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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

वातसंयोजकाधिकरण ] [ १०१
त्रयोविंशत्केन्द्रेखावर्त्तकीलमुखे न्यसेत् ।
अथ तद्दक्षिणे पार्श्वे एकोनविंशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
वातसंयोजकं पात्रं स्थापयेत् सुदृढं यथा ।
नौवें आठवें दशवें बारहवें सोलहवें पन्द्रहवें ग्यारहवें केन्द्र में, इन आठ केन्द्रों में उस उस
रेखानुसार शक्तिस्थापन यन्त्र सुदृढ़ क्रम में स्थापित करे । इस प्रकार आठ केन्द्रों में शक्तिपात्र यथाक्रम
स्थापित करके पश्चात् उनके सम्मेलन पात्र को भी यथाविधि तेरहवें केन्द्र रेखावर्तकीलमुख—रेखा पर
घूमने वाले पेंच के मुख में लगा दे । फिर दक्षिण पार्श्व में उन्नीसवें केन्द्र में वातसंयोजक यन्त्र को
सुदृढ़ स्थापित करे ॥ ६-६ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
विद्युत्तन्त्रीसमायोगाच्छतलिङ्गप्रमाणात ॥ १० ॥
भ्राम्यमाणं पञ्चचक्रैस्संयुतं मध्यकेन्द्रके ।
पूर्वपश्चिमकेन्द्रस्थमुखभागे यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
सभस्त्रिकादण्डनालयुग्मकीलैर्विराजितम् ।
वातकोशद्वयाविष्ठमास्यत्रयसमन्वितम् ॥ १२ ॥
वातस्तम्भनषट्‌चक्रकीलकेस्सुविराजितम् ।
तथा प्रसारणीनालकीलकद्वयमण्डितम् ॥ १३ ॥
वेगातिवेगसूक्ष्मातिसूक्ष्मशान्तादिकील्कै ।
सचक्रैर्भ्राजमानं कमठाकारवत् स्थितम् ॥ १४ ॥
भारद्वयसमायुक्तमूर्ध्वचक्रविराजितम् ।
वातसंयोजकयन्त्रमित्युच्यते बुधै ॥ १५ ॥ इत्यादि ॥
विद्युत्—तारों के सम्बन्ध से सौ डिग्री माप से घुमाये हुए—घूमते हुए पांच चक्रों से संयुक्त
मध्य केन्द्र में पूर्व पश्चिम केन्द्र स्वमुख भाग में यथाक्रम भस्त्रिका दण्ड की दो नालों की कीलों से
विराजित दो वात कोश में आविष्ट तीन मुखों से युक्त वातस्तम्भन छ चक्र कीलों से सुविराजित तथा
प्रसारणी—वातप्रसारणी नाल की दो कीलों से सुसज्जित चक्रसहित वेग अतिवेग सूक्ष्म अतिसूक्ष्म
शान्त आदि कीलों से प्रकाशमान कमठाकार कच्छुवे या घड़े के आकार की भांति स्थित दो भागों से
युक्त ऊपर चक्रवाला वातसंयोजक यन्त्र बुद्धिमानों द्वारा कहा जाता है ॥ १०-१५ ॥
धूमप्रसारणयन्त्रविचार —धूमप्रसारणयन्त्र विचार प्रस्तुत करते हैं—
एवमुक्त्वा वातसंयोजकयन्त्रमत परम् ।
धूमप्रसारणयन्त्रं समग्रेण निरूप्यते ॥ १६ ॥
आस्यत्रयं पञ्चगर्भकोशं (श ?) भ्रकावृते(कै?)र्युतम् ।
कीलकत्रयसंयुक्तं शक्तिनालेन वेष्टितम् ॥ १७ ॥