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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 368 में से

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पृष्ठ 117

६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
परिवेषक्रियायन्त्रमिति संकीर्त्यते बुधै ॥ ८८ ॥ इति
पांचशक्तियों के प्रयोग से विमान के परिवेष को स्वभावतः बनाकर उस से सूर्यकिरणों को क्रम
से पूर्णरूप से खींचकर विमान के ऊपर वेग से संयुक्त करके पश्चात् उन सूर्यकिरणों की अधीनता को
कम से करके—सूर्यकिरणों को क्रम से अधीन करके सम्यक् विमानों के स्वपथ के अतिक्रमण के बिना
जो सञ्चार में वेग प्रदान करता है वह शास्त्र से स्फुट परिवेषक्रियायन्त्र विद्वानोंद्वारा कहा जाता
है ॥ ८५-८८ ॥
सौदामिनीकलायामपि—सौदामिनीकला में भी कहा है—
सू० क्षजलभहशक्तिसंयोगात् किरणाकर्षणम् ॥ इति ।
क्ष ज ल भ ह शक्तियों के संयोग से किरणों का आकर्षण होता है ।
गोप्यकारिका—गोप्यकारिका है—
शिरीषमेघभूताराकाशाना शक्तय क्रमात् ।
शास्त्रेस्मिन् क्ष ज ल भ ह वर्णैस्साङ्केततस्स्मृत ॥ ८६ ॥
आसा सम्मेलन कृत्वा प्रयोगदम्बरे स्फुटम् ।
परिवेषो† भवेत्सम्यगादित्यस्य यथा घने ॥ ६० ॥
तेनार्ककिरणाकर्षण भवेन्नात्र सशय ॥ इति
शिरीष ?-इन्द्र ?-विद्युत् ?, मेघ, भू-पृथिवी, तारा-ग्रह, आकाश इन पांचों की शक्तियां क्रम
से इस शास्त्र में क्ष, ज, ल, भ, ह वर्णों-अक्षरों से सङ्केतकृत कही हैं। इनका सम्मेलन करके प्रयोग
से आकाश में सूर्य के घनों ?-किरणों ? से परिवेष हो जावे, तिस से किरणों का आकर्षण हो जावे
इस में सन्देह नहीं ॥ ८६-६० ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
शिरीषशक्तेर्द्वा भागौ घनस्याष्टावितीरित ॥ ६१ ॥
भूशक्ते पञ्च नक्षत्रशक्तेस्सप्त तथैव हि ।
दशान्तरिक्षशक्ते स्यादिति शास्त्रविनिर्णय. ॥ ६२ ॥
शक्त्याकर्षणयन्त्रेणैव सम्यग् यथाविधि ।
समाहृत्य विशेषेण निर्वात स्थापयेत् क्रमात् ॥ ६३ ॥
पश्चात्तद्द्योमयानोर्ध्वकेन्द्राद्दर्शान्तरे स्फुटम् ।
प्रतिबिम्बितसूर्यस्य प्रकाशकिरणैस्सह ॥ ६४ ॥
संयोजयेत् तत्पूर्वक पञ्चशक्तीर्यथाविधि ।
एव कृतेम्बरे सम्यक् परिवेषो भवेद् ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
तेनाम्बरन्गेशक्तिकिरणाकर्षणं क्रमात् ।
वेगाद् भवति तान् पश्चाद् विमानोपरिशाखतः ॥ ६६ ॥
परिवेषमुखेनेव योजयेच्चेद् यथाविधि ।
† घोत्स ?