बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] बृहद् विमानशास्त्र
तथाऽर्ककिरणाकर्षणदर्पणाप्रकल्पितम् ।
नालमेक ततो यानस्योर्ध्वकेन्द्रस्य दर्पणे ॥१०६॥
प्रतिबिम्बितसूर्यस्य किरणाकर्षकायुतम् ।
नालमेक व्योमयानशिरोमणिरत परम् ॥१०७॥
सन्धानकीलक सूर्यकिरणाना विमानके ।
इति त्रयोविंशदङ्गान्युकानि स्युर्यथाक्रमम् ॥१०८॥
एवमुक्त्वा विमानाङ्गान्यथ तद्रचनाक्रमम् ।
सग्रहेण यथाशास्त्र समालोढ्य प्रचक्षते ॥१०६॥
वितस्तिद्वादशायाम विस्तृत तावदेव हि ।
आदौ प्रकल्पयेत् कृष्णपिप्पलदारुणा ॥११०॥
तथा सूर्य किरणाकर्षणदर्पण से बना एक नाल, फिर ऊर्ध्व केन्द्र के दर्पण में प्रतिबिम्बित
सूर्य के किरणाकर्षक से युक्त एक नाल, विमान की शिरोमणि, विमान में सूर्य किरणों को जोड़ने वाली
कील, ये २३ अङ्ग कहे हैं। इस प्रकार विमान के अङ्गों को कहकर उनके रचना-क्रम को सङ्क्षेप से
शास्त्रानुसार आलोड़न करके कहते हैं। १२ बालिशत लम्बा उतना ही चौड़ा पहिले कृष्णपिप्पल की लकड़ी
से बनावे ॥ १०६—११० ॥
पञ्चत्रिंशतिमादर्शवरघेनावृत यथा ।
पश्चात् तस्मिन् त्रयोविंशत्केन्द्राणि परिकल्पयेत् ॥१११॥
तत केन्द्रानुसारेण कुर्याद् रेखाप्रसारणम् ।
रेखानुसारत केन्द्रस्थानेष्वथ यथाविधि ॥११२॥
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
दर्पणेन कृतान् नालान् गर्भ तन्त्रीसमन्वितान् ॥११३॥
केन्द्रात् केन्द्रान्तरावर्तकीलमूलावधिक्रमात् ।
रेखामार्गानुसारेण प्रत्येक योजयेत् तत ॥११४॥
वितस्तिपञ्चकायाम गात्रे त्वेकवितस्तिकम् ।
मध्ये वितस्त्यष्टकमानगात्रेण समाकुलम् ॥११५॥
३५ वें आदर्श-दर्पण के बने आवरण से आवृत-ढका या घिरा हुआ, फिर उसमें २३ केन्द्र
बनावे, फिर केन्द्रानुसार रेखा प्रसारण करे, रेखानुसार केन्द्र स्थानों में यथाविधि घूमने वाले पेंच दृढ़
स्थापित करे, दर्पण से बनाए नालों को जिनके गर्भ में तार हों उन्हें केन्द्र से केन्द्र की अवधि तक क्रम
से रेखामार्गानुसार प्रत्येक को रखे जो पांच बालिशत लम्बा मोटा एक बालिशत मध्य में ८ बालिशत
मोटाई से युक्त हो ॥ १११—११५ ॥
तथैव कण्ठेष्टादशाङ्गुलगात्रसमन्वितम् ।
मूले वितस्तिप्रमाणगात्रदण्डविराजितम् ॥११६॥