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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 368 में से

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पृष्ठ 123

हस्तलेख रजिस्टर २, कापी संख्या ७—
त्वङ्निर्णयाधिकारेपि—त्वचा के निर्णय-अधिकार में भी कहा है—
आसनार्थं द्रावकाणां तन्त्रीणां वेष्टनाय च ।
पञ्च चर्माणि शास्त्रेषु प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ १ ॥
गेण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणां च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि वेष्टनासननिर्णये ॥ २ ॥ इत्यादि ॥
विमान में आसनार्थ और द्रावकतारों के लपेटने के लिए पांच चर्म शास्त्रों में विशेष ज्ञानी जनों
ने कहे हैं । गेण्डा, कछुवा, कुत्ता, चूहा शश, मगर के यथाक्रम पांच चर्म वेष्टन आसन के निर्णयप्रसंग
में कहे हैं ॥ १-२ ॥
चर्मवेष्टिततन्त्रीभिर्विद्युच्छक्तिप्रसारणम् ।
कुर्याच्छास्त्रानुसारेण समयोचितकर्मसु ॥ ३ ॥
भ्रामणीकीलकं पश्चात् स्थापयेद् द्वादशान्तरे ।
एतत्सञ्चालनात् सर्वकेन्द्रकीलप्रचालनम् ॥ ४ ॥
यथा भवेत् तथा सम्यक् शास्त्रदृष्टेन वर्त्मना ।
अथ तच्चलनमार्गमनुसृत्य यथाविधि ॥ ५ ॥
चर्म से लिपटे तारों से विद्युत्-शक्ति का प्रसार शास्त्रानुसार समयोचित कार्यों में करे,
द्वादश (बालिश्त) के अन्तर पर या १२ कीलों के मध्य भ्रामणी—घुमाने वाली कील स्थापित करे इसके
सञ्चालन से सब केन्द्र कीलों का प्रचालन जिससे हो जावे वैसे सम्यक् शास्त्रदृष्ट मार्ग से उनके चलन-
मार्ग का यथाविधि अनुसरण करके—॥ ३-५ ॥
नवमे चाष्टमे केन्द्रे दशमेथ त्रयोदशे ।
द्वादश्यां* षोडशे पञ्चदशैकादशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
एतेष्वष्टसु केन्द्रेषु तत्तद्रेखानुसारतः ।
शक्तिस्थापनपात्राणि स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ ७ ॥
एवमष्टसु केन्द्रेषु शक्तिपात्राण्यथाक्रमम् ।
संस्थाप्य पश्चात् तत्सम्मेलपात्रं यथाविधि ॥ ८ ॥

  • अत्र लिङ्गव्यत्यय ।