बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रोजकञ्चुकद्रावके ।
तस्योर्जंकञ्चुकशक्त्या सा मिलित्वातिवेगतः ॥ ६८ ॥
आकाशाभिमुखी भूत्वा चक्रवद् भ्राम्यति स्वयम् ।
ततस्तच्छक्तिसमाहृत्य कुड्यमूलस्थकेन्द्रके ॥ ६९ ॥
सतन्त्रीनालमार्गेण योजयेद् विधिपूर्वकम् ।
पश्चात् खे यानसञ्चारमार्गात् प्रमाणात् ॥ ७० ॥
तत्र रौद्रीसम्बन्धशक्तियुक्तान् सुसूक्ष्मकान् ।
समाहृत्यार्ककिरणान् पिञ्जलामार्गत क्रमात् ॥ ७१ ॥
यह शक्ति वात सम्बन्ध विषशक्ति को समूलतः नष्ट करके स्वयं विमान की रक्षा करती है, उसी
प्रकार सुरघा नाल से भद्रा को क्रम से खींच कर कान्त पारा अभ्रक पूर्ण कञ्चुकद्राव में युक्त करवे, उसके
ऊर्ज कञ्चुक शक्ति से वह मिल कर अतिवेग से आकाश के अभिमुख होकर चक्र की भांति स्वयं घूमती
है फिर उस शक्ति को लेकर भित्तिमूलस्थ केन्द्र में तारोंसहित नालों के मार्ग से विधिपूर्वक युक्त कर दे
पश्चात् आकाश में विमान के सञ्चाररेखामार्ग से प्रमाण से वहां के रौद्री सम्बन्ध शक्तियुक्त सूक्ष्म सूर्य-
किरणों को पिञ्जुलामार्ग से—॥ ६६-७१ ॥
सच्छिद्रनालाध केन्द्रमूले नियोजयेत् ।
दण्डकेन्द्रात् पुनस्तन्त्रीनालमार्गात् प्रमाणात् ॥ ७२ ॥
समाकृष्य किरणशक्तिं सम्यग् यथाविधि ।
त्रिकोणादर्शकुड्याधो दक्षकेन्द्रमुखे न्यसेत् ॥ ७३ ॥
पश्चात् समग्रं तत्कुड्य व्याप्य वेगेन सा क्रमात् ।
तच्छक्त्याकर्षणात् तस्या मिलित्वा भ्राम्यति स्वयम् ॥७४॥
पश्चात् तां तन्त्रिनालेन सप्रमाणाद् यथाविधि ।
समादाय विशेषेण बाह्यवायुविवर्जिताम् ॥ ७५ ॥
छिद्रसहित नालों के नीचे केन्द्रमूल में नियुक्त करे, फिर दण्डकेन्द्र से तन्त्रीनालमार्ग से प्रमाण
से किरणशक्ति को यथाविधि सम्यक् खींचकर त्रिकोणदर्पण की भित्ति से नीचे केन्द्रमुख में लगावे
पश्चात् वह समग्र उस भित्ति को वेग से क्रम से व्याप कर उस शक्ति के आकर्षण से उस में मिलकर
स्वयं घूमती है पश्चात् उस शक्ति को तारों के नाल से सप्रमाण यथाविधि विशेषतः बाह्य वायु से रहित
होकर—॥७२-७५ ॥
कुड्यदक्षिणपार्श्वस्थमुखकेन्द्रे नियोजयेत् ।
तद्गर्भकुड्यादुड्डीय तच्छक्त्या मिलिता सती ॥ ७६ ॥
परिभ्राम्यति वेगेन गगनाभिमुख यथा ।
तामादायाथ विधिवद् विमानखपथि क्रमात् ॥ ७७ ॥