बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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वितस्तिदशविस्तारास्ययुक्तं मनोहरम् ।
सप्तत्रिंशतिमादर्शनालस्तम्भ यथाविधि ॥११७॥
त्रिचक्रकीलैस्संयोज्य तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ।
तस्येशान्यक्रमादष्टद्रावकान् दिक्षु विन्यसेत् ॥११८॥
तद्द्नावकाभिधानानि यथोक्तान्यत्रिणा क्रमात् ।
तान्येवात्र प्रवक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥११६॥
कण्टक कान्तजस्तार्थ्यो नागो गौरी विपन्ध्यय ।
खद्योतो ज्वलनश्चेति वर्णिता द्रावका क्रमात् ॥१२०॥
उसी प्रकार कण्ठ में १८ अंगुल मोटा, मूल में बालिश्तभर मोटे दण्ड से युक्त १० बालिश्त
चौड़े मुखवाला सुन्दर ३७ वें आदर्श से बना नालस्तम्भ यथाविधि, तीन चक्रोंवाले कीलों से युक्त करके
उनके मध्य में स्थापित करे, उसके ईशान्य क्रम से ८ द्रावकों को ८ दिशाओं में रखे उन द्रावकों के
नाम जैसे अत्रि ने कहे हैं क्रम से उन्हें ही यहां विचार कर यथामति कहूंगा वे ई 'कण्टक, कान्तज,
ताक्ष्यं, नाग, गौरी, विपन्ध्यय, खद्योत, ज्वलन,' ये द्रावक कहे हैं ॥ ११८-१२० ॥
विज्ञप्ति—१२१ से १२७ श्लोक अप्राप्त हैं।
कान्तजद्रावक पारादर्शपात्रे प्रपूरयेत् ॥ १२८ ॥
विरिञ्च्यादर्शपात्रेथ नागद्रावक तयैव हि ।
स्फुटिकादर्शपात्रे तु खद्योतद्रावकं न्यसेत् ॥ १२६ ॥
वालुकादर्शपात्रेथ गौरीद्राव प्रपूरयेत् ।
सुरग्रन्थिकादर्शपात्रे विपन्ध्यद्रावकम् ॥ १३० ॥
पञ्चमृद्दर्पणपात्रे ज्वलनद्रावकं न्यसेत् ।
अष्टपात्रे ष्वष्टद्रावान् सम्पूर्य विधिवत् क्रमात् ॥ १३१ ॥
उक्ताष्टदिक्षु विधिवत् विन्यसेत् सुदृढं यथा ।
अष्टदिक्ष्वष्टपात्रस्थाष्टद्रावकेष्वध क्रमात् ॥ १३२ ॥
संयोजयेदष्टमणीन् मणिप्रकरणेरितान् ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥ १३३ ॥
कान्तज द्रावक को पारादर्शपात्र में भर दे, नागद्रावक को विरिञ्च—आदर्श पात्र में, खद्योत-
द्रावक को स्फुटिकादर्श पात्र में रख दे, गौरीद्रावक को बालुकादर्श पात्र में, विपन्ध्यद्रावक को सुरग्रन्थि-
कादर्श पात्र में, ज्वलनद्रावक को पञ्चमृद्दर्पण पात्र में, भर कर क्रम से उक्त आठ दिशाओं में रख दे ।
आठ दिशाओं में आठ पात्रस्थ आठ द्रावकों में नीचे के क्रम से मणिप्रकरण में कही आठ मणियों को
संयुक्त करे, उनके नाम विवेचन करके यथामति कहूँगा ॥ १२८-१३३ ॥
तदुक्तं मणिप्रकरणे—वह कहा है मणिप्रकरण में—