बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्त्यधिकरणम् ] [ ६३
रौद्रघावंतमुखे सम्यग् योजयेन्नालमार्गत ।
एव ,कृतेथ तद्रौद्रीविषशक्ति समूलत ॥ ७८ ॥
स्वतेजसा निवार्याय विमान रक्षति स्वयम् ।
एव शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्र च तत्क्रियाम् ॥ ७९ ॥
यथाशास्त्रं निरूप्याय सग्रहेण यथाविधि ।
परिवेषक्रियायन्त्रमुच्यतेत्र यथाक्रमम् ॥ ८० ॥
भित्ति के दक्षिणपार्श्वस्थ मुखकेन्द्र में नियुक्त करे । उस गर्भभित्ति से —मध्यभित्ति से उठकर
उस शक्ति से मिली हुई गगनाभिमुख वेग से घूमती है फिर उसे विधिवत् लेकर विमान के आकाशमार्ग
में क्रम से रौद्री के घूममुख में भली प्रकार नालमार्ग से युक्त करे, ऐसा करने पर वह रौद्री विषशक्ति को
समूलत अपने तेज से निवृत्त करके स्वयं विमान की रक्षा करती है । इस प्रकार शक्त्याकर्षण दर्पणयन्त्र
और उसकी क्रिया को शास्त्रानुसार संक्षेप से यथाविधि निरूपित करके परिवेषक्रियायन्त्र यहा यथाक्रम
कहा जाता है ॥ ७६-८० ॥
परिवेषक्रियायन्त्र विचार . — परिवेषक्रियायन्त्र का विचार करते हैं —
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे —यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
पञ्चशक्तिसमायोगात् परिवेषो यथा भवेत् ।
तथाम्बरे विमानस्य कृत्वा शास्त्रविधानत ॥ ८१ ॥
अविनाभावतस्तेनार्ककिरणविमनयो ।
परिवेषमुखेनेव संयोज्याथ परस्परम् ॥ ८२ ॥
विधायाधीनता सूर्यकिरणाना यथाविधि ।
विमानाकर्षण रेखामार्गातिक्रमण विना ॥ ८३ ॥
यथा भवेत् तथा सम्यग् य करोति स्वभावत ।
परिवेषक्रियायन्त्र इति तत्सम्प्रचक्षते ॥ ८४ ॥
पांच शक्तियों के सम्बन्ध से विमान का आकाश में परिवेष जिससे हो जावे वैसे शास्त्र-
विधान से अनिवार्य भाव से करके सूर्यकिरणों और विमान के बीच में परिवेष मुख से ही परस्पर संयुक्त
करके सूर्यकिरणों को यथाविधि रेखामार्ग के अधीन करके अतिक्रमण किए बिना विमान का आकर्षण
जिससे हो जावे वैसे भली प्रकार जो स्वभावत करता है वह परिवेषक्रियायन्त्र है ऐसा कहते हैं ॥८१-८४॥
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है—
पञ्चशक्तिप्रयोगेण (न ?) परिवेष स्वभावत ।
कल्पयित्वा विमानस्य तेनार्ककिरणान् क्रमात् ॥ ८५ ॥
समाकृष्य विशेषेण विमानोपरि वेगतः ।
संयोज्य पश्चात् तत्सूर्यकिरणाधीनतां क्रमात् ॥ ८६ ॥
कृत्वा सम्यग् विमानाना स्वपथातिक्रमण विना ।
यत्प्रयच्छति सञ्चारे वेगं तच्छास्त्रतः स्फुटम् ॥ ८७ ॥