजयेच्चेद् यथाविधि ।
† घोत्स ?

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६५
भवेत् तत्सूर्यकिरणैस्सूत्रबद्धोण्डजादिवत् ॥६७॥
विमानाकर्षण सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय । इत्यादि ।
शिरीषशक्ति के दोभाग मेघशक्ति के आठ भाग कहे हैं भू-पृथिवी शक्ति के पांच भाग तारा-
शक्ति के सात आकाशशक्ति के दश भाग हों, यह शास्त्र का निर्णय है, शक्त्याकर्षण यन्त्र से ही भली
प्रकार यथाविधि इन्हें विशेषतः खींच कर निर्वात स्थापित करे। पश्चात् विमान के ऊपर केन्द्र आदर्श
के अन्दर प्रतिबिम्बित सूर्य की प्रकाराकिरणों के साथ पूर्वोक्त पांच शक्तियों को संयुक्त कर दे ऐसा
करने पर आकाश में सम्यक् परिवेष होजावे उस आकाशमणि शक्ति से किरणों का आकर्षण क्रम से
होजाता है, परिवेषमुख से ही यथाविधि युक्त करे तो सूर्य-किरणों से विमानाकर्षण सम्यक् सूत्र से बन्धे
अण्डज—पक्षी की भांति होजावे यह शास्त्र का निर्णय है ॥ ६१-६७॥
परिवेषक्रियायन्त्रमुक्त्वा यथाविधि ॥६८॥
अथ तद्यन्त्ररचनाविधिरत्र निरूप्यते ॥६६॥
परिवेषक्रियायन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब उस यन्त्र की रचनाविधि यहां कही
जाती है ॥ ६८-६६ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
अथ यन्त्राङ्गानि ॥ अ० सू० ॥ १
अथ यन्त्र के अङ्ग कहे जाते हैं।
पीठ तत्र त्रयोविंशत्केन्द्राणि च तथैव हि ।
रेखाप्रसारणं तत्तत्केन्द्रस्वरूपानुसारत ॥१००॥
तावदेवावर्तकीलास्तन्त्रीनालास्तथैव हि ।
त्रिचक्रनालस्तम्भश्च द्रावकाष्टकमेव च ॥१०१॥
तथा मण्यष्टक द्रावपात्राष्टकमत परम् ।
शिरीषघनभूम्यादिशक्त्याकर्षणदर्पणा ॥१०२॥
पञ्च विद्युच्छक्तियन्त्रं तु (स्वत् ?) पञ्चकमत परम् ।
औदुम्बरावृत्ततन्त्रीरन्ध्रगर्भा सकीलका ॥१०३॥
आम्रणीकोलकाश्चैव सतन्त्रीकीलकान्विता ।
शक्तिस्थापनापात्राणि तत्सम्मेलनपात्रकम् ॥१०४॥
धूमप्रसारणयन्त्र वातसंयोजक तथा ।
परिवेषक्रियानाल क्षीरचर्मप्रकल्पितम् ॥१०५॥
पीठ, उसमें १३ केन्द्र तथा केन्द्र संख्यानुसार रेखाएं बनाना, उतने ही घूमने वाले पेंच और
तारों के नाल, त्रिचक्रनाल का स्तम्भ, ८ द्रावक, ८ मणियां, ८ द्रावक पात्र, शिरीष मेघ भू आदि
शक्तियों का आकर्षण दर्पण, ५ विद्युत्-शक्ति, ५ यन्त्र, ताम्बे के बने लिपटे तारों और अन्दर छिद्रवाली
कीलें, घुमाने वाले पेंच तारों सहित कीलों से युक्त, शक्तिस्थापन पात्र, उनके मिलाने वाला पात्र, धूम
फैलाने वाला यन्त्र और वातसंयोजक यन्त्र, दूध के चर्म से बना हुआ परिवेषक्रियानाल ॥१००-१०५॥

६६ ] बृहद् विमानशास्त्र
तथाऽर्ककिरणाकर्षणदर्पणाप्रकल्पितम् ।
नालमेक ततो यानस्योर्ध्वकेन्द्रस्य दर्पणे ॥१०६॥
प्रतिबिम्बितसूर्यस्य किरणाकर्षकायुतम् ।
नालमेक व्योमयानशिरोमणिरत परम् ॥१०७॥
सन्धानकीलक सूर्यकिरणाना विमानके ।
इति त्रयोविंशदङ्गान्युकानि स्युर्यथाक्रमम् ॥१०८॥
एवमुक्त्वा विमानाङ्गान्यथ तद्रचनाक्रमम् ।
सग्रहेण यथाशास्त्र समालोढ्य प्रचक्षते ॥१०६॥
वितस्तिद्वादशायाम विस्तृत तावदेव हि ।
आदौ प्रकल्पयेत् कृष्णपिप्पलदारुणा ॥११०॥
तथा सूर्य किरणाकर्षणदर्पण से बना एक नाल, फिर ऊर्ध्व केन्द्र के दर्पण में प्रतिबिम्बित
सूर्य के किरणाकर्षक से युक्त एक नाल, विमान की शिरोमणि, विमान में सूर्य किरणों को जोड़ने वाली
कील, ये २३ अङ्ग कहे हैं। इस प्रकार विमान के अङ्गों को कहकर उनके रचना-क्रम को सङ्क्षेप से
शास्त्रानुसार आलोड़न करके कहते हैं। १२ बालिशत लम्बा उतना ही चौड़ा पहिले कृष्णपिप्पल की लकड़ी
से बनावे ॥ १०६—११० ॥
पञ्चत्रिंशतिमादर्शवरघेनावृत यथा ।
पश्चात् तस्मिन् त्रयोविंशत्केन्द्राणि परिकल्पयेत् ॥१११॥
तत केन्द्रानुसारेण कुर्याद् रेखाप्रसारणम् ।
रेखानुसारत केन्द्रस्थानेष्वथ यथाविधि ॥११२॥
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
दर्पणेन कृतान् नालान् गर्भ तन्त्रीसमन्वितान् ॥११३॥
केन्द्रात् केन्द्रान्तरावर्तकीलमूलावधिक्रमात् ।
रेखामार्गानुसारेण प्रत्येक योजयेत् तत ॥११४॥
वितस्तिपञ्चकायाम गात्रे त्वेकवितस्तिकम् ।
मध्ये वितस्त्यष्टकमानगात्रेण समाकुलम् ॥११५॥
३५ वें आदर्श-दर्पण के बने आवरण से आवृत-ढका या घिरा हुआ, फिर उसमें २३ केन्द्र
बनावे, फिर केन्द्रानुसार रेखा प्रसारण करे, रेखानुसार केन्द्र स्थानों में यथाविधि घूमने वाले पेंच दृढ़
स्थापित करे, दर्पण से बनाए नालों को जिनके गर्भ में तार हों उन्हें केन्द्र से केन्द्र की अवधि तक क्रम
से रेखामार्गानुसार प्रत्येक को रखे जो पांच बालिशत लम्बा मोटा एक बालिशत मध्य में ८ बालिशत
मोटाई से युक्त हो ॥ १११—११५ ॥
तथैव कण्ठेष्टादशाङ्गुलगात्रसमन्वितम् ।
मूले वितस्तिप्रमाणगात्रदण्डविराजितम् ॥११६॥

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६७
वितस्तिदशविस्तारास्ययुक्तं मनोहरम् ।
सप्तत्रिंशतिमादर्शनालस्तम्भ यथाविधि ॥११७॥
त्रिचक्रकीलैस्संयोज्य तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ।
तस्येशान्यक्रमादष्टद्रावकान् दिक्षु विन्यसेत् ॥११८॥
तद्द्नावकाभिधानानि यथोक्तान्यत्रिणा क्रमात् ।
तान्येवात्र प्रवक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥११६॥
कण्टक कान्तजस्तार्थ्यो नागो गौरी विपन्ध्यय ।
खद्योतो ज्वलनश्चेति वर्णिता द्रावका क्रमात् ॥१२०॥
उसी प्रकार कण्ठ में १८ अंगुल मोटा, मूल में बालिश्तभर मोटे दण्ड से युक्त १० बालिश्त
चौड़े मुखवाला सुन्दर ३७ वें आदर्श से बना नालस्तम्भ यथाविधि, तीन चक्रोंवाले कीलों से युक्त करके
उनके मध्य में स्थापित करे, उसके ईशान्य क्रम से ८ द्रावकों को ८ दिशाओं में रखे उन द्रावकों के
नाम जैसे अत्रि ने कहे हैं क्रम से उन्हें ही यहां विचार कर यथामति कहूंगा वे ई 'कण्टक, कान्तज,
ताक्ष्यं, नाग, गौरी, विपन्ध्यय, खद्योत, ज्वलन,' ये द्रावक कहे हैं ॥ ११८-१२० ॥
विज्ञप्ति—१२१ से १२७ श्लोक अप्राप्त हैं।
कान्तजद्रावक पारादर्शपात्रे प्रपूरयेत् ॥ १२८ ॥
विरिञ्च्यादर्शपात्रेथ नागद्रावक तयैव हि ।
स्फुटिकादर्शपात्रे तु खद्योतद्रावकं न्यसेत् ॥ १२६ ॥
वालुकादर्शपात्रेथ गौरीद्राव प्रपूरयेत् ।
सुरग्रन्थिकादर्शपात्रे विपन्ध्यद्रावकम् ॥ १३० ॥
पञ्चमृद्दर्पणपात्रे ज्वलनद्रावकं न्यसेत् ।
अष्टपात्रे ष्वष्टद्रावान् सम्पूर्य विधिवत् क्रमात् ॥ १३१ ॥
उक्ताष्टदिक्षु विधिवत् विन्यसेत् सुदृढं यथा ।
अष्टदिक्ष्वष्टपात्रस्थाष्टद्रावकेष्वध क्रमात् ॥ १३२ ॥
संयोजयेदष्टमणीन् मणिप्रकरणेरितान् ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥ १३३ ॥
कान्तज द्रावक को पारादर्शपात्र में भर दे, नागद्रावक को विरिञ्च—आदर्श पात्र में, खद्योत-
द्रावक को स्फुटिकादर्श पात्र में रख दे, गौरीद्रावक को बालुकादर्श पात्र में, विपन्ध्यद्रावक को सुरग्रन्थि-
कादर्श पात्र में, ज्वलनद्रावक को पञ्चमृद्दर्पण पात्र में, भर कर क्रम से उक्त आठ दिशाओं में रख दे ।
आठ दिशाओं में आठ पात्रस्थ आठ द्रावकों में नीचे के क्रम से मणिप्रकरण में कही आठ मणियों को
संयुक्त करे, उनके नाम विवेचन करके यथामति कहूँगा ॥ १२८-१३३ ॥
तदुक्तं मणिप्रकरणे—वह कहा है मणिप्रकरण में—

६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धूमास्यो घनगर्भश्च शल्याकश्शारिकस्तथा ।
तुवास्यस्सोमकश्शङ्खौशुपश्चेत्यष्टधा स्मृता ॥ १३४ ॥
मणीना नामधेयानि एवमुक्त्वा यथाक्रमम् ।
विनियोग प्रवक्ष्यामि तेषा शास्त्रोक्तवर्त्मना ॥ १३५ ॥
रुक्मद्रावे तु धूमास्यमणि मध्ये विनिक्षिपेत् ।
तथैव कान्तजद्रावे घनगर्भमणि न्यसेत् ॥ १३६ ॥
काष्ण्यंद्रवेथ शल्याक शारिक नागद्रावके ।
गौरीद्रावके तुषास्य च शङ्ख ज्वलनद्रावके ॥ १३७ ॥
विन्ध्यद्रायकेथ सोमक तद्वदेव हि ।
खद्योतद्रावके पश्चादशुपारूयमणि क्रमात् ॥ १३८ ॥
एवमष्टमणीनष्टद्रावेषु नियोजयेत् ।
पश्चात् तेषा पुरोभागे समरेखान्तरे क्रमात् ॥ १३९ ॥
स्थापयेद् विधिवच्छुद्धान् शल्याकर्पणदर्पणान् ।
भरद्वाजोक्तनामानि तेषामत्र यथाक्रमम् ॥ १४० ॥
प्रवक्ष्यामि समालोच्य सग्रहेण यथामति ॥ १४१ ॥
धूमास्य, घनगर्भ, शल्याक, शारिक, तुषास्य, सोमक, शङ्ख, अशुप ये आठ प्रकार की कही हैं ।
यथाक्रम मणियों के नाम कहे हैं उनके विनियोग को शास्त्रोक्त मार्ग से कहूंगा । धूमास्य मणि को तो
रुक्म द्राव में डाल दे, घनगर्भ मणि को कान्तज द्राव में, शल्याक मणि को काष्ण्य द्राव में, शारिक मणि
को नागद्राव में, तुषास्य मणि को गौरीद्राव में, शङ्खमणि को ज्वलनद्रावक मे, सोमक मणि को विन्ध्य
द्रावक में, अ शुप मणि को खद्योत द्राव में । इस प्रकार आठ मणियों को आठ द्रावकों में नियुक्त करे
फिर उनके सामने वाले भाग में समान रेखान्तर में क्रम से विधिपूर्वक शुद्ध दर्पणों को स्थापित करे ।
भरद्वाज के कहे उनके नाम यथाक्रम विवेचन कर संक्षेप से यथामति कहूंगा ॥ १३४-१४१ ॥
तदुक्त दर्पणप्रकरणे-वह कहा है दर्पणप्रकरण में-
तारास्योपवनास्यश्च धूमास्यो वारुणास्यक ।
जलगर्भोग्निमित्रश्च छायास्यो भानुकण्ठक ॥ १४२ ॥
इति दर्पणनामानि कीर्तितान्यष्टधा क्रमात् ।
एवमुक्त्वाष्ट नामानि दर्पणाना यथाक्रमात् ॥ १४३ ॥
अथ तेषा यथाशास्त्र विनियोगक्रमोच्यते* ।
धूमास्यमणिरेखाया विहायाय षडङ्गुलम् ॥ १४४ ॥
तारास्यदर्पण तत्र मणोरभिमुख यथा ।
स्थापयेदूर्ध्वप्रदेशे कीलकयुक्तशलाकया ॥ १४५ ॥
• क्रम उच्यते-क्रमोच्यते सन्धिराषं ।

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६६
घनगर्भमणे प्रान्तरेखायामपि पूर्ववत् ।
स्थापयेत् पवनास्याख्यदर्पण सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
धूमास्यदर्पण शल्याकरेखाया तथैव हि ।
वारुणास्यदर्पण तु रेखाया शारिकामणे ॥ १४७ ॥
तथा सोमरेखाया जलगर्भाख्यदर्पणम् ।
तुषाम्यमणिरेखायामग्निमित्राख्यदर्पणम् ॥ १४८ ॥
तारास्य, पवनास्य,धूमास्य, वारुणास्य, जलगर्भ, अग्निमित्र, छायास्य ये आठ प्रकार के दर्पण
नाम कहे हैं । इस प्रकार दर्पणों के यथाक्रम नाम कह कर उनका यथाशास्त्र विनियोग क्रम कहा जाता
है । धूमास्य मणि की रेखा में छ अ गुल छोड़ कर तारास्य दर्पण को मणि के सम्मुख ऊपर प्रदेश में
कील से युक्त शलाका से रखे, घनगर्भ मणि की प्रान्त रेखा में पवनास्य दर्पण को स्थापित करे, धूमास्य
दर्पण को शल्याक मणि की रेखा में तथा वारुणास्य दर्पण को शारिकमणि की रेखा में तथा जलगर्भ
नामक दर्पण को सोमक मणि की रेखा में अग्निमित्र नामक दर्पण को तुषास्य मणि की रेखा में सीध
में रखे ॥ १४२-१४८ ॥
छायास्यदर्पण शङ्खमणिरेखान्तरे तथा ।
अ शुपमणिरेखाया भानुकण्ठदर्पणम् ॥ १४६ ॥
एव क्रमेण विधिवत् पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ।
स्थापयेच्छक्त्याकर्षणदर्पणान् सुदृढान् क्रमात् ॥ १५० ॥
अथ तत्पश्चिमे केन्द्रे शक्तितन्त्रे भिवर्णितम् ।
नवम स्थापयेद् विद्युच्छक्तियन्त्र सकीलकम् ॥ १५१ ॥
अथ ताम्रावर्ततन्त्रीन् चर्मपञ्चके वेष्टितान् ।
प्रसारयेच्छक्तियन्त्रात् सर्वत्र विधिवत् समम् ॥ १५२ ॥
त्वक्पञ्चकस्य नामानि सग्रेहेण यथामति ।
क्रियासारोक्तरीत्यात्र कथ्यन्तेन्विष्य च क्रमात् ॥ १५३ ॥
गे (घे ?) ण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणा च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि मुनिभिशास्त्रवित्तमै ॥ १५४ ॥
छायास्य दर्पण को शङ्ख मणि की सीध में तथा भानुकण्ठ दर्पण को अशुप मणि की रेखा में
रखे । इस प्रकार विधिपूर्वक पूर्वोक्त मार्ग से शक्त्याकर्षण दर्पणों को स्थापित करे । फिर उनके पश्चिम
केन्द्र में शक्तितन्त्र में वर्णित नवम विद्युत्—शक्ति यन्त्र को कीलसहित स्थापित करे, पुन ताम्बे से
घिरे तारों को पाच चर्म में लिपटे हुओं को शक्ति यन्त्र से विधिवत् समानरूप में प्रसारित करे, पांच
चर्मों के नाम संक्षेप से यथामति क्रियासार ग्रन्थ की रीति से यहां खोजकर कहे जाते हैं । गेण्डा, कछवा,
श्वाखु, शश, नाका यथाक्रम पांच चर्म शास्त्रज्ञ मुनियों ने कहे हैं ॥ १४६-१५४ ॥
—••—❖—••—

हस्तलेख रजिस्टर २, कापी संख्या ७—
त्वङ्निर्णयाधिकारेपि—त्वचा के निर्णय-अधिकार में भी कहा है—
आसनार्थं द्रावकाणां तन्त्रीणां वेष्टनाय च ।
पञ्च चर्माणि शास्त्रेषु प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ १ ॥
गेण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणां च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि वेष्टनासननिर्णये ॥ २ ॥ इत्यादि ॥
विमान में आसनार्थ और द्रावकतारों के लपेटने के लिए पांच चर्म शास्त्रों में विशेष ज्ञानी जनों
ने कहे हैं । गेण्डा, कछुवा, कुत्ता, चूहा शश, मगर के यथाक्रम पांच चर्म वेष्टन आसन के निर्णयप्रसंग
में कहे हैं ॥ १-२ ॥
चर्मवेष्टिततन्त्रीभिर्विद्युच्छक्तिप्रसारणम् ।
कुर्याच्छास्त्रानुसारेण समयोचितकर्मसु ॥ ३ ॥
भ्रामणीकीलकं पश्चात् स्थापयेद् द्वादशान्तरे ।
एतत्सञ्चालनात् सर्वकेन्द्रकीलप्रचालनम् ॥ ४ ॥
यथा भवेत् तथा सम्यक् शास्त्रदृष्टेन वर्त्मना ।
अथ तच्चलनमार्गमनुसृत्य यथाविधि ॥ ५ ॥
चर्म से लिपटे तारों से विद्युत्-शक्ति का प्रसार शास्त्रानुसार समयोचित कार्यों में करे,
द्वादश (बालिश्त) के अन्तर पर या १२ कीलों के मध्य भ्रामणी—घुमाने वाली कील स्थापित करे इसके
सञ्चालन से सब केन्द्र कीलों का प्रचालन जिससे हो जावे वैसे सम्यक् शास्त्रदृष्ट मार्ग से उनके चलन-
मार्ग का यथाविधि अनुसरण करके—॥ ३-५ ॥
नवमे चाष्टमे केन्द्रे दशमेथ त्रयोदशे ।
द्वादश्यां* षोडशे पञ्चदशैकादशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
एतेष्वष्टसु केन्द्रेषु तत्तद्रेखानुसारतः ।
शक्तिस्थापनपात्राणि स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ ७ ॥
एवमष्टसु केन्द्रेषु शक्तिपात्राण्यथाक्रमम् ।
संस्थाप्य पश्चात् तत्सम्मेलपात्रं यथाविधि ॥ ८ ॥

  • अत्र लिङ्गव्यत्यय ।

वातसंयोजकाधिकरण ] [ १०१
त्रयोविंशत्केन्द्रेखावर्त्तकीलमुखे न्यसेत् ।
अथ तद्दक्षिणे पार्श्वे एकोनविंशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
वातसंयोजकं पात्रं स्थापयेत् सुदृढं यथा ।
नौवें आठवें दशवें बारहवें सोलहवें पन्द्रहवें ग्यारहवें केन्द्र में, इन आठ केन्द्रों में उस उस
रेखानुसार शक्तिस्थापन यन्त्र सुदृढ़ क्रम में स्थापित करे । इस प्रकार आठ केन्द्रों में शक्तिपात्र यथाक्रम
स्थापित करके पश्चात् उनके सम्मेलन पात्र को भी यथाविधि तेरहवें केन्द्र रेखावर्तकीलमुख—रेखा पर
घूमने वाले पेंच के मुख में लगा दे । फिर दक्षिण पार्श्व में उन्नीसवें केन्द्र में वातसंयोजक यन्त्र को
सुदृढ़ स्थापित करे ॥ ६-६ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
विद्युत्तन्त्रीसमायोगाच्छतलिङ्गप्रमाणात ॥ १० ॥
भ्राम्यमाणं पञ्चचक्रैस्संयुतं मध्यकेन्द्रके ।
पूर्वपश्चिमकेन्द्रस्थमुखभागे यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
सभस्त्रिकादण्डनालयुग्मकीलैर्विराजितम् ।
वातकोशद्वयाविष्ठमास्यत्रयसमन्वितम् ॥ १२ ॥
वातस्तम्भनषट्‌चक्रकीलकेस्सुविराजितम् ।
तथा प्रसारणीनालकीलकद्वयमण्डितम् ॥ १३ ॥
वेगातिवेगसूक्ष्मातिसूक्ष्मशान्तादिकील्कै ।
सचक्रैर्भ्राजमानं कमठाकारवत् स्थितम् ॥ १४ ॥
भारद्वयसमायुक्तमूर्ध्वचक्रविराजितम् ।
वातसंयोजकयन्त्रमित्युच्यते बुधै ॥ १५ ॥ इत्यादि ॥
विद्युत्—तारों के सम्बन्ध से सौ डिग्री माप से घुमाये हुए—घूमते हुए पांच चक्रों से संयुक्त
मध्य केन्द्र में पूर्व पश्चिम केन्द्र स्वमुख भाग में यथाक्रम भस्त्रिका दण्ड की दो नालों की कीलों से
विराजित दो वात कोश में आविष्ट तीन मुखों से युक्त वातस्तम्भन छ चक्र कीलों से सुविराजित तथा
प्रसारणी—वातप्रसारणी नाल की दो कीलों से सुसज्जित चक्रसहित वेग अतिवेग सूक्ष्म अतिसूक्ष्म
शान्त आदि कीलों से प्रकाशमान कमठाकार कच्छुवे या घड़े के आकार की भांति स्थित दो भागों से
युक्त ऊपर चक्रवाला वातसंयोजक यन्त्र बुद्धिमानों द्वारा कहा जाता है ॥ १०-१५ ॥
धूमप्रसारणयन्त्रविचार —धूमप्रसारणयन्त्र विचार प्रस्तुत करते हैं—
एवमुक्त्वा वातसंयोजकयन्त्रमत परम् ।
धूमप्रसारणयन्त्रं समग्रेण निरूप्यते ॥ १६ ॥
आस्यत्रयं पञ्चगर्भकोशं (श ?) भ्रकावृते(कै?)र्युतम् ।
कीलकत्रयसंयुक्तं शक्तिनालेन वेष्टितम् ॥ १७ ॥